आत्मकथा भाग-3 अंश-62
वैसे प्रेरणा काम बहुत अच्छा करती थी। वह अच्छा पढ़ाती थी। उसने मेरे साथ बैठकर संस्थान के पुस्तकालय को पूरी तरह व्यवस्थित कराया था तथा सभी काम मन लगाकर करती थी। परन्तु यह अवश्य चाहती थी कि सारे काम सारे अधिकारियों में बराबर-बराबर बाँटे जायें। कहने का तात्पर्य है कि उसकी मानसिकता बहुत कुछ बाबुओं जैसी थी। वह सभी पुरुष अधिकारियों से तो कटी-कटी रहती ही थी, महिला अधिकारियों से भी ज्यादा नहीं बोलती थी। पता नहीं क्यों, उसे शायद हमेशा ऐसा लगता था कि सभी लोग उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं, जबकि मैं उसे सामान्य करने की पूरी कोशिश करता था और उसे सभी कार्य उसकी सुविधा के अनुसार ही देता था।
फिर भी वह इतनी अन्तर्मुखी थी कि एक बार उसकी छोटी बहिन, जो इंजीनियरिंग कर चुकी थी और किसी कम्पनी में नौकरी शुरू करने हैदराबाद जा रही थी, जाने से पहले एक दिन हमारे संस्थान में आयी, तो प्रेरणा ने किसी से भी उसका परिचय नहीं कराया। यहाँ तक कि उसे मेरे पास भी नहीं लायी, जबकि सभी अधिकारियों का यदि कोई भी रिश्तेदार या मित्र संस्थान में आता था, तो मेरे साथ उनका परिचय अवश्य कराया जाता था। जब मुझे पता चला कि उसकी छोटी बहिन बाहर बैठी है, तो मैंने उसको गिफ्ट में देने के लिए प्रेरणा को एक अच्छा-सा पेन दे दिया।
वैसे प्रेरणा बहुत भावुक भी थी। एक बार जब गौड़ साहब की विदाई हो रही थी, तो अपने विदाई भाषण में वह रोने लगी थी। ऐसा ही दूसरी बार तब हुआ जब तीन अधिकारियों की विदाई एक साथ हो रही थी। उसके स्वभाव की यह गुत्थी समझना कठिन है। विधि हू न नारि हृदय गति जानी।
लखनऊ का मकान बेचना
अपने लखनऊ के मकान के बारे में मैं पीछे भी लिख चुका हूँ। एक के बाद एक तीन किरायेदारों के साथ कटु अनुभव होने के कारण हमने यह तय कर लिया था कि अब कोई किरायेदार नहीं रखेंगे और उसे खाली ही पड़ा रहने देंगे। ऐसा ही हमने किया भी, लेकिन हमें इसका ध्यान नहीं रहा कि कई गिद्ध इस मकान पर अपनी नजरें गढ़ाये होंगे। वहाँ आस-पास कोई ऐसा विश्वसनीय व्यक्ति नहीं था, जिसके भरोसे हम मकान छोड़ जाते, इसलिए उसे वैसे ही ताला लगाकर चले गये। हमारी अनुपस्थिति में उसमें अराजक तत्वों ने अपना अड्डा बना लिया था। पहले ताला टूटा, फिर नलों की टोंटी वगैरह खोल ले गये, फिर बिजली की फिटिंग तोड़कर फेंक दी और फिर दरवाजे-खिड़की भी या तो ले गये या तोड़कर फेंक दिये। अब उसमें केवल ईंटों का ढाँचा मात्र रह गया था। हाँ, चारों तरफ की बाउंडरी और मुख्य फाटक सुरक्षित था।
जब गोविन्द जी (श्री गोविन्द राम अग्रवाल) के बड़े पुत्र चि. मनीष के विवाह के अवसर पर मैं लखनऊ आया, तो मकान की हालत देखकर दंग रह गया। मेरे पास इतना समय नहीं था कि वहाँ रहकर उसे ठीक करा लेता। इसलिए वह ऐसे ही पड़ा रहा। पंचकूला जाकर श्रीमती जी को यह सब बताया, तो वे भी चिन्तित हुईं और उसे बेचने की राय देने लगीं। मुझे यह राय जँच गयी। मैंने सोचा कि यदि किसी दिन किसी राजनैतिक छुटभैये या गुंडे ने इस पर कब्जा कर लिया, तो मैं किस-किस से लडूँगा और कैसे? इससे तो अच्छा है कि बेचकर पैसे खड़े कर लिये जायें। यह सोचकर सबसे पहले तो मैंने बैंक का बकाया लोन चुकाया, जो कुछ ही हजार बचा था। फिर मैंने मकान की रजिस्ट्री के कागज बैंक से वापस ले लिये, जो वाराणसी में ऋण लेते समय बैंक द्वारा रखवाये गये थे।
फिर हमने अपने परिचितों से मकान बेचने की इच्छा व्यक्त की। श्री गोविन्द जी ने कहा कि मैं अवश्य बिकवा दूँगा। अपने कथन के अनुसार उन्होंने एक व्यक्ति से बात कर ली और मकान हमने उसके हाथ बेच दिया। रजिस्ट्री वगैरह करने के लिए मुझे एक-दो बार श्रीमती जी के साथ लखनऊ जाना पड़ा था। इस प्रकार बेचने पर हालांकि हमें दो-तीन लाख का घाटा पड़ा, लेकिन मकान की चिन्ता खत्म हुई, यही बड़ी बात थी। कहावत भी है कि ‘जान बची और लाखों पाये।’
इसके बाद हमने आगरा में ही अपने एक रिश्तेदार का मकान खरीद लिया, जो भारी कर्ज के कारण उसे बेचने का मन बना चुके थे। हमें बेचने में उनको यह सुविधा थी कि जब तक हम आगरा में स्थायी रूप से रहने के लिए नहीं आ जाते, तब तक वे उसमें रह सकते थे, हालांकि कुछ किराया देकर। अब क्योंकि आगरा के मकान की कीमत अधिक थी, इसलिए हमने अपने बैंक से फिर ऋण लिया और आगरा का मकान अपने नाम करा लिया। अब वह सुरक्षित है। हमारे वे रिश्तेदार अभी भी उसी में रह रहे हैं, लेकिन कुछ किराया भी दे रहे हैं।
(पादटीप- अब अवकाशप्राप्ति के बाद इस मकान में मैं स्वयं सपरिवार रह रहा हूँ और गाँव से बाहर पहली बार अपने ही मकान में रहने का सुख पा रहा हूँ।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें