आत्मकथा भाग-3 अंश-54

 होटल के कमरे में पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी थी, इसलिए हम रेडीमेड भोजन करके सो गये और दूसरे दिन सुबह नाश्ता करने के बाद ही घूमने निकले। वहाँ देखने की चीजें उसी होटल में नीचे हैं। वास्तव में वहाँ और कोई होटल या दुकान है ही नहीं। वहाँ तरह-तरह के विलक्षण झूले और मनोरंजन की वस्तुएँ हैं। एक मिनी रेल भी चलती है। इन सबमें अलग-अलग टिकट लगती है।

लेकिन वहाँ की सबसे प्रमुख चीज है कैसिनो अर्थात् जुआघर। वहाँ के कैसिनो दुनिया के सबसे बड़े कैसिनो माने जाते हैं। संसार भर के लोग वहाँ जुआ खेलने आते हैं और अपनी जेबें खाली करके चले जाते हैं। हमने कभी कैसिनो देखे नहीं थे। हम देखना चाहते थे, पर सब में सबको नहीं जाने दिया जाता। केवल खेलने वाले ही जा सकते हैं। एक में हमें जाने दिया गया, तो देखा कि वहाँ तरह-तरह के जुए खिलाने की अनेक मेजें लगी हुई हैं। हर मेज पर कम्प्यूटर की सहायता से कोई लड़की जुआ खिला रही थी। वह ताश कम्प्यूटर से ही बँटवाती थी और दाँव पर लगे टोकन एकत्र करती थी। जीतने वाले को टोकन ही देती थी। जब कोई आदमी अपने सारे टोकन हार जाता था, तो नकदी देकर और टोकन खरीद सकता था तथा बचे हुए टोकन देकर नकदी ले सकता था।
मैं काफी देर तक यह खेल देखता रहा और समझ गया कि इस खेल में केवल कम्प्यूटर जीतता है और सभी खिलाड़ी धीरे-धीरे सारे टोकन हार जाते हैं, हालांकि बीच-बीच में वे जीतते भी हैं। एक और जगह जुआ हो रहा था, लेकिन वहाँ पुरुषों को टिकट लेकर ही जाने दिया जाता था। केवल महिलायें बिना टिकट जा सकती थीं। श्रीमतीजी तथा हमारे साथ की अन्य महिलाएँ थोड़ी देर के लिए वहाँ गयीं और ऊबकर वापस आ गयीं। हम दिन भर जेंटिंग में खूब घूमे। फिर होटल में जाकर सो गये।
सुबह ही हमें हवाई जहाज से सिंगापुर जाना था। इसलिए नियत समय पर टैक्सी आ गयी और कई घंटे बाद हम हवाई अड्डे पहुँच गये। हमारी उड़ान शाम के समय थी, जबकि हम दोपहर को ही पहुँच गये थे। इसलिए लगभग 3-4 घंटे क्वालालाम्पुर हवाई अड्डे पर ही गुजारे। वहाँ घूमने-फिरने पर कोई रोकटोक नहीं है। ढेर सारी दुकानें हैं। उनमें अच्छे खिलौने आदि बिक रहे थे, उनकी कीमत भी उचित थी, परन्तु सामान का वजन अधिक हो जाने के डर से हमने कुछ नहीं खरीदा।
निर्धारित समय पर हम सिंगापुर पहुँच गये। वहाँ हमारा होटल लिटिल इंडिया नामक जगह पर मुस्तफा बिल्डिंग के बिल्कुल सामने था। इस क्षेत्र में भारतीयों की अच्छी संख्या है, इसलिए इसे लिटिल इंडिया कहा जाता है। यह अच्छा साफ-सुथरा स्थान है। वहाँ उचित दामों पर खाने-पीने की सभी चीजें मिल जाती हैं। अच्छे खासे बाजार भी हैं, जिनमें चीनी माल की भरमार है। हमारा होटल अलग था और हमारे साथियों की व्यवस्था पास के दूसरे होटलों में की गयी थी।
मुस्तफा बिल्डिंग हमारे यहाँ के बिग बाजार या वाॅल मार्ट जैसा रिटेल स्टोर है। लेकिन इतना बड़ा है कि बिग बाजार उसके सामने बच्चा लगता है। उसमें सुई से लेकर फ्रिज, टीवी और फर्नीचर तक सब कुछ मिल सकता है। यहाँ तक कि सोने-चाँदी के गहने भी मिलते हैं। इस स्टोर पर हालांकि रेट कम नहीं हैं, लेकिन बाजार से अधिक भी नहीं हैं। हम उसमें काफी देर तक घूमते रहे और छोटी-मोटी चीजें खरीदीं।
अगले दिन हमें आधे दिन तक शहर घुमाया गया। वास्तव में केवल दूकानों पर घुमाया गया। उस दिन शाम को हम स्वतंत्र थे, इसलिए मुस्तफा बिल्डिंग तथा आस-पास के बाजार में खरीदारी करते रहे। हमने अगले दिन वहाँ से एक कैमरा भी खरीदा, जो काफी अच्छा है और भारत से कुछ सस्ता ही था। वैसे वहाँ इलैक्ट्राॅनिक्स के सामान की एक मशहूर दुकान है, जिसे दर्शन सिंह की दुकान कहा जाता है। वहाँ ऐसी चीजें बिना टैक्स के मिल जाती हैं, जिससे काफी सस्ती पड़ती हैं, लेकिन हमारी पसन्द का कैमरा वहाँ नहीं मिल पाया। इसलिए हमने मुस्तफा बिल्डिंग से खरीदा।
अगले दिन हमें सैंटोसा टापू जाना था, जो सिंगापुर का मुख्य आकर्षण है। बस से हमें मेट्रो रेल के स्टेशन तक पहुँचाया गया। फिर उस रेल से टापू तक पहुँचे। यह बहुत सुन्दर टापू है, जिसके अन्दर ढेर सारी दर्शनीय चींजें हैं, जैसे पानी से घिरी हुई सुरंग, जिसमें सब ओर मछलियाँ तैरती रहती हैं, डाॅल्फिन शो, लेजर शो, हाॅरर शो आदि। हम जो देख सकते थे, वे देख लिये। डाॅल्फिन शो देखकर हमें बड़ा मजा आया। वे पानी में तरह-तरह के खेल करती हैं।
अँधेरा होने पर हमने लेजर शो देखा। वह भी हमें बहुत अच्छा लगा। लेजर शो का नाम तो बहुत सुना था, पर देखने का मौका पहली बार मिला। इस शो के बाद जिस तरह हम सेंटोसा गये थे, उसी तरह वापस आ गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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