आत्मकथा भाग-3 अंश-63
दीपांक का इंजीनियरिंग में प्रवेश
मैं लिख चुका हूँ कि दीपांक इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए कोचिंग कर रहा था। उसकी कोचिंग अच्छी थी और अध्यापक बहुत मेहनत से पढ़ाते थे। लेकिन दुर्भाग्य से उसके भौतिक विज्ञान के शिक्षक का एक दुर्घटना में देहान्त हो गया। कई दिन बाद उनकी जगह कोचिंग में जो दूसरे अध्यापक आये, वे उतने अच्छे नहीं थे। इससे दीपांक की तैयारी कमजोर हो गयी। वह 2007 में आई.आई.टी. की प्रवेश परीक्षा में बैठा। गणित और रसायन विज्ञान में उसके अंक अच्छे थे, परन्तु भौतिक विज्ञान में क्वालीफाई भी नहीं कर पाया। एआईईईई में उसकी रैंक अच्छी थी, पर इतनी अच्छी नहीं थी कि किसी सरकारी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलाॅजी में उसको प्रवेश मिल जाता।
इसलिए हमारा विचार उसे किसी अच्छे प्राइवेट कालेज में प्रवेश दिलाने का हुआ। सौभाग्य से उसे राजपुरा (पंजाब) में स्थित चितकारा इंस्टीट्यूट में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में बी.टेक. में प्रवेश मिल गया। राजपुरा चंडीगढ़/पंचकूला से मुश्किल से 25 किमी दूर है और कालेज की बसें दोनों जगह से आती-जाती हैं। इस संस्थान की ख्याति इस बात में थी कि वहाँ विद्यार्थियों को बहुत कुछ सिखाया जाता था और कोर्स पूरा करने से पहले ही उनकी अच्छी प्लेसमेंट हो जाती थी। अन्य सरकारी या प्राइवेट संस्थानों में यह बात नहीं थी। दीपांक का प्रवेश हमने उसमें करा दिया। उसकी काउंसलिंग जालंधर में हुई थी, जहाँ मुझे दो बार जाना पड़ा था।
चितकारा इंस्टीट्यूट ठीक वैसा ही निकला, जैसी उसकी ख्याति है। दीपांक बहुत कुछ सीखने लगा और स्वतंत्र रूप से वेबसाइट भी डिजायन करने लगा। पढ़ाई के साथ-साथ वह अन्य बहुत से कार्य कर रहा था और सीख रहा था। उसने एक प्रोजेक्ट के रूप में एक ऐसी वेबसाइट बनायी जिसमें किसी होटल शृंखला के किसी भी शहर के होटल में किसी भी कमरे का आरक्षण हो सकता था तथा और भी कई कार्य हो सकते थे। दीपांक को ऐसे कार्य करते देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता होती थी।
दीपांक को साथी भी अच्छे मिल गये थे। उसने 5-6 लड़कों का समूह बना लिया था, जो पंचकूला और आसपास ही रहते थे। सभी बहुत ही योग्य और मेहनती हैं। वे हमारे घर भी आया करते थे। इससे मैं दीपांक की प्रगति और संगति पर नजर रखे रहता था। उसकी फीस लगभग 85 हजार प्रतिवर्ष थी। बस का किराया और विविध खर्च मिलाकर मुझे हर साल लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये उसकी पढ़ाई के ऊपर खर्च करने पड़ते थे। लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि मुझे इस खर्च की व्यवस्था करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। कभी-कभी अपनी पुस्तकों से होने वाली छुटपुट आय से इसमें काफी सहायता मिल जाती थी। इसलिए मुझे उसकी पढ़ाई के लिए ऋण नहीं लेना पड़ा।
मोना की पढ़ाई
हमारी पुत्री आस्था (मोना) पंचकूला सेक्टर 15 के न्यू इंडिया सीनियर सेकेंडरी गर्ल्स स्कूल में पढ़ रही थी। कक्षा 7 और 8 में वह अपनी कक्षा में प्रथम या द्वितीय रही। उस स्कूल में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों की अलग-अलग कक्षायें होती थीं। अभी तक मोना हिन्दी माध्यम से पढ़ रही थी। लेकिन उसका मन कक्षा 9 में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने का था, क्योंकि आगे की पढ़ाई करने के लिए अंग्रेजी माध्यम आवश्यक था। अतः हमने वहाँ की अध्यापिकाओं से सलाह लेकर उसे कक्षा 9 में अंग्रेजी माध्यम में प्रवेश करा दिया। पहले मैं शंकित था कि पता नहीं यह अंग्रेजी माध्यम चला पायेगी कि नहीं। लेकिन सौभाग्य से वह सरलता से अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने लगी और पिछली कक्षाओं की तरह ही अपनी कक्षा में प्रथम या द्वितीय आने लगी।
