आत्मकथा भाग-3 अंश-71

अगले दिन हम जल्दी ही रोहतांग दर्रे के लिए निकले। पहले हमने रास्ते के शुरू में ही वहाँ के लिए विशेष सूट और बूट किराये पर लिये। उनका किराया बहुत ज्यादा था, पर हमारी मजबूरी थी। रोहतांग दर्रा वैसे तो सामने ही दिखाई देता है, लेकिन सड़क मार्ग से 40 किमी है। मैंने सोचा कि 2 या 3 घंटे में पहुँच जायेंगे। लेकिन रास्ता बहुत सँकरा था और ढेर सारी गाड़ियाँ एक साथ जा रही थीं। जैसे-जैसे हमारी टैक्सी ऊपर चढ़ती जा रही थी, वैसे-वैसे ठंड भी बढ़ती जा रही थी। इसकी तुलना में नीचे मनाली में ठंड बहुत मामूली थी। रास्ता बहुत सुहावना था। वहाँ से बर्फ से ढकी चोटियाँ भी साफ दिखाई देती थीं, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। कभी-कभी झरने भी दिखाई देते थे, जो दूर से दूध की तरह चमकते थे।

हर एक-आध घंटे में एक छोटा सा गाँव मिलता था। बीच-बीच में रेस्टोरेंट भी मिल जाते हैं। सारे रास्ते में भारतीय सीमा सड़क संगठन के लोग मिलते थे, जो उन सड़कों को या तो साफ कर रहे थे या ठीक कर रहे थे। लगभग 2 घंटे चलने के बाद हमारी टैक्सी अचानक रुक गयी या रेंगने लगी। हमने कारण पूछा तो पता लगा कि आगे एक मिनी ट्रक पलट गया है, जिससे सड़क बन्द हो गयी है। केवल एक गाड़ी निकलने का रास्ता बचा है, जो बहुत खतरनाक भी है। वहीं से एक-एक इंच करके गाड़ियाँ निकाली जा रही थीं। काफी देर बाद हमारी टैक्सी भी इसी तरह निकली। हम सब नीचे उतर आये थे और केवल ड्राइवर ने ही गाड़ी निकाली थी।
जब वह जगह निकल गयी, तो गाड़ी आगे तेजी से चली, लेकिन ऊपर सड़क और अधिक सँकरी हो जाती है और टूटी हुई भी है। इसलिए टैक्सी धीरे-धीरे रेंग रही थी। करीब 4 घंटे चलने के बाद हम गढ़ी नामक स्थान पर पहुँचे, जहाँ खुला समतल मैदान सा है और वहाँ काफी दुकानें भी बनी हुई हैं। लोग वहाँ थकान मिटाने के बाद ही आगे बढ़ते हैं। हमने वहाँ चाय पी और अपने साथ लायी हुई नमकीन-बिस्कुट आदि का नाश्ता किया।
पूछने पर पता चला कि रोहतांग दर्रा वहाँ से केवल 14 किमी है। मैंने अंदाज लगाया कि अब केवल एक घंटा और लगेगा, लेकिन उन्हीं लोगों ने बताया कि रास्ता कम से कम 2 घंटे का है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि दर्रा बिल्कुल सिर पर सामने ही दिखाई दे रहा था। लेकिन वहाँ तक पहुँचने में वास्तव में 2 घंटे से भी अधिक समय लग गया।
जब तक हम रोहतांग दर्रे पर पहुँचे, तब तक बहुत थक गये थे। वहाँ चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी। ऐसी बर्फ की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। सिर पर बहुत तेज धूप भी थी, जिसका लगता था कि बर्फ पर कोई असर नहीं हो रहा है। हालांकि उस समय बर्फ पड़ नहीं रही थी। वास्तव में गर्मियों में बर्फ वहाँ केवल रात को पड़ती है और दिन में खूब धूप निकलती है, जिससे थोड़ी बर्फ पिघल जाती है। उसी से झरने बनते हैं। वहाँ बर्फ की चट्टानें भी थीं, जो दूर से नमक की चट्टानों जैसी दिखायी देती थीं। पास जाकर ही पता चलता था कि यह ठोस बर्फ है।
वहाँ काफी खुला स्थान था, जहाँ रेत की तरह बर्फ ही बर्फ पड़ी हुई थी। उसी पर कुछ लोगों ने फिसलने का खेल बना लिया था और वे फीस लेकर फिसलवा रहे थे। हममें से कुछ लोग फिसले भी पर मजा नहीं आया। फिर हम बर्फ की गाड़ी में बैठकर दर्रे में कुछ दूर तक गये। श्रीमती जी की तबियत अत्यधिक ठंड और आक्सीजन की कमी के कारण खराब हो रही थी। इसलिए हम चिन्तित थे। पर किसी तरह सँभाल लिया। हमने वहाँ खाना नहीं खाया, क्योंकि डर था कि उल्टी न हो जाये। वैसे भी किसी को भूख नहीं थी।
हमने एक छोटी सी पहाड़ी पर जमी हुई बर्फ पर फिसलने का स्थान बना लिया और वहाँ खूब फिसले। बच्चे बर्फ के गोले बना-बनाकर एक दूसरे पर फेंक रहे थे। हमने लगभग 2 घंटे तक बर्फ में खूब मस्ती की। जब थक गये तो वहाँ से चले। वहाँ एक जगह एक धारा निकल रही थी, जिसके बारे में बताया गया कि व्यास नदी यहीं से शुरू होती है।
लगभग ढाई बजे हम वहाँ से चले। हमने सोचा था कि उतरने में कम समय लगेगा। वैसा हुआ भी, परन्तु नीचे आने तक कई लोगों को उल्टी हो गयी। लगभग सभी की हालत खराब थी। सभी में मेरी उम्र सबसे अधिक थी, फिर भी मैं स्वयं को सबसे स्वस्थ मानता हूँ, पर नीचे आने पर मुझे भी दो बार उल्टी हो गयी। तब मुझे चैन मिला।
पहले हम एक घाटी में गये, जिसका नाम शायद सेलोंग था, जो व्यास नदी के दूसरी ओर शहर से करीब 6 किमी दूर है। वहाँ ग्लाइडिंग हो रही थी, परन्तु हममें से किसी ने भी ग्लाइडिंग नहीं की, क्योंकि सबकी तबियत खराब थी। किसी तरह आधा घंटा वहाँ गुजारा, फिर अपने कमरे में आकर सो गये। लगभग 2-3 घंटे सोने के बाद हम सब स्वस्थ हुए। तब खाना खाने गये और फिर आकर सो गये।
रोहतांग दर्रे तक आने-जाने में हालांकि हम सबको ही थोड़ा-थोड़ा कष्ट हुआ, लेकिन आनन्द बहुत आया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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