आत्मकथा भाग-3 अंश-65
गमलों का मामला
कुछ समय बाद बांगिया जी को मेरे खिलाफ पहला ‘मामला’ मिल ही गया। हमारे संस्थान में एक माली रहता था। वह लाॅन और उसमें उगाये गये पेड़-पौधों की देखभाल करता था। एक दिन हमारी श्रीमतीजी, जो मुझे सुबह ऑफिस छोड़ने आयी थीं, ने उससे कहा कि हमें फूलों वाले दो पौधे दे दो। हम उन्हें अपने खाली गमलों में लगा देंगे। माली ने कहा कि पूरे गमले ही ले जाओ। यह सुनकर उन्होंने फूलों वाले दो गमले गाड़ी में रखवा लिये और कहा कि हम खाली गमले ले आयेंगे।
इस बात की जानकारी जाने कैसे बांगिया जी को हो गयी और उन्होंने मुझ पर गमलों की चोरी का आरोप लगा दिया। उन्होंने सीधे तो मुझसे कुछ नहीं कहा, लेकिन अन्य अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी और माली को भी बहुत डाँटा। जब मुझे पता चला, तो मुझे बहुत बुरा लगा। गमले जैसी चीजें पहले भी संस्थान से दूसरे उच्च अधिकारियों के घरों पर जाती रही थीं। दस-बीस रुपये के गमले कोई ऐसी चीज नहीं हैं कि उनकी चोरी का मामला बनता हो। फिर भी मामला समाप्त करने के लिए मैंने वे दोनों गमले वापस संस्थान में रखवा दिये और साथ में चार नये खाली गमले खरीदकर संस्थान में माली को दे दिये कि इनमें हमारे लिये फूलों के पौधे लगा देना। पौधे खरीदने के लिए पैसे भी मैंने माली को दे दिये, जो 10-20 रुपये ही होते थे।
जब गमले वापस रखने की खबर बांगिया जी को मिली, तो वे आग बबूला हो गये और रात के समय ही ड्राइवर और केयर टेकर को 4 पौधे वाले गमले देकर कहा कि इनको सिंघल के घर दे आओ तथा उनसे यह भी कह दिया कि यदि वह लेने से मना करें, तो गमले वहीं छोड़कर चले आना। जब वे हमारे घर आये, तो मैंने स्वाभाविक रूप से मना किया, तो वे कहने लगे कि हमारी नौकरी का सवाल है, आप इनको रख लीजिए, फिर भले ही वापस कर देना। यह सुनकर हमने गमले रख लिये और अगले दिन प्रातः ही उनको वापस छोड़ आये।
इधर बांगिया जी मुझे फँसाने के लिए यह सारा मामला प्रधान कार्यालय लिखकर भेजना चाहते थे, ताकि मेरी इमेज खराब हो। तभी उनकी अपने किसी मित्र अधिकारी से बात हुई, तो उसने बांगिया जी से कहा कि यदि ऐसे तुच्छ मामले प्रधान कार्यालय लिखकर भेजोगे, तो सिंघल का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन तुम्हारा खूब मजाक बनेगा। तब बांगिया जी की अक्ल ठिकाने आयी और यह मामला समाप्त हुआ। लेकिन इसका यह परिणाम अवश्य हुआ कि मेरे मन में बांगिया जी के लिए जो थोड़ी-बहुत इज्जत बची थी, वह भी समाप्त हो गयी और मैं अधिक सावधान रहने लगा।
बांगिया जी की मनमानी
लेकिन कहावत है कि कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती, चाहे उसे वर्षों तक नली में दुबकाये रखा जाये। इसी तरह बांगिया जी का स्वभाव तब भी नहीं बदला और वे मौका देखकर मेरा अपमान करने की कोशिश करते थे। यदि मैं अपनी ओर से कोई निर्णय लेता था, तो वे तत्काल उस पर उँगली उठाते थे, भले ही वह कार्य सही किया हो। गौड़ साहब के समय संस्थान को पूरी तरह लगभग मैं ही सँभाल रहा था। संस्थान के अधिकांश कार्यों में मेरा दखल रहता था। वास्तव में विभिन्न कार्यों के लिए हमने कमेटियाँ बना रखी थीं, जिनमें दो या तीन अधिकारी थे। मैं उन सभी कमेटियों का प्रभारी था, यानी सभी कमेटियों के कार्यों पर नजर रखता था।
