आत्मकथा भाग-3 अंश-58
मुख्य प्रबंधक पद पर प्रोमोशन
मुझे वरिष्ठ प्रबंधक (आईटी) के रूप में सेवा करते हुए लगभग 11 साल हो गये थे। बीच में प्रोमोशन के दो अवसर मुझे मिले थे, जिनमें से एक बार तो मैं फेल हो गया था और दूसरा अवसर मैंने छोड़ दिया था। लेकिन अपने मित्र श्री कुलवन्त सिंह गुरु के कहने पर मैं अगले अवसर का लाभ उठाने के लिए तैयार हो गया। नवम्बर 2006 में मुझे प्रोमोशन के इंटरव्यू के लिए कोलकाता बुलाया गया। वहाँ अपने मित्र श्री प्रवीण कुमार, जो स्वयं भी वही इंटरव्यू देने आये हुए थे, के साथ मैं एक ही कमरे में रुका। इंटरव्यू बोर्ड में कानपुर के मेरे पुराने साथी श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव, जो उस समय उप महाप्रबंधक (आईटी) हो गये थे, शामिल थे। उनके ही कारण मेरा प्रोमोशन हो गया।
3 दिसम्बर 2006 को दिन में प्रोमोशन का परिणाम गौड़ साहब को फोन पर बताया गया, तो वे तुरन्त ही मेरे पास आये और मुझे गले से लगा लिया। मैंने उन्हें और परमपिता को बहुत धन्यवाद दिया। प्रोमोशन पाने की मुझे तो प्रसन्नता थी ही, श्रीमती जी और बच्चों को मुझसे भी ज्यादा प्रसन्नता हुई, क्योंकि अब वे गर्व से कह सकते थे कि उनके पति या पिता मुख्य प्रबंधक (आईटी) हैं। वैसे प्रोमोशन पाने से मुझे वेतन में अधिक अन्तर नहीं पड़ा, क्योंकि मैं पहले ही स्केल 3 का अधिकतम वेतन पा रहा था, जो स्केल 4 के अधिकतम वेतन से कुछ ही कम होता है। इसलिए प्रोमोशन होने पर मेरे वेतन का निर्धारण होने के साथ-साथ यह भी लिखकर आ गया कि अब आगे इस स्केल में कोई वेतन वृद्धि नहीं मिलेगी।
परन्तु वेतन के अलावा भी मुख्य प्रबंधकों को कई सुविधाएँ और अधिकार मिलते हैं, जो मुझे मिलने थे। इन सुविधाओं को लेने में भी मुझे बहुत खींचतान करनी पड़ी। इसका मुख्य कारण थे श्री दिनेश कुमार बांगिया और उनके सहायक थे श्री के.सी. चुघ, जिनका जिक्र मैं ऊपर नितिन राजुरकर के मामले के सन्दर्भ में कर चुका हूँ।
श्री दिनेश कुमार बांगिया हमारे बैंक में मेरे साथ ही आये थे, हालांकि उनकी पोस्टिंग कोलकाता में हुई थी। प्रोमोशन के जिस एक अवसर को मैंने छोड़ दिया था, उसी अवसर पर उनका प्रोमोशन हो गया था और वे मुख्य प्रबंधक के रूप में सतना मंडलीय कार्यालय में थे। उस समय तक हमारे संस्थान में केवल कम्प्यूटर विषयों के प्रशिक्षण चलते थे। प्रधान कार्यालय ने तय किया कि यहाँ सामान्य विषयों के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलेंगे। इस हेतु सबसे पहले श्री बांगिया को हमारे संस्थान में फैकल्टी के रूप में पदस्थापित किया गया। तब तक मेरा प्रोमोशन नहीं हुआ था।
उनके आने पर मुझे प्रसन्नता हुई। वे मेरे पूर्व परिचित थे और कई बार हम कोलकाता में मिल चुके थे। उनके आने पर मैंने उनके बैठने का प्रबंध एक केबिन में कर दिया, जो तब तक खाली पड़ा था। मैं उनको अपना हितचिन्तक समझता था। जब मेरा प्रोमोशन हुआ, तो हमने गौड़ साहब के साथ बांगिया जी को भी अगले दिन अपने घर रात्रि भोजन पर बुलाया था।
टेलीफोन सुविधा में खींचातानी
हमारे बैंक में मुख्य प्रबंधकों को वेतन सम्बंधी बढ़ोत्तरी के अलावा कार्यालय और घर पर अलग टेलीफोन तथा मोबाइल की सुविधा भी मिलती है। कार्यालय में मुझे टेलीफोन की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि मैं अपने कानों की खराबी के कारण बात नहीं कर सकता। लेकिन घर पर हमने अपना टेलीफोन लगवा रखा था, जो बहुत काम आता था। सबसे पहले तो मैंने उस टेलीफोन को बैंक की ओर से लगा हुआ मान लेने का प्रार्थनापत्र दिया, जो गौड़ साहब ने स्वीकार कर लिया। इसका फायदा यह था कि उस टेलीफोन का रु. 1000 प्रतिमाह तक का बिल बैंक द्वारा दिया जा सकता था।
दूसरा काम मैंने मोबाइल खरीदने का किया। मोबाइल के लिए बैंक से 5 हजार रुपये मिलते हैं और प्रतिमाह एक हजार रुपये तक के बिल का भुगतान भी बैंक से हो जाता है। बच्चों को रु. 5000 तक का कोई मोबाइल पसन्द नहीं आया, इसलिए रु. 7500 का मोबाइल खरीदा गया, जिसमें कैमरा भी था। इनमें से रु. 5000 का भुगतान बैंक ने कर दिया और शेष रु. 2500 मुझे अपनी जेब से देने पड़े।
इसके अगले ही दिन अचानक गौड़ साहब मुझसे टेलीफोन और मोबाइल दोनों सुविधायें वापस करने को कहने लगे। उनके अनुसार मैं इन सुविधाओं का स्वयं उपयोग नहीं कर सकता था, इसलिए ये मुझे नहीं दिये जायेंगे। कहने लगे कि लिखकर दो कि ये सुविधायें तुम्हें क्यों चाहिए। मैंने कहा कि प्र.का. के सर्कुलर के अनुसार मैं इनका पात्र हूँ। अगर आप लिखवाना चाहते हैं, तो मुझे पत्र दीजिए, मैं उसका उत्तर दे दूँगा। उन्होंने अगले दिन ही मुझे पत्र दे दिया और मेरे खाते से रु. 5000 भी काट लिये। मैंने पत्र का उत्तर दिया और लिखा कि ये सुविधायें वापस लेना अन्याय है। लेकिन इसके जबाब में उन्होंने फिर वे ही बातें दोहरा दीं। तब तक मुझे पता चल गया था कि यह सारी उल्टी पट्टी बांगिया जी और चुघ साहब ने उनको पढ़ायी थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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