आत्मकथा भाग-3 अंश-69

नयी फैकल्टी

सन् 2008 में श्री कक्कड़ के जाने के कुछ समय बाद तीन वरिष्ठ प्रबंधक फैकल्टी के रूप में हमारे संस्थान में भेजे गये। प्रधान कार्यालय ने यह तय किया था कि हमारे संस्थान का प्रयोग अब कम्प्यूटर के प्रशिक्षण के लिए कम और सामान्य विषयों के प्रशिक्षण के लिए अधिक किया जाएगा। इसीलिए वे तीनों अधिकारी भेजे गये थे। उनके तीनों के नाम थे- सर्वश्री सुनील कुमार झा, अमित जोशी और राजेश मूँदड़ा। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये क्रमशः बिहार, उत्तराखंड और राजस्थान के रहने वाले हैं।
वे तीनों प्रोमोटी तो नहीं थे, लेकिन उनकी मानसिकता भी कक्कड़ साहब जैसी थी और अपनी मानसिकता के अनुसार वे भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे। उदाहरण के लिए, हमने सोचा कि हिसाब-किताब का काम इनको दे दिया जाये, परन्तु उन्होंने लेने से साफ इंकार कर दिया। हालांकि सुविधायें लपकने में वे सबसे आगे रहते थे। सबने अपने लिए अलग कमरा, कम्प्यूटर, प्रिंटर और स्कैनर तक ले रखा था। लेकिन पढ़ाने के अलावा वे कोई कार्य नहीं करना चाहते थे। फिर भी कई बार गेस्ट फैकल्टी को बुलाना पड़ता था, क्योंकि कोई नया विषय आने पर वे हाथ हिला देते थे। इसलिए बांगिया जी शुरू से ही उनसे असंतुष्ट रहे और अधिकारियों से बातचीत में वे प्रायः कहा करते थे कि वह एक कक्कड़ गया और ये तीन कक्कड़ आ गये।
वैसे ये तीनों वरिष्ठ प्रबंधक मेरे साथ बहुत मित्रतापूर्ण थे। विशेष रूप से श्री राजेश मूँदड़ा मेरे बहुत निकट थे। बाद में श्री सुनील झा का प्रोमोशन हो गया, तो वे चले गये और श्री अमित जोशी मेरे साथ योग किया करते थे।
दीपांक की विविध गतिविधियाँ
मैं लिख चुका हूँ कि अपने पुत्र दीपांक का प्रवेश हमने जिस चितकारा इंजीनियरिंग संस्थान में कराया था, वहाँ के छात्रों को बहुत कुछ सिखाया जाता है और कई प्रकार की गतिविधियों में व्यस्त रखा जाता है। दीपांक भी इसका अपवाद नहीं था। एक बार अपने कालेज के वार्षिक समारोह में उसने फास्ट फूड का स्टाल लगाया था अपने तीन-चार साथियों के साथ मिलकर। खाना बनाने के लिए मैंने अपनी कैंटीन के प्रबंधक से बात करके दो-तीन लोगों की व्यवस्था कर दी थी। स्टाल काफी सफल रहा, परन्तु एक दिन दिनभर बारिश होती रही, जिससे बिक्री पर बुरा असर पड़ा। अन्त में जब हिसाब लगाया गया, तो दीपांक और उसकी टीम को 4 हजार रुपये का घाटा पड़ा। उसमें से आधा घाटा कैंटीन वाले ने उठाया और आधा हमने। हालांकि यह काम घाटे वाला रहा, लेकिन दीपांक को अच्छा अनुभव हो गया।
अगले साल के वार्षिक समारोह में दीपांक ने एक क्विज ईवेंट ‘प्रज्ञान’ आयोजित की थी, जिसमें कई टीमें बाहर से भी आयी थीं। यह ईवेंट काफी सफल रही। दीपांक इसका संयोजक (कोऑर्डिनेटर) था। इससे अगले साल फिर ‘प्रज्ञान-2’ आयोजित की गयी, जो अधिक बड़ी और विस्तृत थी। दीपांक इसका भी संयोजक था। उसने इसके लिए काफी भागदौड़ की, प्रायोजकों की व्यवस्था की और इंटरनेट पर इसकी एक अच्छी खासी वेबसाइट भी बना डाली। लेकिन ईवेंट होने से पहले ही वह एक ट्रेनिंग करने चला गया था, इसलिए उसके साथियों ने इसे सँभाला। यह ईवेंट भी काफी सफल रही।
दीपांक ने एक बार अपने एक वरिष्ठ छात्र की कम्पनी में भी साॅफ्टवेयर तैयार करने का काम किया था और उनसे काफी कुछ सीखा भी था। हालांकि इससे उसे कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन अनुभव अच्छा हो गया, जो आगे चलकर उसके बहुत काम आया।
दीपांक ने एक बार संगीत सीखने की कोशिश की। वह गिटार सीखने जाता था। उसने अपने तीन-चार दोस्तों के साथ मिलकर एक संगीत मंडली भी बना ली थी, जिसका नाम रखा था- ‘कूल हीटर्स’। उनके अनुरोध पर मैंने उनके लिए एक पाॅप गीत लिख डाला था, जो उन्हें काफी पसन्द आया और उसे संगीतबद्ध भी किया। दीपांक उसे गाता था। उस गीत की पहली लाइन नीचे दे रहा हूँ, शायद आपको भी अच्छी लगे। बाकी लाइनें मैं भूल गया हूँ और दीपांक से भी यह गीत खो गया है। यह मेरे द्वारा लिखा गया पहला और अभी तक अन्तिम पाॅप गीत है-
दिल ने पुकारा, तुमको पुकारा, ओ मेरी महबूबा।
इन गतिविधियों के साथ-साथ मेरा दीपांक से यह कहना था कि पढ़ाई में किसी भी तरह की बाधा या लापरवाही नहीं होनी चाहिए। वह भी इसका ध्यान रखता था। वह हालांकि अधिक अच्छे नम्बर नहीं ला पाता था, लेकिन आराम से पास हो जाता था। कभी-कभी उसकी उपस्थिति कम हो जाती थीं, तो कालेज से हमारे पास पत्र आ जाता था। इसलिए मैं उसे लगातार कक्षाओं में जाने को कह देता था। इससे किसी तरह उसकी उपस्थिति पर्याप्त हो जाती थीं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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