पढ़ाई के साथ ही मोना विविध गतिविधियों में भी भाग लेती थी, जैसे नाटक, गीत, नृत्य, चित्रकला प्रतियोगिता आदि। इनमें उसे कई बार पुरस्कार और प्रमाण-पत्र मिले। एक बार तो जिला स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता में उसे द्वितीय पुरस्कार मिला था।
कक्षा 10 में उसने अंग्रेजी माध्यम से ही सन् 2009 में हरियाणा बोर्ड की परीक्षा दी और लगभग 84 प्रतिशत अंक प्राप्त किये। हमें बहुत प्रसन्नता हुई। गणित में उसके अंक 100 में से पूरे 100 आये थे। वैसे एक विषय में उसके अंक आशा से बहुत कम थे। इसलिए हमने उस विषय की काॅपी फिर से जँचवायी और सौभाग्य से इस विषय में उसके 11 अंक बढ़ गये। अब उसके अंकों का प्रतिशत 85 हो गया था। परन्तु इसका तत्काल कोई फायदा उसे नहीं मिला, क्योंकि नया परिणाम दो महीने बाद आया था और तब तक उसका प्रवेश पहले प्रतिशत के आधार पर ही हो चुका था।
वह साइंस नहीं पढ़ना चाहती थी, बल्कि काॅमर्स चाहती थी। मैंने भी अपनी पसन्द उसके ऊपर नहीं थोपी और कह दिया कि जो विषय वह पढ़ना चाहती है, वही पढ़े। इंटर में, जिसे चंडीगढ़ और आसपास प्लस-1 और प्लस-2 कहा जाता है, काॅमर्स की पढ़ाई के लिए पंचकूला में कोई काॅलेज नहीं था। इसलिए उसका एडमीशन चंडीगढ़ के किसी कालेज में कराना था। चंडीगढ़ में कई सरकारी कालेज हैं, जिनमें सेक्टर 16 और सेक्टर 19 के लड़कियों के सरकारी कालेज काॅमर्स के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं। पंचकूला से वहाँ जाना भी आसान है, क्योंकि सीधी बसें जाती हैं और प्राइवेट बसें या कारें भी मासिक शुल्क के आधार पर बच्चों को ले जाती हैं। हमने दोनों जगह फार्म भर दिया और प्रभु कृपा से बिना कोई भागदौड़ किये उसे सेक्टर 16 के सरकारी स्कूल में प्लस-1 अर्थात् कक्षा 11 में प्रवेश मिल गया।
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई तो बहुत कम होती है, परन्तु फीस नाम-मात्र की ही होती है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में भी वैसी ही पढ़ाई होती है और फीस बहुत अधिक होती है। कोचिंग दोनों तरह के स्कूलों के उन लगभग सभी बच्चों को करनी पड़ती है, जो अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। इसलिए सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए बहुत मारा-मारी होती है। लेकिन मोना का अंक प्रतिशत अच्छा था, इसलिए पहली सूची में ही उसे प्रवेश मिल गया और वह विद्यालय जाने लगी।
इसके साथ ही उसे पंचकूला में ही सेक्टर 10 में एक कोचिंग में भी प्रवेश दिलाया गया, जो काॅमर्स के लिए अच्छा माना जाता था। कोचिंग तक जाने की सुविधा के लिए मोना को एक स्कूटी खरीदवायी गयी। एक सप्ताह में ही उसने उसे चलाना सीख लिया। प्रारम्भ में वह स्कूटी चलाने में डरती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका डर निकल गया और वह मजे में चलाने लगी। सौभाग्य से कभी भी उसे दुर्घटना जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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