आत्मकथा भाग-3 अंश-55
सिंगापुर में ऊँची-ऊँची इमारतों की भरमार है। ऐसी तो क्वालालाम्पुर में भी नहीं हैं। कई बिल्डिंग देखने में बहुत सुन्दर लगती हैं। देखकर मन खुश हो गया। सफाई इतनी है कि आश्चर्य होता है। वैसे मैं टोकियो देख चुका हूँ। वह भी काफी सुन्दर है, पर सिंगापुर की बात ही कुछ और है। यहाँ का सांघी हवाई अड्डा दुनिया का सबसे सुन्दर हवाई अड्डा माना जाता है। यह बहुत बड़ा भी है। हमने वहाँ कई घंटे गुजारे और पूरा आनन्द उठाया था। हमें वहाँ इंटरनेट की सुविधा भी मुफ्त मिल गयी थी।
सेंटोसा टापू देखने के अगले दिन सुबह लगभग 11 बजे हमें कोलम्बो होते हुए त्रिवेन्द्रम जाना था। हम सिंगापुर के प्रमुख चिह्न मेरीलायन को पास से नहीं देख पाये थे, उसे केवल दूर से देखा था। यह मछली के धड़ और शेर के सिर का मिला-जुला रूप है, जिसके मुँह से लगातार पानी की धार निकलती रहती है। यह सिंगापुर के बंदरगाह के पास एक पार्क में बड़े आकार का बना हुआ है। मेरा मन उसको पास से देखने का था। मैंने नक्शा देखा तो पता चला कि वह हमारे होटल से केवल 2-3 किमी दूर है। बच्चे और श्रीमती जी सुबह देर से उठते हैं। अतः उनको सोता छोड़कर बिना बताये मैं अकेला ही कैमरा लेकर सुबह 7 बजे ही निकल पड़ा।
नक्शे की सहायता से मैं किसी से पूछे बिना केवल 45 मिनट में वहाँ पैदल ही पहुँच गया। वहाँ एक भारतीय जोड़ा पहले से आया हुआ था। मैंने उनसे ही अपने कैमरे से अपने फोटो खिंचवाये। कुछ फोटो खुद भी खींचे। फिर पूछता हुआ लौटा। पहले मैंने मेट्रो से आने की सोची, लेकिन मेट्रो स्टेशन में नीचे जाकर भटक गया। इसलिए फिर ऊपर आकर एक सिटी बस से लौटा, जिसने मुस्तफा बिल्डिंग के पास उतार दिया। ठीक सवा नौ बजे मैं होटल में पहुँच गया। श्रीमती जी तब तक उठ गयी थीं और मुझे न देखकर परेशान हो रही थीं। लेकिन मैं समय से पहुँच गया और नाश्ता भी किया, जो 10 बजे तक ही मिलता है।
वैसे सिंगापुर में कई चीजें हम नहीं देख पाये। विशेष रूप से नाइट सफारी देखनी चाहिए थी, पर हमें इसकी जानकारी नहीं थी और न इसके लिए पर्याप्त समय था। इसलिए छोड़ देना पड़ा।
ठीक समय पर हमारी टैक्सी आ गयी और हम फिर सिंगापुर के हवाई अड्डे पर पहुँच गये। वहाँ से कोलम्बो की फ्लाइट भी समय से मिल गयी। वहाँ से त्रिवेन्द्रम की उड़ान सुबह के समय थी, इसलिए रात भर के लिए हमें एक साधारण से होटल में भेजा गया। वहीं साधारण खाना भी मिला। अगले दिन प्रातः की उड़ान से हम त्रिवेन्द्रम हवाई अड्डे पर उतरे।
त्रिवेन्द्रम में हमें अपने लोकल ट्रांसपोर्ट और होटल की व्यवस्था स्वयं करनी थी, क्योंकि यह पैकेज में शामिल नहीं थी। अतः हमने कोवलम समुद्र तट के पास होटल लेना तय किया। वहाँ कई छोटे-बड़े होटल देखने के बाद हमें एक होटल पसन्द आया, उसमें सब ठहरे। वह दिन हमने समुद्र तट पर टहलते हुए और त्रिवेन्द्रम शहर में खरीदारी करते हुए बिताया। अगले दिन हमारे साथियों को दिल्ली होते हुए वापस जाना था, जबकि हमने कन्याकुमारी घूमने का कार्यक्रम बना रखा था। इसके लिए हमने एक टैक्सी तय कर ली।
उस टैक्सी में हम रास्ते के दो-तीन मन्दिर देखते हुए कन्याकुमारी पहुँचे। वहाँ तीन समुद्र- हिन्द महासागर, गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) और सिन्धु सागर (अरब सागर) एक साथ मिलते हैं। वहाँ समुद्र में सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही दृश्य देखे जा सकते हैं। पर हम तो दिन के समय गये थे और रात में नहीं रुके थे, इसलिए ये दृश्य देखने का अवसर नहीं मिला।
