आत्मकथा भाग-3 अंश-60
स्वास्थ्य पुस्तिका
मैंने स्वास्थ्य और योग के बारे में एक पुस्तिका लिखी थी। यह पुस्तिका वास्तव में कानपुर में ही पूरी हो गयी थी, लेकिन तब तक कम्प्यूटर पर ही थी। इसमें स्वस्थ रहने के उपायों के साथ व्यायाम, योगासन, प्राणायाम वगैरह करने की सचित्र विधियाँ भी दी गयी थीं। इतना ही नहीं, इसमें अधिकतर होने वाली बीमारियों की प्राकृतिक चिकित्सा भी बतायी गयी थी। मैंने इस पुस्तिका का नाम रखा था- ‘स्वास्थ्य रहस्य’। मेरा दावा है कि इस पुस्तिका में लिखी गयी बातों पर चलने वाला कभी बीमार पड़ ही नहीं सकता और यदि संयोग से कोई शिकायत हो भी जाये, तो इसमें दिये गये उपायों का पालन करके बिना किसी खर्च के शीघ्र स्वस्थ हो सकता है। मैं स्वयं इन बातों का पालन करता हूँ और सदा स्वस्थ रहता हूँ।
जब मैंने योग कराना शुरू किया, तो इस पुस्तिका को छपवाने का विचार किया। मैंने यह तय किया था कि योग करने आने वालों में यह पुस्तिका अपनी ओर से मुफ्त बाँटूँगा। यह पुस्तिका लोगों को बहुत पसन्द आयी। पंजाब नेशनल बैंक के एक अधिकारी ने यह पुस्तिका कहीं देख ली, तो उसे इतनी पसन्द आयी कि अपने प्रशिक्षण संस्थान के लिए उसकी 200 प्रतियाँ मुझसे खरीदकर ले गये। लेकिन खेद है कि हमारे सहायक महाप्रबंधक गौड़ साहब की ओर से इसमें कोई सहयोग नहीं मिला।
उन दिनों हमारा बैंक सी.बी.एस. अर्थात् केन्द्रीय बैंकिंग समाधान में प्रवेश कर रहा था। इसका तात्पर्य है कि बैंकों की सभी शाखाओं को एक ही सर्वर से जोड़ दिया जाना था और केन्द्रीय स्तर पर ही उनका डाटा रखा जाना था। इससे कोई ग्राहक किसी भी शाखा में खाता खोलकर उसी या किसी भी अन्य शाखा से लेन-देन कर सकता है। उन दिनों सी.बी.एस. के प्रशिक्षण लगातार चल रहे थे और उनमें मुख्यतः दिल्ली शहर की विभिन्न शाखाओं से सहभागी आते थे। इनमें महिलाओं की भी अच्छी संख्या होती थी। प्रशिक्षण में आने वाली प्रायः सभी महिलायें और अधिकांश पुरुष मेरी योग कक्षाओं में आने लगे और नियमित योग करने लगे। हालांकि प्रत्येक बैच केवल एक सप्ताह वहाँ रहता था और मैं रविवार को छोड़कर शेष 6 दिन योग कराता था, लेकिन 6 दिन में ही वे सब सभी क्रियाएँ अच्छी तरह सीख जाते थे। अपनी योग और स्वास्थ्य वाली पुस्तिका तो मैं उनको पहले ही दिन दे देता था। अपने प्रशिक्षण के अन्तिम दिन वे मुझसे विदा लेते समय बहुत आभार प्रकट करते थे।
मैं सहभागियों को स्वास्थ्य सम्बंधी सलाह भी देता था। जो मेरी सलाह पर चलते थे, वे अपनी समस्या से मुक्त हो जाते थे। एक बार एक सज्जन ने अपनी रीढ़ में दर्द होने की समस्या बतायी, जिससे वे तीन साल से पीड़ित थे। मैंने उन्हें रीढ़ के कुछ सरल लेकिन प्रभावी व्यायाम बताये, जिनको मैं सबको कराता भी था। लगभग 6 महीने बाद जब वे सज्जन दोबारा प्रशिक्षण के लिए आये, तो स्वयं ही बताने लगे कि उन व्यायामों से उनका रीढ़ का दर्द बिल्कुल चला गया, वह भी केवल एक माह में। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। इसी प्रकार कई लोगों को लाभ हुआ था।
प्राथमिक चिकित्सा बक्सा
मैंने प्रशिक्षणार्थियों के उपयोग के लिए एक प्राथमिक चिकित्सा बक्सा बना रखा था। उसमें चोट लगने पर की जाने वाली मरहम पट्टी के सामान के साथ ही प्रायः हो जाने वाली शिकायतों जैसे बुखार, जुकाम, खाँसी, पेट दर्द, सिर दर्द आदि की गोलियाँ भी थीं। यह बक्सा मेरी मेज के पास ही रखा रहता था, जिससे कि मेरी अनुपस्थिति में भी लोग उसका लाभ उठा सकें। इससे यह फायदा हुआ कि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी शिकायतों होने पर तत्काल चिकित्सा मिल जाती थी और डाक्टरों के पास बहुत कम जाना पड़ता था।
मैं संस्थान में प्रशिक्षण के लिए आने वाले लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं को भी हल करता था। मैंने एक शिकायत रजिस्टर काउंटर पर रखवा दिया था, जिसमें लोग अपनी समस्याएँ लिख सकते थे। उनका तत्काल समाधान किया जाता था। मैं प्रशिक्षण के पहले ही दिन उनसे कह देता था कि किसी भी तरह की समस्या हो, तो रजिस्टर में लिख दें और यदि 24 घंटे के अन्दर समाधान न हो, तो मेरी जानकारी में लायें। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों की शिकायतों पर तत्काल कार्यवाही की जाती थी और वे सन्तुष्ट रहते थे। इसी रजिस्टर के कारण होस्टल और कैंटीन चलाने वाले वेंडर को भी लगातार सक्रिय और सावधान रहना पड़ता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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