आत्मकथा भाग-3 अंश-73

शालू सेठ का आगमन

श्रीमती शालू सेठ के बारे में मैं पीछे विस्तार से लिख चुका हूँ। वह कई साल तक मेरे साथ कानपुर मंडलीय कार्यालय में रही है। जून या जुलाई 2009 में उसने अपना स्थानांतरण पंचकूला में मेरे ही संस्थान में करा लिया। वास्तव में उसके पति श्री राजीव सेठ उस समय मोहाली में किसी कम्पनी में वेबसाइट डिजायनर या डिवलपर के रूप में सेवा कर रहे थे। लगभग 6 माह तक अकेले रहने के बाद जब वे स्थायी रूप से चंडीगढ़ या पंचकूला में रहने को तैयार हो गये, तो उन्होंने प्रयास करके शालू का स्थानांतरण पंचकूला करा लिया। शालू के आने पर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। वह एक बहुत मेहनती और योग्य अधिकारी है। उसका व्यवहार सबके प्रति बहुत मित्रतापूर्ण रहता है, इसलिए सब उसे पसन्द और प्यार करते हैं। उसे पंचकूला के सेक्टर 15 में ही किराये पर एक अच्छा मकान मिल गया और वह वहाँ रहने लगी।
योग शिविर में हरिद्वार
मैं लिख चुका हूँ कि मैं अपने संस्थान में आने वाले प्रशिक्षणार्थियों को नियमित योग कराया करता था। इसके साथ ही मैं स्वामी रामदेव के पतंजलि योग का अभ्यास करने वाले सज्जनों के सम्पर्क में भी था। एक बार पंचकूला में डी.ए.वी. इंटर कालेज में उनका 10 दिवसीय प्रशिक्षण हुआ था। मैं और श्री अनिल नेमा इसमें रु. 1100 शुल्क देकर शामिल हुए थे, हालांकि शुल्क देना अनिवार्य नहीं था। इसके कुछ माह बाद जुलाई 2009 में हमें हरिद्वार में स्वामीजी के सान्निध्य में शिविर में जाने का अवसर मिला। मैंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाना तय किया। हमारे सेक्टर से 4-5 लोग इस शिविर में जा रहे थे, जो मेरे परिचित थे। अतः उनके साथ मैं भी चल दिया। हम रोडवेज की बस से चले और लगभग 4 घंटे में शिविर स्थल के ठीक बाहर सड़क पर उतर गये।
शिविर बहुत आनन्ददायक था। हम 5 लोगों को एक ही कमरा मिला था, जिसमें हम आराम से सो सकते थे। उसमें जुड़ा हुआ बाथरूम भी था। कमरे का किराया कुछ नहीं था। भोजन भी तीनों बार कैंटीन में समय से मिलता था, जो हालांकि साधारण होता था, लेकिन बहुत सात्विक भी था। हम दिन में दो बार सुबह और शाम योग करने के लिए निर्धारित स्थान पर जाते थे और बीच में बैठकों के लिए भी जाते थे। स्वामी जी स्वयं हमें योग कराते थे। वास्तव में वे प्रत्येक प्रान्त के लोगों के साथ एक-एक सप्ताह का शिविर कर रहे थे। हम पंजाब-चंडीगढ़ प्रान्त के साथ आये थे। हमारे पंचकूला के 2 साथी श्री एस.पी. गुप्ता और श्री नन्द किशोर एक दिन बाद ही वापस चले गये और कमरे में हम केवल 3 लोग रह गये थे। एक मैं, दूसरे श्री सुखदेव कपूर और तीसरे श्री रमेश छाबड़िया। पहले दिन शाम को समय निकालकर हम हरिद्वार भी गये और वहाँ हर की पैड़ी में गंगाजी में स्नान करके अपने पाप धोये।
दो दिन बाद ही सावन का महीना शुरू हो गया था। इस महीने में लोग काँवरों में हरिद्वार से गंगाजल भरकर लाते हैं और अपने क्षेत्र के किसी बड़े शिव मंदिर पर उससे अभिषेक करते हैं। हमारा शिविर स्थल हरिद्वार से रुड़की जाने वाली मुख्य सड़क के किनारे था। हम रोज देखते थे कि उस सड़क से अनगिनत लोग काँवरें लेकर जा रहे थे। दिन-रात काँवरियों का अटूट ताँता। यह दृश्य हमारे लिए अकल्पनीय था। हमें बिल्कुल अनुमान नहीं था कि इतनी भीड़ होती होगी। सावन के महीने में वह सड़क सामान्य वाहनों के लिए एकदम बन्द कर दी जाती है, केवल काँवरियों के वाहन जा सकते हैं।
अब हम घबराये कि लौटेंगे कैसे। परन्तु शिविर के व्यवस्थापकों ने लौटने के लिए बसों को बुक कर दिया। लौटने वाले दिन हमने भी चंडीगढ़ जाने वाली बस में टिकट बुक करा ली थी। शिविर की समाप्ति से एक दिन पहले स्वामी रामदेव जी के साथ हमारा सामूहिक चित्र लिया गया, जो अभी भी मेरे पास सुरक्षित रखा है। मैं स्वामी जी से व्यक्तिगत बात करना चाहता था, परन्तु उसका मौका नहीं मिला। वैसे मैं स्वामी जी के मुख्य आश्रम में भी गया था और वहाँ एक वैद्य से अपने कानों के इलाज के लिए दवायें लिखवा लाया था। वे दवायें मैंने कई महीने खायीं और बतायी गयी सारी क्रियायें भी कीं, परन्तु कोई लाभ न होना था, न हुआ।
जिस दिन हमें लौटना था, उस दिन जल्दी ही जलपान आदि करके हम तैयार हो गये और अपना सामान लेकर सड़क तक पहुँचे। लेकिन वहाँ हमें बताया गया कि बस वहाँ से हरिद्वार की ओर करीब एक किमी दूर एक मोड़ से मिलेंगी। हम किसी तरह वहाँ पहुँचे। दो घंटे बाद बसें आयीं। वे बसें जाने किन-किन गाँवों से होती हुई पहले हरिद्वार, फिर देहरादून से होकर नाहन, जगाधरी, यमुनानगर के रास्ते से अम्बाला पहुँची। वहाँ लगभग आधा घंटे रुकने के बाद बस चंडीगढ़ की ओर चली और हम जीरकपुर पर उतरे। वहाँ दीपांक कार लेकर हमें लेने आ गया। इस प्रकार हम करीब 9 बजे अपने घर पर पहुँच सके अर्थात् अपने कमरे से निकलने के पूरे 12 घंटे बाद, जबकि सीधा रास्ता मुश्किल से 4 घंटे का है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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