आत्मकथा भाग-3 अंश-57

डाक्टर भाईसाहब की बीमारी

हमारे बड़े भाईसाहब डाॅ. राममूर्ति सिंघल का स्वास्थ्य हम सभी भाइयों में सबसे अच्छा माना जाता था और वे कद में भी हम सबसे लम्बे हैं। वे एनेस्थीसिया (निश्चेतना विज्ञान) में एम.डी. हैं। वे कोई नौकरी नहीं करते, लेकिन ऑपरेशनों के समय मरीजों को बेहोश करने का कार्य स्वतंत्र रूप से करते हैं। इस हेतु उन्हें विभिन्न अस्पतालों और नर्सिंग होमों में जाना पड़ता है। उन्हें 24 घंटे में किसी भी समय बुला लिया जाता है और उन्हें बुलाये गये समय पर ही जाना पड़ता है। इससे उनकी आय तो अच्छी हो जाती है, लेकिन निरन्तर कार्य करने और समय-कुसमय खाने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा। व्यायाम वे करते नहीं थे, न टहलने जाते थे, जिसके लिए मैं अनेक बार आग्रह कर चुका था।
किसी तरह अपनी बीमारी से जूझते हुए वे कार्य करते रहे और दवायें खाने के बावजूद (मेरे विचार से उन्हीं के कारण) उनकी बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती रही। स्वयं बड़े डाक्टर होने के बाद भी वे बीमार हैं, यह बहुतों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है, परन्तु मेरे लिए नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐलोपैथिक डाक्टर ज्यादातर न केवल खुद बीमार रहते हैं, बल्कि उनके घरवाले, बीबी-बच्चे सभी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित रहते हैं और लगातार दवायें खाते रहते हैं। वास्तव में उनको यह पढ़ाया ही नहीं जाता कि स्वस्थ कैसे रहा जा सकता है। उन्हें केवल यह पढ़ाया जाता है कि किसी बीमारी का इलाज कैसे किया जा सकता है।
भाईसाहब रीढ़ की हड्डी के असहनीय दर्द से पीड़ित थे, जिसका पता नहीं क्या नाम बताते थे, शायद ऑस्टियोसाइरोसिस। जब आगरा में उनका इलाज न हो सका, तो वे लखनऊ के स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थान (पीजीआई) में गये। वहाँ वे कई दिनों तक रहे। उस समय हम कानपुर में रहते थे। इसलिए मैं भी कई बार उनके पास रहा। कुछ सुधार होने पर वे आगरा आ गये और फिर कार्य में लग गये। लेकिन कुछ समय बाद उनकी बीमारी फिर उभर आयी। खास तौर से जाड़े के दिनों में वे बहुत कष्ट उठाते थे। तब तक हम पंचकूला आ चुके थे। पहले वे लखनऊ के उसी संस्थान में भर्ती हुए। वहाँ डाक्टर कई बार आपस में जानबूझकर अंग्रेजी में चर्चा करते थे, ताकि हमारी भाभीजी न समझ लें। परन्तु उस बातचीत के बीच में ‘एड्स’ शब्द भाभीजी ने सुन लिया। यह सुनते ही वे घबरा गयीं, लेकिन सौभाग्य से जाँच में एड्स नहीं निकला।
लेकिन तबियत में सुधार न होने पर वे लखनऊ से आगरा आ गये और किसी विशेषज्ञ की सलाह पर नौएडा के मेट्रो हार्ट अस्पताल में भर्ती हो गये। यह अगस्त-सितम्बर 2006 की बात है। मेट्रो हार्ट अस्पताल अच्छा अस्पताल माना जाता है, हालांकि बहुत महँगा है। भाईसाहब की आमदनी का और कोई साधन नहीं है, क्योंकि बच्चे पढ़ रहे थे और उनका लड़का साहिल (सनी) तो पुणे में पढ़ रहा था, उसका भी काफी खर्च था। किसी तरह हम उनके इलाज के लिए खर्च की व्यवस्था कर रहे थे।
मेट्रो हार्ट अस्पताल में प्रारम्भ में उनको आई.सी.यू. में भर्ती किया गया था। यह हमारे लिए पहला अवसर था, जब हमारे घर का कोई व्यक्ति आई.सी.यू. में भर्ती हुआ हो। हम सब बुरी तरह घबरा गये थे। मैं जो सबको हिम्मत बँधाया करता हूँ, खुद हिम्मत हार बैठा था। मैं पंचकूला से छुट्टी लेकर नौएडा गया था और लगभग एक सप्ताह उनके साथ रहा था। फिर गोविन्द भाईसाहब के आ जाने पर मैं वापस पंचकूला आ गया।
वे मेट्रो हार्ट में आई.सी.यू. से तो तीन दिन बाद बाहर आ गये और एक प्राइवेट कमरे में रखे गये, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। जब मैं पंचकूला में था, तभी उनको मेट्रो हार्ट से हटाकर दक्षिण दिल्ली के बत्रा अस्पताल में ले जाया गया। वहाँ उनको सही चिकित्सा और मार्गदर्शन मिला। वे स्वयं भी बड़ी इच्छाशक्ति के धनी हैं, इसलिए धीरे-धीरे सुधार होने लगा। एक बार श्रीमती वीनू उनके पास देखभाल के लिए आयी हुई थीं, तब उनको अस्पताल में ही बुखार आ गया। मुझे उन्होंने खबर भिजवायी कि आकर ले जाओ। मैं अपने संस्थान के ड्राइवर के साथ कार से बत्रा अस्पताल पहुँचा और अगले दिन श्रीमती जी को लेकर पंचकूला आया।
सौभाग्य से कुछ समय बाद भाईसाहब की हालत में बहुत सुधार हो गया और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। इलाज में काफी समय लग जाने और भारी खर्च के कारण उनकी आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी, जो धीरे-धीरे सामान्य हुई। अब वे काफी स्वस्थ हैं, किन्तु दवायें खानी पड़ती हैं। दवा की मात्रा जरा भी कम कर देने पर उनका रोग फिर उभर आता है। पर अच्छी बात यह है कि अब वे टहलने जाने लगे हैं और गलत समय पर केस लेना भी बन्द कर दिया है। इससे वे प्रायः स्वस्थ रहते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21