वहाँ समुद्र में एक बड़ी चट्टान पर स्वामी विवेकानन्द का सुन्दर स्मारक बना हुआ है। स्वामी विवेकानन्द की बड़े आकार की मूर्ति भी है। स्वामीजी ने सर्वधर्म सम्मेलन में शामिल होने के लिए अमेरिका जाने से पहले उस शिला पर ध्यान किया था और वहीं उन्हें अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस का मार्गदर्शन मिला था। स्मारक तक एक बड़ी मोटरबोट (या जेट्टी) में जाते हैं और एक या डेढ़ घंटे बाद उसी से वापस आते हैं। स्मारक बहुत बड़ा और आकर्षक है। उसमें ध्यान करने के लिए भी एक कक्ष बना हुआ है, जहाँ बिल्कुल शान्ति रहती है। हमें स्मारक में जाकर बहुुत अच्छा लगा।
शाम तक हम वापस कोवलम आ गये और समुद्र तट पर भी टहलने गये। वैसे कोवलम का तट हमें बहुत अच्छा नहीं लगा। वहाँ घूमने की जगह कम है और गन्दगी भी है। पानी भी साफ नहीं है। रेत एकदम काली है। इसकी तुलना में गोवा, चेन्नई आदि के समुद्र तट बहुत सुन्दर हैं।
अगले दिन हम निर्धारित समय पर त्रिवेन्द्रम से पुनः कोलम्बो पहुँचे। श्रीलंका एयरलाइन की एयर होस्टेस (व्योम बालायें) यात्रियों से आते समय कहती थीं- ‘आयुबोवान’। इसका अर्थ उनकी सिंहली भाषा में ‘आप दीर्घायु हों’ होता है, जिसे मैं उस समय ‘स्वागतम्’ समझता था। अधिकांश यात्री इसके उत्तर में अंग्रेजी में ‘थैंक्यू’ कहते हैं। लेकिन मैं हमेशा शुद्ध हिन्दी में ‘धन्यवाद’ कहता था, जिसको कोई लड़की समझ नहीं पाती थी। लेकिन एक लड़की यह शब्द समझ गयी। वह शायद कभी भारत में रही होगी या किसी से सीख लिया होगा। इसको समझते ही वह एकदम खुश हो गयी और मुस्करा पड़ी। यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा।
हम कोलम्बो तो समय से पहुँच गये, लेकिन वहाँ से दिल्ली की उड़ान रात के समय थी। इसलिए हमें दिन भर के लिए एक अच्छे होटल में ले जाया गया, जो कोलम्बो से लगभग 12 किमी दूर समुद्र के किनारे एक रमणीक स्थान पर था। होटल अच्छा था और जलपान तथा भोजन भी। दोपहर को थोड़ा सोने के बाद हम समुद्र तट पर टहलने निकले। वहाँ काफी भीड़ थी। वहाँ से थोड़ी दूर पर कुछ लड़के पतंगें उड़ा रहे थे। सूर्यास्त हो रहा था। सारा वातावरण बहुत आनन्ददायक था। हमने सूर्यास्त का दृश्य देखा और कैमरे में भी कैद किया।
ठीक शाम को 7 बजे हमें लेने टैक्सी आ गयी और हम फिर कोलम्बो हवाई अड्डे आ गये। लेकिन कोलम्बो से दिल्ली की फ्लाइट, जो श्रीलंका एयरलाइन की थी, रद्द हो गयी थी। कोलम्बो हवाई अड्डे पर एयरलाइन वालों ने हमसे कहा कि आपकी दूसरी व्यवस्था की जायेगी, लेकिन समय लगेगा। मजबूरी में हम इंतजार करने लगे। वहाँ काफी ठंड थी। कम्बलों की संख्या भी पर्याप्त नहीं थी। उस पर तुर्रा यह कि खाने-पीने के लिए कुछ नहीं दिया गया। बड़ी मुश्किल से दिल्ली की उड़ान मिली। रात्रि देर से हम दिल्ली पहुँचे। चंडीगढ़ के लिए हमने शताब्दी एक्सप्रेस में आरक्षण करा रखा था, जो प्रातःकाल थी। इसलिए रात्रि के कुछ घंटे हवाई अड्डे पर ही बिता दिये और सुबह टैक्सी से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे। फिर वहाँ से चंडीगढ़ और फिर पंचकूला।
हमारी यह विदेश यात्रा बहुत आनन्दप्रद रही। हमारे साथी काफी खुशमिजाज और मिलनसार थे। उनका साथ हमें अच्छा लगा और यात्रा में किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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