आत्मकथा भाग-3 अंश-56
भतीजे के प्रेम रोग का इलाज
मेरी दूर की रिश्तेदारी में मेरे एक भतीजे को प्रेम रोग हो गया। नई उम्र के लड़कों को यह बीमारी हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात यह थी कि उसे अपने घर काम करने वाली नौकरानी से प्रेम हो गया था। मैं अपने भतीजे का सही नाम लिखना उचित नहीं समझता। सुविधा के लिए उसका नाम ‘रमेश’ रख लेते हैं। जिस नौकरानी से उसे प्यार हुआ, उसका असली नाम भी मैं नहीं लिख रहा हूँ। सुविधा के लिए ही उसका नाम हम ‘रोशनी’ मान लेते हैं। रमेश अच्छा पढ़ा-लिखा है और थोड़ा साँवला होने के बावजूद स्मार्ट लगता है। यह रोशनी हालांकि अनपढ़ थी, लेकिन बहुत सुन्दर थी। इसलिए रमेश को उससे प्यार हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं थी। यह प्यार एकतरफा नहीं था, बल्कि ‘दोनों तरफ थी आग बराबर लगी हुई’ वाला मामला था।
अगर रमेश को किसी अच्छे परिवार की लड़की से प्यार हुआ होता, तो घरवाले कभी चिन्तित न होते और अपने लड़के की खुशी के लिए उसे बहू बना लेते। लेकिन एक प्रतिष्ठित परिवार में अपनी नौकरानी को बहू बनाना लगभग असम्भव बात होती है। कानपुर में हमारे पड़ोस में एक परिवार में नौकरानी उस घर के मालिक के पुत्र से गर्भवती हो गयी थी, उसके एक लड़का पैदा हुआ। घर वालों ने उस नौकरानी और उसके बच्चे का पूरा खर्च उठाया, परन्तु रही वह नौकरानी ही, कभी उसे घर का सदस्य नहीं माना गया। यहाँ तो मामला शुरूआत में था, इसलिए घरवालों ने दोनों पर प्रतिबंध लगा दिये। सबसे पहले तो नौकरानी को हटाया और फिर उसके घरवालों से कहकर उसे उसके गाँव भिजवा दिया। तब सबने सोचा था कि समस्या हल हो गयी, लेकिन असली समस्या यहीं से प्रारम्भ हुई।
रमेश को किसी प्रकार पता चल गया कि रोशनी अपने गाँव में गयी है। उसे उसके गाँव का नाम भी पता चल गया और उसके बाप का नाम वह जानता ही था। एक दिन वह चुपचाप घर से निकल गया और रोशनी के गाँव जा पहुँचा। वहाँ जैसा कि स्वाभाविक है लड़की के घरवालों ने उसे बहुत डाँटा और मारा-पीटा भी। फिर उसके घरवालों को खबर की। इधर सब परेशान थे। खबर मिलते ही उसके पिताजी लड़की के गाँव पहुँच गये और किसी तरह लड़के को पकड़कर लाये।
उस समय मैं कानुपर में था। वहाँ मुझे पता चला, तो बड़ा चिन्तित हुआ। संयोग से कुछ दिन बाद ही मैं किसी काम से आगरा जा रहा था। आगरा आकर मैंने अपने उस रिश्तेदार से कहा कि मैं रमेश से बात करूँगा। रमेश उस समय अपनी विवाहित बहन के पास आगरा में ही दूसरे मोहल्ले में था। वे खुशी से मुझे उसके पास ले जाने को तैयार हो गये। वे तो खुद ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे, जो रमेश को समझाकर सीधी लाइन पर ला सके, क्योंकि वह किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं था। वे जानते थे कि रमेश मेरी बहुत इज्जत करता है, इसलिए वे उसी दिन शाम को मुझे अपनी पुत्री के यहाँ ले गये।
वहाँ जाकर मैंने अकेले में रमेश से बात की। पहले मैंने उसी से सारा मामला समझा। फिर कहा- ”प्यार करना कोई बुराई नहीं है। लेकिन अभी तो तुम अपने पैरों पर भी खड़े नहीं हो। तुम्हारी शादी तो मैं उसके साथ एक दिन में ही कोर्ट में करा सकता हूँ, लेकिन तुम उसे रखोगे कहाँ और उसे खिलाओगे क्या?“ मैंने उससे एक बार भी यह नहीं कहा कि तुमने गलत लड़की से प्यार किया है या उसको भूल जाओ। मैंने बस यही कहा कि पहले तुम अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, फिर शादी के बारे में सोचना। मैंने उससे वायदा किया कि अगर तुम कम से कम 10 हजार रुपये महीने कमाकर दिखाओगे, तो जिस लड़की से तुम कहोगे और वह लड़की भी तैयार होगी, तो मैं तुम्हारी शादी उसी से करा दूँगा। मैंने उसे यह वचन भी दिया कि मैं हमेशा तुम्हारा साथ दूँगा।
वह इस बात को समझ गया कि अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है। फिर मैंने उससे पूछा कि तुम क्या-क्या काम कर सकते हो? तो वह बोला कि मैं फैक्टरी में माल बनाना जानता हूँ। वास्तव में वह अपने चाचा की एक फैक्टरी में कारीगरों का काम देखता था, जिसके बदले में उसे 3 हजार रुपये महीने मिल जाते थे। मैंने कहा कि अगर हो सके तो तुम अपनी फैक्टरी लगा लो। इसमें मशीन वगैरह में एकाध लाख रुपया लग जाएगा। जगह की व्यवस्था कर लो, चाहे किराये की ही हो। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारा काम चल निकलेगा। इस पर वह तैयार हो गया। उससे कुछ और इधर-उधर की बात करके मैं चला आया।
वापस रिश्तेदार के यहाँ पहुँचकर मैंने उसके पिताजी से बात की। मैंने उनसे कहा कि मैंने रमेश को समझा दिया है। अब उसको कोई काम चाहिए। अच्छा हो कि आप उसे फैक्टरी खुलवा दें, चाहे शुरू में एक ही मशीन हो। वे इस बात पर खुशी से राजी हो गये और कहने लगे कि इसमें लाख-दो लाख जो खर्चा पड़ेगा मैं करने को तैयार हूँ।
इसके कुछ समय बाद ही रमेश ने अपनी फैक्टरी शुरू कर दी और ईश्वर की दया से वह सफल रही। प्रारम्भ में वह अपने चाचा के लिए माल बनाया करता था, लेकिन आगे चलकर मेरे ही सुझाव पर उसने अपना ब्रांड बना लिया और सीधे दुकानदारों को माल सप्लाई करने लगा। यह कार्य भी काफी सफल रहा। इसी बीच रोशनी का विवाह कहीं और कर दिया गया और रमेश भी उसे भूल गया। इस प्रकार ‘रमेश-रोशनी अध्याय’ समाप्त हुआ। बोलो सियावर रामचन्द्र की जय !
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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