आत्मकथा भाग-3 अंश-74
बांगिया जी का स्थानांतरण
हरिद्वार शिविर में मेरे जाने से कुछ दिन पहले हमारे बैंक में बड़े पैमाने पर उच्च अधिकारियों के स्थानांतरण हो रहे थे। लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन एक सूची आ जाती थी, जिनमें स्केल 4 और 5 के उन अधिकारियों के नाम होते थे, जिनका स्थानांतरण किया जाता था। जब भी ऐसी सूची आती थी, बांगिया जी मुझसे यह कहना नहीं भूलते थे कि अगली सूची में किसी का भी नाम हो सकता है। दूसरे शब्दों में, वे मुझसे यह कहना चाहते थे कि मैं स्थानांतरण के लिए तैयार रहूँ। लेकिन ईश्वर की लीला ऐसी हुई कि अगली ही सूची में उनका अपना नाम आ गया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।
हरिद्वार शिविर में पहुँचने के अगले दिन ही मुझे समाचार मिल गया था कि बांगिया जी का स्थानांतरण कोलकाता हो गया है। यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई, क्योंकि मैं अब पूरी तरह तनावमुक्त रह सकता था। मैंने वहीं से मोबाइल पर संदेश भेजकर बांगिया जी को उनके स्थानांतरण की ‘बधाई’ दे डाली। हालांकि उन्होंने उसका उत्तर नहीं दिया, लेकिन वे जान गये कि मुझे भी इसकी खबर मिल चुकी है। जब तक मैं शिविर से लौटकर पंचकूला पहुँचा, तब तक बांगिया जी की विदाई भी हो चुकी थी। एक तरह से यह अच्छा ही हुआ, क्योंकि यदि मैं विदाई समारोह में उपस्थित होता, तो न जाने क्या बोल जाता।
बांगिया जी को सेवा शाखा, कोलकाता में लगाया गया था। संयोग से उनसे पहले हमारे संस्थान के कक्कड़ साहब को भी उसी शाखा में भेजा गया था और तब बांगिया जी ने टिप्पणी की थी कि ”अब ‘साँड़ जी’ को पता चलेगा।“ ‘साँड़ जी’ को क्या पता चला यह तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन बांगिया जी को जाते ही पता चल गया। हुआ यह कि वहाँ के लोग बांगिया जी को पहले से जानते थे, इसलिए उन्होंने बांगिया जी का बिल्कुल स्वागत नहीं किया और उन्हें एक कोने में उपेक्षित-सा बैठा दिया। ऐसी स्थिति में रहने पर शीघ्र ही वे बीमार पड़ गये। बीमार तो वे पहले से ही थे, लेकिन कोलकाता जाने के बाद तो एकदम ही बीमार हो गये। वे लम्बे समय तक बीमारी के कारण अवकाश पर रहे। उनका लीवर और शायद गुर्दे भी खराब हो गये थे। फिलहाल वे ऑफिस तो आ रहे हैं, लेकिन पहिएदार कुर्सी पर बैठे रहते हैं। बिल्कुल चल-फिर नहीं पाते। ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है।
(पादटीप- बाँगिया जी अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और व्हाट्सएप पर सक्रिय रहते हैं।)
नये साहब का शुभागमन
बांगिया जी के जाने के लगभग एक सप्ताह बाद ही हमारे नये सहायक महाप्रबंधक का आगमन हुआ। वे थे श्री एस.वी.एल.एन. नागेश्वर राव। जैसा कि नाम से स्पष्ट है वे मूलतः आंध्रप्रदेश के रहने वाले हैं। उनका स्वभाव बहुत अच्छा है और इतने भले आदमी हैं कि कभी किसी का बुरा सोच ही नहीं सकते। उनके आने से संस्थान का वातावरण एकदम तनावमुक्त हो गया, जो बांगिया जी के कारण हमेशा तनावग्रस्त रहता था। मेरे साथ तो श्री राव का व्यवहार बहुत ही मित्रतापूर्ण और सहयोगात्मक था। उनके एक पुत्री है कु. अमृता राव। वह आंध्रप्रदेश बोर्ड की सीनियर सेकेंडरी परीक्षा में प्रदेश भर में प्रथम आयी थी। उसने एम.बी.बी.एस. किया हुआ था और एम.डी. में उसका प्रवेश चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट चिकित्सा संस्थान में हो गया था। इसलिए उसे चंडीगढ़ में रहना था। शायद इसी कारण राव साहब ने अपनी पोस्टिंग पंचकूला में करा ली थी।
प्रारम्भ में राव साहब को पंचकूला में ही एक मकान किराये पर मिला। वह काफी सुविधाजनक था, लेकिन एक समस्या थी कि डा. अमृता को पी.जी.आई. जाने में बहुत समय लगता था, हालांकि वह कार से जाती थी और राव साहब का प्राइवेट ड्राइवर उसको ले जाता था। कभी-कभी ड्यूटी का समय बदलते रहने के कारण और अधिक कष्ट होता था, इसलिए दो-तीन महीने बाद ही राव साहब ने चंडीगढ़ सेक्टर 8 में अधिक किराये पर एक मकान ले लिया। इससे उनको काफी आराम हो गया। हालांकि उनके ड्राइवर को रोज पंचकूला से चंडीगढ़ साइकिल पर जाना पड़ता था।
राव साहब ने अपनी पुत्री को बहुत अच्छे संस्कार दिये थे। वे अपने ड्राइवर को भी श्यामू भैया कहकर सम्मान देती थीं और उसकी सुविधा-असुविधा का भी ध्यान रखती थीं। बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि राव साहब का बैकग्राउंड संघ परिवार का है अर्थात् प्रारम्भ में वे भी स्वयंसेवक थे। इसी कारण उनका व्यवहार इतना उच्चकोटि का है। संस्थान को चलाने में वे सदा मेरी सलाह लिया करते थे और हम दोनों मिलकर ही कोई निर्णय करते थे। मुझे एक बार उन्होंने यह भी बताया था कि हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन् से भी उनकी दूर की रिश्तेदारी थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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