उन्होंने पहला काम तो यह किया कि सारी कमेटियों के कामों के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। उदाहरण के लिए, इनवेंट्री कमेटी को सारे सामान की सूची बनानी थी और सुधारनी थी। इस कमेटी में जो अधिकारी थे, बांगिया जी ने उनसे तो कुछ नहीं कहा और मुझसे कहने लगे कि दो दिन में पूरी सूची बनाकर दो, नहीं तो प्र.का. को रिपोर्ट कर दूँगा। खैर, किसी तरह मैंने सूची बनाकर उनको दे दी। इसी तरह एकाउंट के इंस्पेक्शन के समय जो कमियाँ बतायी गयी थीं, उनको दूर करने का काम एकाउंट कमेटी का था, लेकिन बांगिया जी ने यह जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर डाल दी। किसी तरह मैंने यह भी निपटाया। ऐसे एक दो नहीं, कई मामले हुए।
यदि मेरी जगह कोई दूसरा होता, तो ऐसे वातावरण में तनावग्रस्त हो जाता, परन्तु मैं योगाभ्यास करता था, इसलिए तनाव से यथासम्भव बचा रहता था। जब उन्होंने देखा कि यह तो सारे काम कर डालता है, तो धीरे-धीरे वे उन कामों को मुझसे छीनने लगे, जो मैं पिछले तीन-चार साल से कर रहा था। उदाहरण के लिए, मैं शाखाओं से आने वाले पत्रों और डाटा की सीडी वगैरह का रखरखाव करता था। पत्रों को विभिन्न अधिकारियों को देकर शाखाओं की समस्याओं को हल कराता था। बांगिया जी ने सबसे पहले यह कार्य अपने हाथ में ले लिया। वे डाक आने पर खुद ही खोल लेते थे और वहीं से अधिकारियों को पकड़ा देते थे। कई बार तो वे सीडी और पत्रों पर क्रम संख्या भी नहीं डालते थे, जिससे आगे चलकर समस्याएँ उत्पन्न होने लगीं। यह काम हाथ से निकल जाने पर हालांकि मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगा।
हमारे संस्थान में हर दो साल बाद बाहर से कोई अधिकारी इंस्पेक्शन करने आते थे। कई बार उनको बाहर अच्छे होटल में खाना खिलाया जाता था। जब गौड़ साहब थे, तो मैं हर बार उनके साथ जाता था। लेकिन बांगिया जी ने मेरे साथ पहली बार ऐसा किया कि जब उनको खाना खिलाने ले गये, तो मुझसे जूनियर कई अधिकारियों को साथ में ले गये, लेकिन मुझे छोड़ गये, जबकि इंस्पेक्शन की रिपोर्ट पर मैं ही संस्थान की ओर से हस्ताक्षर करता था। स्वाभाविक रूप से मुझे एक बाहरी अधिकारी के सामने इस प्रकार उपेक्षित होने पर अपमान अनुभव हुआ। उस समय तो मैं चुप रहा, लेकिन जब वे लौटकर आये, तो मैंने पूछ लिया कि मुझे क्यों नहीं ले गये? तो वे बोले कि हम नाॅन-वेज (अर्थात् माँस) खाने गये थे, इसलिए आपको नहीं ले गये। यह बात भी झूठ थी, क्योंकि जो बिल उन्होंने जमा किया था, वह ‘अनुपम स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट’ का था, जहाँ केवल शाकाहारी भोजन मिलता है। मैं चाहता तो इसी बात पर उनके झूठ की पोल खोल सकता था, परन्तु खाने-पीने की चीजों के लिए मैं झगड़ा नहीं करना चाहता था, इसलिए चुप रह गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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