आत्मकथा भाग-3 अंश-66

लैपटाॅपों के लिए माउस

जिन बातों के बारे में बांगिया जी कुछ नहीं जानते थे, उनमें भी अपनी ही मनमानी चलाते थे और सारे निर्णय बिना मुझसे सलाह लिये कर लेते थे। उदाहरण के लिए, एक बार उन्होंने तय कर लिया कि प्रशिक्षणार्थियों को जो लैपटाॅप दिये जाते हैं, उनके साथ माउस भी देना चाहिए, क्योंकि सबको माउस से कार्य करने की आदत होती है। यह एक अच्छा निर्णय था, लेकिन इसका पालन बुरी तरह किया गया। बांगिया जी अपनी उतावली में बिना यह पूछे कि लैपटाॅपों में कैसा माउस लगता है, दूसरी तरह के 10 माउस खरीद लाये। जब मुझे पता चला कि उन्होंने क्या मूर्खता की है, तो मैंने उनका ध्यान इस ओर खींचा और सारे माउस स्वयं बदलवाकर लाया।
बेचारा पढ़ा-लिखा चपरासी
हमारे ऑफिस में जो कम्पनी रखरखाव की सेवाएँ देती थी, उसे ऑफिस के कार्य के लिए चपरासी भी देना पड़ता था, क्योंकि संस्थान में कोई चपरासी नहीं था। एक बार हमारा चपरासी, जो बहुत कम पढ़ा था, वह काम छोड़कर चला गया। उसकी जगह ‘प्रदीप’ नामक जो चपरासी आया, वह इंटर तक पढ़ा हुआ था और अंग्रेजी भी जानता था। वह काम अच्छा करता था और मैं उससे काफी संतुष्ट था। परन्तु पढ़ा-लिखा होने का गुण ही उसके लिए अभिशाप बन गया, क्योंकि बांगिया जी चाहते थे कि वह किसी भी कागज को न पढ़े। यहाँ तक कि उसे यह भी पता न चले कि उन्होंने कितने रुपये बैंक से निकाले हैं। इस कारण बैंक शाखा का जो कार्य चपरासी किया करता था (रुपये वगैरह लाने का) उस काम के लिए खुद केयर टेकर को जाना पड़ता था। आगे चलकर बांगिया जी उस चपरासी प्रदीप से इतना चिढ़ने लगे कि उन्होंने केयर टेकर को उसे हटाने का स्पष्ट आदेश दे दिया। बेचारा प्रदीप बहुत दुःखी होकर गया। मुझे भी बड़ा दुःख हुआ, लेकिन मैं इसमें कुछ कर नहीं सकता था।
हिसाब-किताब का मामला
वैसे बांगिया जी बाहर वालों के लिए बहुत उदारता का व्यवहार करते थे और अपनी दरियादिली दिखाते थे। एक बार जब मैं छुट्टी पर आगरा गया था, तो उन्होंने कैंटीन वाले को सात हजार रुपये एडवांस दे दिये और उसकी प्रविष्टि एडवांस वाले रजिस्टर में नहीं की। बाद में उसका बिल आया, तो बिना एडवांस काटे ही पूरा बिल पास कर दिया और उसका भुगतान भी कर दिया। इसका पता दो-तीन महीने बाद तब चला, जब लेखाबन्दी की जा रही थी। लेकिन तब तक वह कैंटीन वाला अपना पूरा भुगतान लेकर चला गया था और उसकी जगह कोई दूसरा कैंटीन वाला आ गया था, इसलिए उससे सात हजार की वसूली नहीं हो पायी।
यह मामला बहुत विकट था। सारी गलती बांगिया जी की थी, क्योंकि उन्होंने अपने ही स्तर पर एडवांस मंजूर करके दे दिया था और हिसाब-किताब रखने वाले अधिकारियों को इसकी सूचना नहीं दी थी और न उस राशि को काटने की चिन्ता की थी। ऐसी स्थिति में मैंने बांगिया जी को इस संकट से निकाला। मैंने उनकी अनुमति से गेस्ट फैकल्टी को भुगतान और पानी के टैंकर खरीदने के नाम पर इस राशि को दो-तीन माह में एडजस्ट किया। जब सारी राशि एडजस्ट हो गयी, तब उनको भी शान्ति मिली। इसके साथ ही मैंने उनसे निवेदन किया कि बाहर वालों से इतनी दरियादिली मत दिखाया करिए।
मैं गौड़ साहब के समय से ही हिसाब-किताब रखता था और अधिकांश वाउचर भी स्वयं बना लेता था, जिस पर दो अधिकारियों के हस्ताक्षर होते थे। इतना ही नहीं, मैं रोजाना के खर्चों के लिए कुछ नकद राशि भी अपने पास रखता था, ताकि संस्थान के लिए कोई वस्तु आवश्यक होने पर तत्काल खरीदी जा सके और उसका तुरन्त भुगतान भी किया जा सके। मैं एक बार में 5 हजार रुपये एडवांस लेता था और जब इतनी राशि के बिल एकत्र हो जाते थे, तो उनका सारांश बनाकर जमा कर देता था तथा फिर से एडवांस ले लेता था। ऐसा मैं प्रारम्भ से ही कर रहा था और कोई समस्या नहीं होती थी। लेकिन बांगिया जी ने हिसाब-किताब का काम तो दूसरों को दिया ही, नकदी (पैटी कैश) रखने का काम भी मुझसे ले लिया। मैंने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं की और सारे हिसाब के साथ बकाया राशि भी उनको दे दी।
जब लेखाबन्दी होने लगी, तो पता चला कि मेरे द्वारा एडवांस लिये गये 5 हजार रुपयों का हिसाब नहीं है। यह जानकर मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैंने पूरा हिसाब दिया था। मैंने बांगिया जी से पूछा भी कि इतनी बड़ी राशि कहाँ चली जायेगी? तो वे बोले- ‘काला चोर ले गया।’ यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा, क्योंकि वे प्रकारान्तर से मुझे ही ‘चोर’ कह रहे थे। उस दिन सायं वापस जाने का समय हो गया था। इसलिए मैं घर लौट आया। जब मैं घर आया, तो इसी मामले के कारण थोड़ा सुस्त था। श्रीमती जी ने मुझे सुस्त देखकर पूछा भी कि क्या बात है, आज सुस्त क्यों हो? मैंने कहा- ‘कोई बात नहीं है, थक गया हूँ।’ यह सुनकर श्रीमतीजी ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
अगले दिन ऑफिस जाते ही मैंने पहला काम यह किया कि पिछले 6 माह का पूरा हिसाब वाउचरों से मिलाकर देखा और पता लगा लिया कि एक बिल जो 5 हजार से कुछ अधिक राशि का था, मैंने जमा किया था, परन्तु हिसाब बनाने वाले अधिकारी की गलती से कम्प्यूटर में नहीं चढ़ाया गया था, जिस कारण एडवांस ली गयी 5 हजार की रकम एडजस्ट नहीं हुई। यह पता लगाते ही मैंने बांगिया जी को इसकी जानकारी दी और उन्होंने भी देखकर मान लिया कि हाँ, यह चूक हुई है। अपना पक्ष साफ होने पर मुझे बहुत सन्तोष हुआ। शाम को घर जाकर मैंने श्रीमती जी को बताया कि कल मैं क्यों सुस्त था और आज उस मामले को कैसे निपटाकर आया हूँ। यह जानकर उनको भी खुशी हुई।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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