आत्मकथा भाग-3 अंश-72
मनाली में चौथे दिन हमारा कार्यक्रम बचे हुए स्थानीय स्थल देखकर कुल्लू होते हुए मणिकर्ण जाने का था। पहले हम वशिष्ठ कुंड गये। वहाँ गर्म पानी का कुंड है। कहा जाता है कि वशिष्ठ जी ने लक्ष्मण जी के लिए वह गर्म पानी का कुंड बनाया था और वशिष्ठ जी का आशीर्वाद है कि जो यहाँ स्नान करेगा, उसकी सारी थकान मिट जायेगी। कुंड का पानी बहुत गर्म था, इसलिए उसमें कूदकर स्नान करने की हिम्मत नहीं हुई। उसमें से एक धार नल की तरह निकलती है। मैंने उसी से स्नान कर लिया। वह भी काफी गर्म थी।
फिर हमने कुल्लू के रास्ते में निकोलाई रोयरिख का आश्रम देखा। वे एक महान् चित्रकार थे। उनका आश्रम काफी ऊँचाई पर है। वहाँ से सारी कुल्लू घाटी का दृश्य दिखाई देता है, जो बहुत मनोरम लगता है।
वहाँ से निकलकर हम कुल्लू के रास्ते में वैष्णोदेवी के मंदिर पर आये। वह अच्छा मंदिर है। वहीं लंगर में हमने भोजन किया। उसके सामने ही व्यास नदी है, थोड़ी देर उसमें भीतर घुसकर पत्थरों पर बैठे। बहुत अच्छा लग रहा था।
फिर हम मणिकर्ण की ओर चले। यह पार्वती नदी के किनारे है। पार्वती नदी नीचे आकर व्यास नदी में मिल जाती है। रास्ता बहुत सँकरा और खतरनाक भी है। बीच-बीच में कई अच्छे अर्थात् विकसित गाँव तथा कस्बे भी मिले। शाम को 5-6 बजे हम मणिकर्ण पहुँच गये। वहाँ एक बड़ा गुरुद्वारा है। उसमें छोटे-बड़े सैकड़ों कमरे हैं, जिनमें एक साथ हजारों लोग ठहर सकते हैं। दिन-रात लंगर चलता रहता है। हमें थोड़ी देर में ही एक कमरा मिल गया, जिसमें हम 12 लोग आराम से सो सकते थे। लेकिन वहाँ बाथरूम की सुविधा अच्छी नहीं है। बहुत बदबू भी थी। खैर हमने सोचा कि हमें एक रात ही रुकना है, इसलिए काम चल जाएगा।
मणिकर्ण में गर्म पानी की धारा है, जिसे एक कुंड में एकत्र किया गया है। ऐसा कुंड एक तो गुरुद्वारे के भीतर ही है और एक बाहर है। पानी उबलता हुआ होता है, परन्तु उसमें पार्वती नदी का बहुत ठंडा पानी मिलाकर नहाने लायक जल की व्यवस्था की गयी है। लेकिन हमारा विचार उनमें नहाने का नहीं था, इसलिए केवल बाहर से देख लिया। एक बार हमारे पुराने ड्राइवर रवीन्द्र सिंह ने उल्लेख किया था कि पहाड़ों पर बहुत दूर गर्म पानी की धारा है और वहाँ एक गुरुद्वारा भी है। परन्तु उसे उस स्थान का नाम ठीक से याद नहीं था, क्योंकि जब वह गया था, तो बहुत छोटा था। मणिकर्ण आकर हमें यह बात याद आयी, तो समझ गये कि रवीन्द्र इसी जगह की बात कर रहा होगा।
गुरुद्वारे के भीतर ही एक गर्म गुफा है, जिसमें बैठने पर पूरे शरीर का अग्निस्नान हो जाता है। बहुत पसीना आता है, परन्तु वह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है। कई लोग वहाँ देर से बैठे हुए मिले। मैं भी उसमें काफी देर तक बैठा। फिर हम बाहर घूमने निकले। गुरुद्वारे से दूसरी तरफ बाहर आते ही हमने एक कुंड देखा, जिसमें उबलता हुआ पानी भरा हुआ था। उसमें चावल-दाल भी पकाये जा सकते हैं। हमने एक पोटली में चावल भरकर रखे भी, परन्तु उनको पकने में कम से कम 20-25 मिनट लगते हैं। इतना समय हमारे पास नहीं था, इसलिए हम पोटली को वहीं छोड़कर चले गये।
