आत्मकथा भाग-3 अंश-61

दो नये अधिकारी - विकास और प्रेरणा

हमारे केन्द्र में सन् 2007 में दो नये अधिकारी आये। वे थे- श्री विकास ऐरी और श्रीमती प्रेरणा कश्यप। दोनों ने ही स्केल 2 में हमारे बैंक में सेवा शुरू की थी अर्थात् दोनों ही सीधे प्रबंधक (आईटी) बने थे। विकास जी नेटवर्क के अच्छे जानकार हैं और सी.सी.एन.ए. डिग्री धारी हैं, जिसका बहुत मान होता है। अगर वे चाहते, तो किसी भी बड़ी कम्पनी में सरलता से 20 लाख तक का पैकेज पा सकते थे। लेकिन पारिवारिक कारणों से वे अपने मूल स्थान चंडीगढ़ में ही रहना चाहते थे, इसलिए इलाहाबाद बैंक की नौकरी स्वीकार कर ली थी। उनका विवाह हो चुका था और एक बच्ची के पिता हैं।
श्रीमती प्रेरणा कश्यप हिमाचल प्रदेश के नाहन नामक शहर की रहने वाली हैं और उन्होंने राँची (झारखंड) के श्री अनिमेश से प्रेम विवाह किया है। प्रेरणा ने बी.टेक. की डिग्री प्राप्त की है और उसके बाद पर्यावरण के क्षेत्र में एम.एससी. तथा संकट प्रबंधन (डिजैस्टर मैनेजमेंट) में एम.फिल. उपाधि भी प्राप्त की है। प्रेरणा देखने में अत्यन्त साधारण लगती है- औसत भारतीय रंगरूप, औसत भारतीय चेहरा, औसत भारतीय कद-काठी, चश्मा लगाती है और प्रायः पुराने सलवार-सूट पहनती है। कुल मिलाकर देखने में एकदम मामूली, लेकिन वैसे वह काफी गुणी है। वह लम्बी-लम्बी कविताएँ और लेख लिखा करती है, उसे ताइक्वांडो की अच्छा अभ्यास है और उसका हिन्दी-अंग्रेजी दोनों का हस्तलेख बहुत सुन्दर है।
प्रारम्भ में जब प्रेरणा हमारे कार्यालय में आयी, तो बहुत कम बोलती थी। सबने समझा कि यह सीधी है और कम बोलनेवाली है, लेकिन एक-दो सप्ताह में ही स्पष्ट हो गया कि यह लड़की न तो सीधी है और न कम बोलने वाली है, बल्कि घमंडी है और बोलती इसलिए नहीं कि किसी को अपने से बोलने लायक ही नहीं समझती। अगर कभी बोलेगी भी, तो एकदम तीर की तरह। इसका परिणाम यह हुआ कि शीघ्र ही सभी उसे नापसन्द करने लगे। जब मैंने उसके स्वभाव का विश्लेषण किया, तो उसका कारण मेरी समझ में आ गया।
बात यह थी कि उसके पिता मैरीन इंजीनियर थे और साल में 10 महीने बाहर पानी के जहाज पर रहते थे। घर में माँ का राज चलता था, जो कहीं टीचर थीं। प्रेरणा कुल तीन बहनें हैं और भाई कोई नहीं है। इसलिए घर में सारी महिलायें ही थी। शायद प्रारम्भ से ही उसको यह सीख दी गयी थी कि पुरुषों से दूर रहो और किसी पर भी विश्वास मत करो। ऐसी नकचढ़ी लड़की ने किसी बिहारी लड़के से प्रेम विवाह कैसे किया था, यही आश्चर्य की बात थी। लेकिन चचा गालिब कह गये हैं कि ‘इश्क पर जोर नहीं है, ये वो आग है गालिब, कि लगाये न लगे और बुझाये न बने’। प्रेरणा के पति अनिमेश जी किसी सरकारी नौकरी पर शिमला में पदस्थ थे। बाद में उन्होंने चंडीगढ़ में ही अपना स्थानांतरण करा लिया था।
प्रेरणा ने पंचकूला से सटे हुए लेकिन पंजाब में पड़ने वाले जीरकपुर कस्बे के एक मल्टीस्टोरी भवन के एक फ्लैट में अपना निवास बनाया था, जो किसी रिश्तेदार ने सस्ते किराये में दिलवा दिया था। वह टैम्पो से आती-जाती थी। रास्ते में रेलवे लाइन पड़ती थी। आते समय प्रायः फाटक बन्द मिलता था, जिससे लगभग रोज ही वह 10-15 मिनट और कभी-कभी इससे भी अधिक देर से आ पाती थी। लगभग रोज ही मेरे मोबाइल पर उसका यह सन्देश आता था- ‘सर, मैं रास्ते में हूँ, फाटक बन्द है, मुझे आने में देर हो जायेगी।’ हर बार मैं जबाब देता था- ‘ओके’।
एक दिन इसी बात पर मैंने एक कविता (या तुकबन्दी) लिख मारी। इसे नीचे दे रहा हूँ, ताकि आप भी इसका मजा ले सकें-
इन्तजार हो रहा है ऑफिस में
पलक पाँवड़े बिछाये बैठे हैं बाॅस,
इधर मैं बैठी हूँ
उपेक्षित सी टैम्पो में,
क्योंकि बन्द है रेल का फाटक!
दूर से गाड़ी आ रही है,
सीटी बजा रही है,
फाटक खुलेगा जब
टैम्पो चलेगा तब,
तब तक इंतजार को हूँ मजबूर,
पैदल भी नहीं जा सकती
क्योंकि ऑफिस है बहुत दूर!
इस कविता का मेरे ऑफिस के सभी अधिकारियों ने बहुत आनन्द लिया। एक दिन जब मैंने हिम्मत करके प्रेरणा को भी यह कविता सुना दी, तो वह बुरा मान गयी। उसकी यह आदत थी कि जरा-जरा सी बात का बुरा मान जाती थी। उसमें मजाक को मजाक में लेने की आदत अर्थात् ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ बिल्कुल नहीं था। मुस्कराना तो जैसे जानती ही नहीं और कभी हँसेगी भी तो मुँह दबाकर, जिससे कि किसी को उसकी हँसी की आवाज भी सुनायी न पड़े।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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