आत्मकथा भाग-3 अंश-77

देवी दर्शन

दीपावली के एक दिन बाद हमारे साढ़ू साहब के परिवार की इच्छा हिमाचल की पाँच प्रमुख देवियों का दर्शन करने की हुई। ये देवियाँ हैं- नैना देवी, चिन्तपूर्णी देवी, कांगड़ा देवी, ज्वालामुखी देवी और चामुंडा देवी। इसके लिए हमने टैक्सी तय कर ली। श्रीमतीजी अपने ऑपरेशन के कारण जा नहीं सकती थीं और बच्चों की पढ़ाई चल रही थी। इसलिए उनके साथ केवल मैं गया। हम दो दिन में आराम से सारी देवियों के दर्शन कर आये। वैसे मैं वैदिक या आर्यसमाजी विचारधारा का होने के कारण मूर्तियों के दर्शन-वर्शन और पूजा नहीं करता, लेकिन पहाड़ों की यात्रा का आनन्द उठाने के लिए उनके साथ गया था और पूरा आनन्द उठाया। साथ में हमने भाखड़ा-नांगल बाँध भी देखा। बीच की एक रात हमने कांगड़ा में एक सरकारी यात्री निवास में गुजारी थी। सौभाग्य से रास्ते में कोई कष्ट नहीं हुआ, हालांकि थकान काफी हो गयी थी।
इन देवियों के दर्शन की मनौती श्रीमती जी ने भी मान रखी थी, परन्तु वे नहीं जा पायीं। अगर मेरे साढ़ू न आते, तो शायद मैं भी नहीं जा पाता।
प्रेरणा का झगड़ा
मैं लिख चुका हूँ कि हमारे संस्थान में प्रशिक्षण प्रोग्राम चला करते थे, प्रायः एक सप्ताह यानी 6-6 दिन के। हर सप्ताह किसी एक अधिकारी को उस प्रोग्राम का कोऑर्डिनेटर बनाया जाता था। उसका काम था, सभी कोर्सों के लिए कार्यक्रम बनाना और पढ़ाने वालों को कोर्स एलाट करना। प्रायः यह कार्यक्रम हर सप्ताह एक जैसा होता था, केवल तारीखें बदल जाती थीं।
एक बार फरवरी 2010 में प्रेरणा कश्यप को कोऑर्डिनेटर बनाया गया। उसने कार्यक्रम को इस प्रकार बदल दिया कि कोई पीरियड तो 45 मिनट का हो गया और कोई डेढ़ घंटे का। कहना कठिन है कि ऐसा उसने जानबूझकर किया था या अनजाने में हो गया। जब यह कार्यक्रम शालू सेठ को मिला, तो उसने देखा कि उसका पीरियड डेढ़ घंटे का कर दिया है और प्रेरणा का अपना पीरियड केवल 45 मिनट का रह गया था। उस समय शालू गर्भवती थी और उसको शायद 5वाँ महीना चल रहा था। शालू ने इसी कारण मेरा ध्यान इस ओर खींचा कि उसका पीरियड प्रेरणा ने बहुत लम्बा कर दिया है और इतनी देर तक लगातार खड़े रहना उसके लिए अच्छा नहीं है। वैसे प्रेरणा भी गर्भवती थी और उसका शायद दूसरा ही महीना था। हो सकता है इसीलिए उसने ऐसा जानबूझकर किया हो।
मुझे शालू की बात बिल्कुल ठीक लगी, इसलिए मैंने प्रेरणा को बुलाया और पूछा कि पीरियडों के समय में इतना अन्तर क्यों किया है। अब वह मेरे सवाल का जबाब तो दे नहीं रही थी और बार-बार यही पूछ रही थी कि आपको यह किसने बताया है। मैंने टालने की कोशिश की और कहा कि मेरा खुद ही इस पर ध्यान गया है, परन्तु वह न मानी। तभी बातचीत में गलती से मेरे मुँह से शालू का नाम निकल गया। यह सुनते ही वह उसी समय शालू से लड़ने पहुँच गयी। पीछे-पीछे मैं भी वहाँ पहुँच गया और मैंने उसे डाँटकर कहा कि शालू से क्यों लड़ रही हो, मुझसे लड़ो और तुमने जो गलती की है उसे ठीक करो। किसी तरह मैंने दोनों को शान्त कराया। उसके जाने के बाद शालू बहुत रोयी, तो मुझे बहुत बुरा लगा।
अगले दिन मैंने प्रेरणा को अपने कमरे में बुलाकर कहा- ‘कल तुम शालू से क्यों लड़ी थीं? तुम्हारे जाने के बाद वह बहुत रोयी थी। उसे परेशान मत किया करो। शालू बहुत प्यारी है।’ यह सुनते ही वह एकदम जल गयी और कुढ़कर बोली- ‘सब प्यारी हैं, मैं प्यारी नहीं हूँ।’ मुझे उसके मुँह से यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। महिलाओं में ईर्ष्या की भावना होती है, यह मैं जानता हूँ। परन्तु वह भावना इतनी प्रबल होती है, इसका अनुभव पहली बार हुआ। मैं उससे कहने वाला था कि ‘तुम भी बहुत प्यारी हो’, पर कह नहीं पाया, क्योंकि उसी समय एक अधिकारी मेरे कमरे में आ गया और हमारी बातचीत रुक गयी।
इसके बाद मुझे प्रेरणा से बात करने का मौका नहीं मिला, क्योंकि इसके कुछ दिन बाद ही मेरा स्थानांतरण लखनऊ हो गया। अगर उससे बात करने का मौका मिलता, तो मैं उससे कहता कि ‘तुम शालू से किसी बात में कम नहीं हो, न पढ़ाई-लिखाई में, न ज्ञान में, न काम में। यह सोचो कि फिर भी सब लोग शालू को क्यों प्यार करते हैं और तुम्हें क्यों नहीं करते? इसका कारण है तुम्हारा घमंड। शालू सबके साथ इज्जत से बात करती है और तुम घमंड में बात करती हो। अगर तुम भी सबसे मुस्कराकर प्यार और इज्जत से बात करना शुरू कर दो, तो सब लोग तुम्हें शालू से भी ज्यादा प्यार करेंगे।’
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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