आत्मकथा भाग-3 अंश-59
अब मैंने प्रधान कार्यालय के प्रशासन विभाग को एक लम्बा पत्र लिखा और गौड़ साहब से कहा कि इसको प्र.का. अग्रसारित कर दीजिए, वहाँ से जैसा जबाब आयेगा, मैं मान लूँगा। उन्होंने कहा कि ठीक है, अग्रसारित कर देंगे। उन्होंने लगभग 10 दिन तक पत्र को अग्रसारित नहीं किया, जबकि मैं रोज याद दिला रहा था। जब मेरा धैर्य चुक गया, तो मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि यदि दो दिन के अन्दर आपने मेरे पत्र को प्र.का. अग्रसारित नहीं किया, तो मैं इसे सीधे बिना अग्रसारित कराये ही स्पीड पोस्ट से भेज दूँगा।
यह सुनकर वे डर गये और प्रशासन विभाग को टेलीफोन करने लगे। वहाँ उन्होंने जाने किस सहायक महाप्रबंधक से बात की कि उसने मामला समझते ही फौरन कहा कि इनको दोनों सुविधाएँ तुरन्त दे दो। इस पर गौड़ साहब को दोनों सुविधायें देनी पड़ीं और जो 5 हजार रुपये मेरे खाते से काटे गये थे, वे भी लौटाने पड़े। उन्होंने मुझसे केवल यह लिखवाया कि संस्थान छोड़ते समय मोबाइल और टेलीफोन दोनों सुविधायें वापस कर दूँगा। मैंने उनकी संतुष्टि के लिए ऐसा लिख दिया, हालांकि इसकी भी कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि ऐसा तो सबको करना ही पड़ता है।
इस सारे मामले से गौड़ साहब और बांगिया जी दोनों के प्रति मेरा मन बहुत खट्टा हो गया था। हालांकि मैंने अपना व्यवहार बहुत संयमित रखा था और कोई अप्रिय घटना नहीं होने दी। यदि मेरी जगह कोई दूसरा व्यक्ति होता, तो बात किसी भी हद तक जाकर बिगड़ सकती थी। इसके बाद मैंने कम से कम बांगिया जी पर विश्वास करना एकदम बन्द कर दिया था। इसके साथ ही मैंने चुघ साहब से भी दूरी बना ली थी, क्योंकि उनकी भूमिका भी इस मामले में सही नहीं थी। वैसे इसके कुछ समय बाद ही चुघ साहब रिटायर हो गये थे। उनकी विदाई पार्टी में मैं भी शामिल हुआ था, लेकिन कुछ बोला नहीं था, केवल उनको शुभकामनायें दी थीं।
योग कक्षायें
जब मुझे पंचकूला में रहते हुए लगभग दो साल हो गये थे, तब हमारी सेक्टर 12-ए की शाखा बहुत अनियमित हो गयी थी। इसका प्रमुख कारण, जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूँ, यह था कि कई प्रमुख स्वयंसेवक हमारे सेक्टर को छोड़कर दूसरे सेक्टरों में या अन्य स्थानों पर रहने चले गये थे। इसलिए नियमित शाखा आने वाला मेरे और प्रह्लाद जी के अलावा कोई नहीं बचा था। प्रह्लाद जी भी कई बार नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें जल्दी ही ऑफिस के लिए बस पकड़नी पड़ती थी। इससे शाखा लगभग बन्द हो गयी थी। जिस पार्क में हमारी शाखा लगती थी, उसी पार्क में एक सज्जन गुलाटी जी योग कराया करते थे। वे दिल्ली के भारतीय योग संस्थान से जुड़े हुए थे और उसी पद्धति से योग कराते थे। जब हमारी शाखा बन्द हो गयी, तो मैं भी उनके साथ योग करने लगा। मैं दो-तीन माह उनके साथ योग करता रहा।
हमारे संस्थान में जो लोग प्रशिक्षण पर आते थे, उनमें से कई नियमित योग या व्यायाम करने वाले होते थे। वे प्रायः मुझसे कहा करते थे कि यहाँ योग कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। वैसे हमारे संस्थान में भूमि तल से भी नीचे एक तल था, जिसमें एक बड़ा हाॅल था। उसमें योग केन्द्र बनाना संस्थान की योजना में था, परन्तु कभी इसके लिए गम्भीरता से प्रयास नहीं किया गया। इसलिए मैंने सोचा कि मैं सुबह यहाँ आकर योग करा सकता हूँ। मेरे निवास से संस्थान केवल एक किलोमीटर दूर था। इतनी दूरी मैं सरलता से पैदल आ-जा सकता था।
इसलिए मैंने गौड़ साहब से योग कराने की अनुमति माँगी। उनको इस बारे में कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन कहने लगे कि योग कराने के बदले आपको कुछ मिलेगा नहीं। मैंने कहा- ‘मुझे कुछ चाहिए भी नहीं, केवल दरियों की व्यवस्था कर दीजिए।’ वास्तव में योग शिक्षक को प्रतिमाह रु. 3000 तक देने की व्यवस्था संस्थान के बजट में थी। परन्तु संस्थान के एक अधिकारी को ये नहीं दिये जा सकते थे। गौड़ साहब के ‘हाँ’ कर देने पर मैं संस्थान के ड्राइवर के साथ मनीमाजरा गया, जो चंडीगढ़ और पंचकूला से सटा हुआ एक कस्बा है और चंडीगढ़ के अन्तर्गत आता है। वहाँ से मैं एक दर्जन दरियाँ खरीद लाया।
अगले ही दिन से मैंने योग कराना प्रारम्भ किया। शुरू में एक दो लोग ही आते थे। हमारे एक अधिकारी श्री अनिल नेमा भी आ जाते थे। जो प्रशिक्षणार्थी प्रातः टहलने जाते थे या नीचे उतर आते थे, उनको मैं बुला-बुलाकर योग करने बैठाता था। मैंने यह निश्चय कर लिया था कि योग कक्षायें चलाने में कोई नागा नहीं करूँगा और अगर किसी दिन एक भी व्यक्ति नहीं आयेगा, तो मैं अकेला ही योग करूँगा। इसका फायदा यह हुआ कि रोज ही लोग आने लगे, क्योंकि उन्हें यह विश्वास होता था कि मैं अवश्य आ जाऊँगा। धीरे-धीरे योग करने वालों की संख्या भी बढ़ने लगी और मेरे द्वारा खरीदी गयी 12 दरियाँ कम पड़ने लगीं। ऐसा होने पर मैं 4 दरियाँ और खरीद लाया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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