आत्मकथा भाग-3 अंश-67
पुस्तकालय की किताबों का मामला
मेरे और बांगिया जी के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। हालांकि मैं तनावमुक्त रहने की पूरी कोशिश करता था और रहता भी था। पहले पुस्तकालय को मैं सँभालता था और उसको मैंने ही व्यवस्थित किया था। पुस्तकालय के लिए आवश्यक पुस्तकें भी मैं ही खरीदता था। बांगिया जी ने सहायक महा प्रबंधक बनते ही सबसे पहले पुस्तकालय की जिम्मेदारी मुझसे ले ली। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन मैं अपनी पसन्द की पुस्तकें पढ़ने को अवश्य लेता था, जिसे बांगिया जी रोक नहीं सकते थे।
एक बार मैं बैंक में सीएआईआईबी की भाग 2 की परीक्षा दे रहा था। उसकी तैयारी के लिए मैंने तीन किताबें पुस्तकालय से ले लीं, जो कि वहाँ उपलब्ध थीं। नियमानुसार कोई व्यक्ति किसी पुस्तक को 14 दिन के लिए ही ले सकता है, पर इस नियम को मानता कोई नहीं। इसलिए मैंने भी दो माह के लिए पुस्तकें ले लीं। बांगिया जी को पता चला कि मैं पुस्तकालय की पुस्तकें लेकर परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ, तो उन्होंने आपत्ति की। मैंने कहा- ”इसमें गलत क्या है? सभी मंडलीय कार्यालयों में इन परीक्षाओं की पुस्तकों के कई-कई सेट रखे जाते हैं, जो सबको जारी किये जाते हैं। पुस्तकें होती ही इसलिए हैं। मैं परीक्षा होते ही पुस्तकें वापस कर दूँगा, क्योंकि किसी दूसरे को तो अभी इनकी जरूरत है नहीं।“ परन्तु बांगिया जी नहीं माने और कहा कि पुस्तकें तुरन्त वापस कर दूँ। मैंने इसके लिए साफ इनकार कर दिया। हालांकि उन तीनों पुस्तकों का मूल्य केवल 700 रुपये था और मैं सरलता से खरीद सकता था, परन्तु मैंने इसे अनावश्यक समझा।
इस पर नाराज होकर बांगिया जी ने मुझे एक पत्र लिख डाला और किताबें तत्काल वापस करने के लिए कहा। साथ ही उन्होंने धमकी दी कि यदि तीन दिन के अन्दर किताबें वापस नहीं की गयीं, तो उनका मूल्य मेरे वेतन से काट लिया जाएगा। यह पत्र मुझे बहुत अपमानजनक लगा। पानी सिर से ऊपर जा रहा था। इसे मैं सहन नहीं कर सकता था। इसलिए मैंने उस पत्र का एक लम्बा जबाब तैयार किया। उसमें मैंने उन पर स्पष्ट आरोप लगाया कि जब से आप इस संस्थान में आये हैं, तब से मुझे नुकसान पहुँचाने और उपेक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। मैंने उदाहरण के रूप में फोन और मोबाइल सुविधा वापस लेने में उनकी भूमिका का उल्लेख किया और बाहरी अधिकारियों के सामने मेरा अपमान करने का भी आरोप लगाया। मैंने यह भी लिख दिया कि आप मेरे सारे कार्य छीनकर बैंक को नुकसान पहुँचा रहे हैं, क्योंकि बैंक एक मुख्य प्रबंधक की सेवाओं का उपयोग नहीं कर पा रहा है।
साथ ही मैंने यह भी लिख दिया कि किसी मुख्य प्रबंधक के वेतन से सिर्फ इसलिए कटौती करना कि पुस्तकालय की कुछ पुस्तकें समय से नहीं लौटायी गयी हैं, घोर आपत्तिजनक और अपमानजनक है। इसको कोई सहन नहीं कर सकता, इसलिए ऐसी हरकत से बाज आयें। मैंने उस पत्र की तीन-चार प्रतियाँ तैयार कीं और उस पत्र में भी लिख दिया कि इसकी प्रतियाँ प्रधान कार्यालय के किस-किस वरिष्ठ अधिकारी को भेजी जा रही हैं।
मेरे पत्र को पढ़कर उनके होश ठिकाने आ गये। उन्हें लगा कि यदि हैड ऑफिस तक यह बात पहुँच गयी, तो उनका बहुत मजाक बनेगा और इमेज भी खराब होगी। इसलिए वे समझौते की बात करने लगे। उन्होंने मुझे समझौते के लिए बुलाया। उन्होंने मुझसे कहा कि आप मेरी किताबें लौटाने वाली बात मान लीजिए और मैं आपकी सारी बातें मान लूँगा। वे पूछने लगे कि मैं क्या चाहता हूँ। मैंने कहा कि मैं गौड़ साहब के समय जो-जो कार्य कर रहा था, उनको वापस चाहता हूँ। इस पर वे राजी हो गये और सारे कार्य मुझे वापस मिल गये। मैंने उनसे यह भी कहा कि मैंने हमेशा आपको सहयोग दिया है और आगे भी देता रहूँगा। समझौता हो जाने के अगले ही दिन मैं चंडीगढ़ से तीनों किताबें खरीद लाया और बैंक की किताबें वापस कर दीं।
उस परीक्षा सीएआईआईबी (भाग 2) के तीनों पेपर मैंने एक बार में ही पास कर लिये थे और परीक्षा पास करते ही सबसे पहले मैंने वे तीनों किताबें संस्थान के पुस्तकालय को ही दान कर दीं, क्योंकि अब वे मेरे किसी काम की नहीं रही थीं और अन्य अधिकारी उनसे लाभ उठा सकते थे।
इसके बाद बांगिया जी के व्यवहार में कुछ सुधार हुआ। मैंने प्रधान कार्यालय के कुछ उच्च अधिकारियों को भेजने के लिए अपने पत्र की जो प्रतियाँ तैयार की थीं, वे मैंने कभी नहीं भेजीं, क्योंकि मैं केवल बांगिया जी को डराना चाहता था और वास्तव में उनको कोई हानि नहीं पहुँचाना चाहता था। इसलिए अपना उद्देश्य पूरा होते ही मैंने पत्र की उन प्रतियों को अपने संस्थान के एक अधिकारी के सामने फाड़कर कूड़ेदान को समर्पित कर दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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