वहाँ से छोटे-छोटे एक-दो मंदिर देखे। फिर रामचन्द्र जी के मंदिर पर आये, जो यहाँ का सबसे बड़ा मंदिर है। वहाँ ठहरने के लिए कमरे भी मिलते हैं और लंगर की व्यवस्था भी है। हमने सोचा कि अगर यहाँ कमरा मिल जाये, तो बहुत अच्छा रहेगा। पूछने पर बताया गया कि एक बड़ा कमरा हालांकि खाली है, परन्तु एक स्कूल की पार्टी के लिए बुक है, जो अभी आये नहीं हैं। रात के 8 बज रहे थे, हमने उनसे कहा कि अब तो वे आयेंगे नहीं, इसलिए हमें ही दे दीजिए। अगर वे आ गये तो हम खाली कर देंगे। काफी कहने के बाद वे मान गये और हम अपना सामान लेकर उसी बड़े कमरे में आ गये। वह कमरा वास्तव में अच्छा था। वहाँ बाथरूम भी साफ सुथरा था।
हमने गुरुद्वारे का कमरा नहीं छोड़ा, क्योंकि क्या पता जरूरत पड़ जाये। वहाँ ताला लगाकर चले आये। रात को लगभग 9 बजे हमने रामचन्द्र जी के मंदिर में ही लंगर में भोजन किया। फिर दुकानों पर कुछ खरीदारी करने के बाद सो गये।
प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर हम नहाने गये। उस मंदिर में भी नहाने के लिए गर्म पानी के दो कुंड हैं- एक पुरुषों के लिए और एक महिलाओं के लिए। पानी काफी गर्म है। उसमें कूदकर नहाना बड़ी हिम्मत का काम है। पहले हम किनारे पर बैठकर लोटे से पानी डाल रहे थे। फिर मैंने पहले पैर के पंजे पानी में डाले, थोड़ी देर बाद घुटने तक पैर पानी में डाल लिये। इसके थोड़ी देर बाद मैं पूरा पानी में घुस गया। पानी जाँघों से थोड़ा ऊपर तक आ रहा था। पहले काफी गर्म लगा, लेकिन एक मिनट में ही सहन करने लायक हो गया। फिर मैंने उसमें दो-तीन गोते भी लगाये। बहुत आनन्द आया। मैं करीब 15 मिनट तक उसमें नहाता रहा। फिर बाहर आ गया।
हमने सुना था कि इस पानी में गंधक घुला होता है, जिससे नहाने पर हर तरह का दर्द खत्म हो जाता है। इसे मैं यों ही उड़ाई हुई बात ही समझता था, परन्तु आश्चर्य है कि वहाँ से आने के बाद मेरे घुटनों का दर्द बिल्कुल समाप्त हो गया, जो कानपुर में चोट लग जाने के कारण और फिर पंचकूला में बैडमिंटन खेलते समय झटका लग जाने के कारण हो गया था और पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था। स्नान के बाद हमने गुरुद्वारे के लंगर में भोजन किया और तुरन्त चलने के लिए तैयार हो गये, क्योंकि हमें उसी दिन वापस पंचकूला पहुँचना था।
रास्ते में मंडी होते हुए हम चंडीगढ़ की ओर चले। मंडी में हमने कुछ फल भी खरीदे, जो वहाँ ताजे और अच्छे मिलते हैं। कीमतें भी चंडीगढ़-पंचकूला की तुलना में ठीक हैं। शाम तक हम चंडीगढ़ पहुँच गये, परन्तु टैक्सी वाले सरदार जी शहर से थोड़ा पहले ही एक रिसाॅर्ट में रुके और अपनी गाड़ी धोई। तब तक हम इंतजार करते रहे और जलपान किया। लगभग रात को 8 बजे हम पंचकूला अपने घर पहुँच गये। इस प्रकार हमारी यह कुल्लू-मनाली यात्रा सकुशल सम्पन्न हुई। इसमें कुल 5 दिन लगे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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