आत्मकथा भाग-3 अंश-68

‘हीरा’ अधिकारी

एक बार बांगिया जी नये अधिकारियों के चयन के लिए इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य बनाये गये। वे इंटरव्यू लेने दिल्ली गये। जब वहाँ से लौटे, तो सबके सामने कहने लगे कि मैंने एक ऐसा अधिकारी इस संस्थान के लिए चुना है, जो बहुत ही योग्य है और हीरे जैसा है। सुनकर सबको बहुत प्रसन्नता हुई। कुछ दिन बाद ही स्केल 2 के दो अधिकारियों के हमारे संस्थान में आगमन की सूचना प्राप्त हुई। वे थे- एक, श्रीमती गुंजन यादव और दूसरे श्री नजमुद्दीन। पहले उनके बैठने के लिए बांगिया जी ने मेरा कमरा चुना। वहाँ केवल एक अधिकारी और बैठ सकता था।
लेकिन मैंने कहा कि बाहर पहले से ही दो अधिकारियों के लिए स्थान खाली है, वहीं बैठा दीजिए। अगर कोई असुविधा होगी, तो बाद में देख लेंगे। इस पर वे मान गये। बांगिया जी ने मुझसे कहा कि जो सीटें उनके बैठने के लिए तय की हैं, उन पर उनके लिए ‘स्वागत सन्देश’ लगा दो। मैंने कहा- ठीक है, लग जाएगा। व्यंग्य में मैंने यह भी कहा कि उनके स्वागत में एक बैनर बनवाकर गेट पर लगा दिया जाए। इस पर वे नाराज होकर वहाँ से चले गये।
खैर, जब वे अधिकारी आये, तो सब बहुत खुश हुए। बांगिया जी नजमुद्दीन को हीरा आदमी बता रहे थे। लेकिन एक सप्ताह में ही सबको और स्वयं बांगिया जी को भी पता चल गया कि यह आदमी परले दर्जे का मूर्ख और गधा है। उसे किसी भी चीज का ज्ञान नहीं था, यहाँ तक कि कम्प्यूटर के बारे में प्राथमिक ज्ञान भी नहीं था। उसमें न तो सीखने की ललक थी और न योग्यता ही। उसका मानसिक स्तर बहुत कम था। वास्तव में उसके पिता कहीं सरकारी डाक्टर थे और उन्होंने किसी तरह उसे किसी घटिया कालेज में इंजीनियरिंग में प्रवेश दिला दिया था। वहाँ से वह डिग्री भी ले आया था, लेकिन सीखा कुछ नहीं था।
यह जानकर सबने सिर पीट लिया और समझ लिया कि यह आदमी एक-दो तो क्या 10-20 साल में भी साॅफ्टवेयर बनाना या सुधारना नहीं सीख सकता। इसलिए उसे कोई जिम्मेदारी का काम देना सम्भव ही नहीं था। ऐसे आदमी का चयन बांगिया जी ने किया था, इसलिए पीठ पीछे सब उनका भी मजाक बनाते थे।
तीन अधिकारियों का स्थानांतरण
उस कार्यालय में तीन-चार अधिकारी ऐसे थे, जो मेरी बहुत इज्जत करते थे और मुझे सभी कार्यों में समर्थन देते थे। शायद इसी कारण बांगिया जी उनसे चिढ़ते थे तथा उनका स्थानांतरण कराने की कोशिश करते थे। अन्ततः उनकी कोशिशें रंग लायीं और उनमें से तीन के स्थानांतरण का आदेश आ गया। एक श्री कनिष्क बाजपेयी अपने इलाहाबाद मंडल में भेजे गये थे और शेष दोनों श्री विक्रम सिंह और श्री महेश्वर सिंघा प्रोजैक्ट ऑफिस, मुम्बई में लगाये गये थे, जहाँ गौड़ साहब पहले से थे। इन तीनों से मेरी बहुत घनिष्टता थी और मैं एक बार श्री महेश्वर सिंघा के विवाह में शामिल होने मेरठ भी गया था। इन अधिकारियों के स्थानांतरण से मुझे बहुत धक्का लगा, क्योंकि वे सदा मेरा समर्थन करते थे और मैं भी उनको बांगिया जी के कोप से बचाने का प्रयास करता था।
वैसे उस कार्यालय में एक मुख्य प्रबंधक और थे- श्री आर.एन. कक्कड़। वे फैकल्टी के रूप में संस्थान में आये थे और दो-तीन वर्ष में ही रिटायर होने वाले थे। वे प्रोमोटी थे अर्थात् पहले बाबू रह चुके थे और फिर अधिकारी बने थे। ऐसे लोगों के बारे में यह माना जाता है (और प्रायः यह सत्य भी है) कि उनकी मानसिकता हमेशा बाबुओं जैसी रहती है। इसलिए वे कोई जिम्मेदारी का काम नहीं लेना चाहते थे और पढ़ाने में भी बेकार थे। अनेक प्रशिक्षणार्थी मुझसे आकर कहते थे कि इनको फैकल्टी किसने बना दिया है?
कक्कड़ साहब बांगिया जी को कोई भाव नहीं देते थे, इसलिए बांगिया जी उनसे और भी अधिक असंतुष्ट रहते थे। बांगिया जी व्यंग्य में उनको ‘साँड़ जी’ कहते थे, परन्तु उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते थे। वैसे मेरे साथ कक्कड़ साहब का व्यवहार अच्छा और मित्रतापूर्ण था। लेकिन बांगिया जी के सहायक महाप्रबंधक बनने के बाद शीघ्र ही कक्कड़ साहब का स्थानांतरण सेवा शाखा, कलकत्ता में हो गया, जबकि वे लखनऊ में स्थानांतरण कराना चाहते थे, क्योंकि वहीं उनकी कोठी भी बनी हुई है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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