आत्मकथा भाग-3 अंश-75

श्रीमतीजी का ऑपरेशन

अगस्त 2009 में अचानक श्रीमतीजी के सिर में बायीं ओर एक विचित्र प्रकार का दर्द होने लगा। उनकी बायीं आँख की हलचल भी बन्द हो गयी। हम समझ नहीं पाये कि क्या कारण है। उनको दिखाने के लिए हम पंचकूला के अल केमिस्ट अस्पताल गये। वहाँ एक डा. आहलूवालिया से सलाह ली। उन्होंने इसका कारण किसी नस में सूजन को बताया और तत्काल सीटी-स्कैन कराने की सलाह दी। हमने उसी दिन पंचकूला में ही एक अच्छी लैब में सीटी-स्कैन कराया और अगले दिन उसकी रिपोर्ट लेकर फिर डा. आहलूवालिया से मिले।
उन्होंने रिपोर्ट देखकर बताया कि एक नस, जो आँख से सम्बंधित है, उसमें एक बबूला बन गया है, जिसका व्यास 16 मिलीमीटर अर्थात् डेढ़ सेमी से भी अधिक है। इसका केवल एक इलाज है काॅइलिंग कराना, जो चंडीगढ़ में किसी अस्पताल में नहीं होती और दिल्ली में केवल 3-4 बड़े अस्पतालों में होती है। उन्होंने हमें तत्काल गंगाराम अस्पताल जाने की सलाह दी और बताया कि वहाँ डा. शाकिर हुसैन एशिया में इस प्रकार के ऑपरेशन के सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं। उन्होंने स्वयं डा. हुसैन से बात की और हमें सीधे उनके पास ही जाने की राय दी। डा. आहलूवालिया ने हमें बहुत सही सलाह सही समय पर दी, इसके लिए हम उनके बहुत-बहुत आभारी हैं।
अगले ही दिन हमने दिल्ली शताब्दी पकड़ ली और गंगाराम अस्पताल में जाकर डा. शाकिर हुसैन से मिले। उन्होंने हमें तत्काल एंजियोग्राफी और एम.आर.आई. कराने की सलाह दी और उनकी रिपोर्ट आदि देखकर कहा कि यह ऑपरेशन एक सप्ताह के अन्दर करा लो। वे स्वयं समय देने को तैयार थे। उन्होंने खर्च लगभग 5 लाख बताया। हमने उनको धन्यवाद दिया। वहाँ आगरा से श्रीमती जी के भाई आलोक और मेरे छोटे साढ़ू विजय बाबू भी आ गये थे। वे श्रीमतीजी को अपने साथ आगरा ले गये और मैं रुपयों की व्यवस्था करने चंडीगढ़ चला गया।
अब मुझे 5 लाख की व्यवस्था करनी थी, जो कोई छोटी राशि नहीं है। मैं अपने ओवरड्राफ्ट खाते से 3 लाख निकाल सकता था, क्योंकि उन दिनों वह लगभग खाली था। मेरे पास उस समय 2 लाख के शेयर थे। मैं उनको बेचकर शेष रुपयों की व्यवस्था भी कर सकता था, हालांकि शेयर तत्काल बेचने में मुझे 30-40 हजार का घाटा पड़ता। लेकिन सौभाग्य से हमारे मकान मालिक श्री ज्ञान चन्द वर्मा मेरी सहायता को आये। वे कनाडा में रहते हैं और बीच-बीच में आते रहते हैं। उस समय वे कनाडा में ही थे। उनके प्रतिनिधि श्री पंकज सैनी, जिन्होंने हमें मकान किराये पर उठाया था, पास में ही रहते हैं। जब उनके माध्यम से वर्मा अंकल जी को पता चला कि हमारी श्रीमती जी का ऑपरेशन होने वाला है, जिसमें 5 लाख का खर्च है, तो उन्होंने कहा कि मैं 2 लाख तक उधार दे सकता हूँ। मैंने प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया और वायदा किया कि जैसे ही मुझे बैंक से बिल का भुगतान मिलेगा, मैं सबसे पहले आपके रुपये लौटाऊँगा।
इसके साथ ही मेरे छोटे भाईसाहब, छोटे साढ़ू और बड़े बहनोई ने भी बिना माँगे मुझे कुल दो लाख रुपये उधार देकर सहायता की, जिससे मैंने 5 लाख की व्यवस्था सरलता से कर ली। मैंने अपने ओवरड्राफ्ट में 2 लाख की गुंजायश छोड़ दी, ताकि यदि अचानक कोई आवश्यकता पड़ जाये, तो उतनी राशि तत्काल निकाली जा सके।
मैं तो चंडीगढ़ में धन की व्यवस्था कर रहा था। इधर आगरा से मेरे छोटे साढ़ू श्री विजय जिन्दल ने नौएडा के फोर्टिस अस्पताल में इसी प्रकार के ऑपरेशन करने वाले एक डाक्टर डा. ए.के. सिंह से बात की। उन्होंने खर्च का अनुमान 3 लाख बताया। हमने सोचा कि यदि यह काम 3 लाख में हो जाता है, तो ज्यादा अच्छा रहेगा। यह सोचकर हम पहले फोर्टिस गये। वहाँ हमने एक डाक्टर से सलाह ली। वह डाक्टर शायद अनाड़ी था, रिपोर्ट देखकर कहने लगा कि रोग उसकी समझ में नहीं आ रहा है। फिर उसने अनुमान भी 5 लाख से 7 लाख तक का बताया। हम समझ गये कि ये अस्पताल केवल ‘ऊँची दूकान फीका पकवान’ का नमूना है। इसलिए हमने वहाँ ऑपरेशन कराने का विचार एकदम छोड़ दिया और सीधे गंगाराम अस्पताल गये।
फोर्टिस अस्पताल वास्तव में मरीजों को जी भरकर लूटता है और फिर भी ठीक नहीं कर पाता। मेरे मित्र श्री कुलवन्त सिंह गुरु ने मुझे एक उदाहरण बताया था कि किस प्रकार उनके एक परिचित का ऑपरेशन दो बार फोर्टिस में किया गया, जिसमें 12 लाख खर्च हुए और फिर भी वह ठीक नहीं हुआ। बाद में मुझे ऐसे और भी कई उदाहरण मिले। इसलिए मुझे प्रसन्नता है कि मैं वहाँ जाने से बच गया, नहीं तो मेरी गाढ़ी कमाई तो खर्च होती ही, सम्भव था कि मैं अपनी श्रीमतीजी को भी खो देता।
गंगाराम में हम पुनः डा. शाकिर हुसैन से मिले। वे श्रीमती जी की हालत नाजुक देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने को तैयार हो गये। हमने उनका और भगवान का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया। अगले दिन अर्थात् 19 अगस्त 2009 को श्रीमती जी का ऑपरेशन (काॅइलिंग) हुआ। इसमें जाँघ में होकर काॅइलें इस प्रकार डाली जाती हैं कि वे दिमाग की उसी नस में पहुँचकर बबूले के अन्दर उस तरह लिपट जाती हैं, जैसे ऊन का गोला लिपटता है। यह बहुत ही नाजुक ऑपरेशन होता है। सौभाग्य से डा. हुसैन ने सफलतापूर्वक यह कर दिखाया। इसमें 3-4 घंटे का समय लग गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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