आत्मकथा भाग-3 अंश-70

कुल्लू-मनाली भ्रमण
सन् 2009 में मई माह में हमारी योजना अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ कुल्लू-मनाली घूमने की बन गयी। वे पंचकूला आये और आस-पास के स्थान देखने के साथ ही कुल्लू-मनाली घूमने के लिए एक बड़ी टैक्सी की व्यवस्था कर ली, जिसमें ड्राइवर के अलावा 12 लोग सरलता से बैठ सकते थे। हमारे काफिले में 12 ही व्यक्ति थे- मैं, श्रीमती बीनू और पुत्री आस्था (मोना), मेरे छोटे साढ़ू श्री विजय कुमार जिंदल (विजय बाबू), उनकी पत्नी श्रीमती राधा (गुड़िया), उनकी पुत्री तन्वी, श्रीमती जी के भाई श्री आलोक कुमार गोयल, उनकी पत्नी श्रीमती कंचन, उनकी पुत्रियाँ अंशिका (सौम्या) और पर्णी (एकांशी) तथा पुत्र विश्वांग (सहज) एवं मेरे मँझले साढ़ू की पुत्री साक्षी (डाॅल)। हमारा पुत्र दीपांक हमारे साथ नहीं गया, क्योंकि उसकी पढ़ाई अधिक महत्वपूर्ण थी। उसको हमने अपने पड़ोसियों और उसके मित्रों के भरोसे छोड़ दिया। हमारी टैक्सी को एक सरदारजी चला रहे थे, जो कई बार उस ओर जा चुके थे।
निर्धारित समय पर हम पंचकूला से चंडीगढ़, कुराली, आनन्दपुर साहब, मंडी, कुल्लू होते हुए मनाली पहुँच गये। रास्ते में एक लम्बी सुरंग पड़ी। उससे होकर जाने में अच्छा लगा। हमारी टैक्सी व्यास नदी के दायें किनारे-किनारे चल रही थी। व्यास नदी इस क्षेत्र की जीवन रेखा है। कुल्लू की प्रसिद्ध घाटी इसके दोनों ओर बसी हुई है, जो बहुत ही सुन्दर है।
कुल्लू से कुछ पहले रास्ते में हम भोजन के लिए रुके। वहीं पीछे व्यास नदी बह रही थी। मैं और मेरे साढ़ू विजय बाबू उस दिन तब तक नहाये नहीं थे, शेष सभी लोग घर से नहाकर चले थे। इसलिए हम नदी में नहाये। नदी का पानी बहुत ठंडा था। विजय बाबू तो एक-दो मग पानी डालकर बाहर आ गये और मैं आराम से कुछ देर तक नहाया। मेरी सारी थकान मिट गयी। फिर भोजन किया।
मनाली पहुँचने तक शाम हो गयी थी। वहाँ हमारे बैंक का होलीडे होम है। मैंने उसमें अपने लिए एक कमरा बुक करा लिया था। एक अन्य कमरा उसके बगल में ही हमने किराये पर ले लिया। दो कमरों में हम सबके सोने की व्यवस्था हो गयी। सब लोग थके हुए थे, इसलिए थोड़ा बाजार में घूमकर और भोजन करके सो गये।
दूसरे दिन हम मनाली के स्थानीय दर्शनीय स्थलों को देखने गये। मुख्य रूप से हिडिम्बा देवी का मंदिर देखा। अच्छा लगा। यह भीम की पत्नी हिडिम्बा की याद में बनाया गया है, जिसको देवी दुर्गा का अवतार माना जाता है। वहाँ से हमें मनु महाराज के मन्दिर में जाना था, जो काफी ऊपर है। बाकी लोग वहाँ तक चढ़ना नहीं चाहते थे, इसलिए मैं अकेला ही गया। मनु महाराज की कर्मस्थली होने के कारण ही यह शहर मनाली कहलाता है। मन्दिर बहुत ऊँचाई पर है, इसलिए वहाँ बहुत कम लोग जाते हैं।
वहाँ एक लगभग 80 साल की बुढ़िया बैठी थी। वह मुझसे पूछने लगी (इशारे से) कि तुम्हारी पत्नी कहाँ है? मैंने कहा कि उसे चढ़ाई चढ़ने में परेशानी होती है, इसलिए वह नीचे एक पुलिया पर बैठी है। वह समझ गयी कि मेरी पत्नी का वजन अधिक है। मैंने उसकी अनुमति लेकर उसका एक फोटो खींचा और उसे 10 का एक नोट भेंट किया। उसने मुझे बहुत आशीर्वाद दिये। थोड़ी देर बाद मैं लौट आया। कुछ लोग मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे और शेष लोग एक बाजार में चले गये थे।
वह बाजार या माॅल अच्छा खासा पिकनिक स्थल जैसा है। खाने-पीने की दुकानें भी हैं तथा मनोरंजन के अन्य साधन भी हैं। हमें खरीदारी तो क्या करनी थी, बस देख आये। पास में ही व्यास नदी बहती है। वहाँ कुछ लोग नदी के बीच में रस्सी पर झुलाते थे। मोलभाव करके हमने रेट तय किये। औरतों ने डर के कारण झूलने से मना कर दिया। केवल डाॅल, नवी, मोना और मैं झूले थे। सब लड़कियाँ तो डर के मारे रोने को आ गयी थीं, लेकिन मैं मजे में देर तक झूला। फिर जब मेरे हाथों में दर्द होने लगा, तो मैं भी उतर आया। मोना ने मेरे झूलने का वीडियो भी बना लिया था, जिसे देखकर मुझे आज भी आनन्द आता है।
दोपहर के भोजन के बाद शाम को हम सरकारी बाग में घूमने गये, जिसमें मामूली टिकट लगती है। यह बाग अच्छा है। हमने वहाँ हिमाचली पोशाकों में बच्चों के और महिलाओं के फोटो खिंचवाये। वहाँ कई साधारण झूले भी लगे हुए हैं। हम उन पर खूब झूले। फिर रात का भोजन करके जल्दी ही सो गये, क्योंकि अगले दिन हमें रोहतांग दर्रा देखने जाना था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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