आत्मकथा भाग-3 अंश-64
श्रीमतीजी की दुर्घटना
मैं लिख चुका हूँ कि ड्राइवर हट जाने के बाद श्रीमतीजी मुझे प्रतिदिन कार में ऑफिस छोड़ने और लेने आया करती थीं। रास्ता मुश्किल से 1 किमी का था और सड़क भी लगभग खाली रहती थी, इसलिए सड़क पर कभी हमें दुर्घटना का सामना नहीं करना पड़ा। परन्तु एक बार जब श्रीमती जी मुझे लेने आ रही थीं, तो बी.ई.एल. की कालोनी के सामने से हमारे संस्थान को जाने वाली गली में एक मैटाडोर सामने से बहुत तेजी से चलती आ रही थी। खतरा सामने देखकर श्रीमतीजी ने तेजी के गाड़ी को बायीं ओर मोड़ लिया, हालांकि पूरा नहीं मोड़ पायीं, क्योंकि वहाँ कँटीले तार लगे हुए थे।
फिर भी जितना मोड़ सकीं, उतने से ही वे एक खतरनाक दुर्घटना बच गयी और मैटाडोर हमारी गाड़ी के पिछले हिस्से से टकरायी। अगर श्रीमतीजी ने तेजी से मोड़ी न होती, तो यह निश्चित था कि आमने-सामने की भयंकर टक्कर होती और उसमें श्रीमतीजी का बचना मुश्किल था। ईश्वर ने ही उस दिन उनकी रक्षा की। इस दुर्घटना के बाद मैटाडोर वाला अपनी गाड़ी भगा ले गया और उसका नम्बर भी पढ़ा नहीं जा सका। हमने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखायी, लेकिन नम्बर न होने के कारण पुलिस ने भी हाथ खड़े कर दिये।
लेकिन एक दिन बड़ी दुर्घटना हो ही गयी। श्रीमतीजी एक पड़ोसन के साथ अपने ही सेक्टर के बाजार जा रही थीं। तभी किसी गली में से बायीं ओर से एक बाइक सवार तेजी से आया। वह बाइक चलाते समय मोबाइल से बात करता जा रहा था, इससे उसने गाड़ी की आवाज और हार्न नहीं सुना। बाइक बड़ी जोर से हमारी कार से आगे के भाग से टकरायी। इससे कार का सामने का और बगल का आगे का शीशा तो टूटा ही, बोनट भी कई जगह से पिचक गया। पड़ोसन और श्रीमतीजी दोनों बाल-बाल बच गयीं। लेकिन बाइक सवार के पैर में फ्रैक्चर हो गया। वह गिरने के बाद बार-बार ‘मेरा मोबाइल’ ‘मेरा मोबाइल’ चीख रहा था। उसके एक हाथ में मोबाइल था, जिससे वह ब्रेक नहीं लगा सका। उसकी बाइक का आगे का कवर तथा कुछ अन्य पार्ट टूट गये थे।
संयोग से वह आदमी श्रीमतीजी की किटी पार्टी की एक सदस्या का कर्मचारी था। इस दुर्घटना के कारण दोनों में झगड़ा भी हो गया। मामला पुलिस में भी गया। ऐसे मामलों में हमेशा कार सवार की गलती मानी जाती है, चाहे किसी भी गलती हो। अन्त में दोनों पक्षों में यह समझौता हुआ कि उनकी बाइक की मरम्मत हम करायेंगे और इलाज के बाद पैर ठीक नहीं हुआ तो उसका मुआवजा भी हम देंगे। अपनी गाड़ी की रिपेरिंग तो हमें करानी ही थी। उसका बीमा था, जिससे खर्च कम पड़ा। बाइक का तो बीमा भी नहीं था। उसकी रिपेरिंग का सारा खर्च हमें देना पड़ा। लेकिन सौभाग्य से उस बाइक सवार का पैर ठीक हो गया, इससे आगे का खर्च हमें नहीं देना पड़ा।
इस दुर्घटना के बाद श्रीमतीजी गाड़ी चलाने में बहुत घबराती थीं, हालांकि गलती उनकी नहीं थी। वे कई महीने बाद ही सामान्य हो पायीं।
गौड़ साहब का स्थानांतरण
सन् 2008 में बांगिया जी का प्रोमोशन हुआ और वे सहायक महा प्रबंधक बन गये। हम सबको आशा थी कि अब वे संस्थान से कहीं और भेज दिये जायेंगे। लेकिन पता नहीं कैसे प्रधान कार्यालय ने गौड़ साहब का स्थानांतरण मुम्बई कर दिया और उनके स्थान पर बांगिया जी को हमारे संस्थान का प्रमुख बना दिया। जिस दिन यह आदेश आया, तब तक गौड़ साहब की विदाई नहीं हुई थी, लेकिन बांगिया जी इतने उतावले हैं कि उनके रहते हुए ही उन्होंने संस्थान प्रमुख के रूप में सभी अधिकारियों की बैठक ले डाली।
गौड़ साहब के जाने से मुझे बहुत धक्का लगा, क्योंकि उनके रहते हुए बांगिया जी नियंत्रण में रहते थे। अब सर्वेसर्वा बन जाने पर यह तय था कि वे मुझे परेशान करने की हर सम्भव कोशिश करेंगे। वैसा हुआ भी, परन्तु मैं पहले से ही सावधान था और अपनी ओर से कोई ऐसा मौका नहीं देता था कि उनको उँगली उठानी पड़े। वैसे प्रत्यक्ष रूप में वे मुझसे कुछ नहीं कहते थे, लेकिन पीठ पीछे मेरी जड़ काटने की कोशिश करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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