आत्मकथा भाग-3 अंश-53

अगले दिन हमने होटल में नाश्ता किया। वहाँ नाश्ते का अच्छा इंतजाम होता है, क्योंकि अधिकांश टूरिस्ट केवल नाश्ता होटल में करते हैं। वहाँ सभी तरह के नाश्ते की व्यवस्था होती है और सैकड़ों वस्तुएँ बनी हुई रखी रहती हैं। गर्म करने की भी व्यवस्था है। नाश्ते में माँसाहारी चीजें जैसे मछली, सी-फूड वगैरह भी होता है। उनको देखकर श्रीमती जी को मितली आती है, इसलिए हमने एक कोने में बैठकर नाश्ता किया। मैं क्योंकि चाय या काॅफी नहीं पीता, इसलिए दूध गर्म करा लिया, जो वहाँ उपलब्ध रहता है। सब लोग तगड़ा नाश्ता करते हैं, क्योंकि दोपहर के भोजन का कोई ठिकाना नहीं है कि कब-कहाँ-कैसा मिलेगा और मिलेगा भी कि नहीं।
नाश्ते के बाद हम पेट्रोनास के जुड़वाँ टावर देखने गये। मैंने सोचा था कि मामूली सी मीनारें होंगी। लेकिन पास जाकर देखा तो वह अच्छा-खासा बाजार ही था। लगभग एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ। उसमें अंडरग्राउंड पार्किंग की भी व्यवस्था है। दोनों टावर दुनिया में सबसे ऊँचे ट्विन टावर माने जाते हैं। ये 46वीं मंजिल पर एक गलियारे से जुड़े हैं। लेकिन टावर के अन्दर जाने की अनुमति सबको नहीं होती। रोज प्रातः केवल 100 पास बनाये जाते हैं। उसके बाद केवल वहाँ काम करने वाले लोग ही टावरों के अन्दर जा सकते हैं। वैसे नीचे की पहली मंजिल पर अनेक सुन्दर दुकानें हैं, जहाँ सब घूम सकते हैं। ऊपर की मंजिलों पर केवल कम्पनियों के ऑफिस हैं या फ्लैट हैं। हमें ट्विन टावर देखकर बड़ा मजा आया। रात को हमने अपने होटल की एक खिड़की से ट्विन टावरों को देखा, तो वे हीरों की तरह चमकते हुए दिखाई पड़े। यह देखकर हमें बहुत अच्छा लगा।
वहाँ से हम क्वालालाम्पुर टावर देखने गये। वह भी काफी ऊँची है, लेकिन उसमें टिकट लगती है, जो लगभग 250 रुपये के बराबर थी। टिकट लेकर हम लिफ्ट से ऊपर गये। वहाँ से सारा शहर दिखाई देता है। ऊपर भी दुकानें हैं, लेकिन केवल खाने-पीने के सामान की। वहाँ से हम मलेशिया के राजा का महल देखने गये, जो बाहर से ही देखा जा सकता है। रास्ते में एक चाकलेट फैक्टरी है, जहाँ चाकलेट बनाते दिखाया जाता है। बेची भी जाती हैं, लेकिन उनके रेट बहुत ऊँचे हैं।
शाम को हम खाना खाने फिर चाइना टाउन के पास गये। हालांकि वहाँ जाने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि हमारे होटल के पास ही एक अच्छा दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट है, जिसके बारे में हमें पहले पता नहीं था।
अगले दिन हम बटरफ्लाई पार्क देखने गये। वहाँ हजारों तरह की तितलियाँ रखी जाती हैं। हमें बहुत अच्छा लगा, हालांकि गर्मी काफी थी। दोपहर बाद हमने टाइम्स स्क्वायर देखने की योजना बनायी। यह 7 मंजिल का बाजार है और हर मंजिल पर लगभग 200 दुकानें हैं। इसी में एक वाटर पार्क भी है, जहाँ टिकट लेकर खेल कराये जाते हैं। दीपांक और मेहरोत्रा जी का लड़का उसे देखने चले गये। हम दुकानें देखने लगे। हमने नोट किया कि हर मंजिल चढ़ने पर चीजों के रेट कम होते जाते हैं, जैसा कि स्वाभाविक भी है, क्योंकि ऊपर की मंजिलों पर ग्राहक कम जाते हैं।
शाम को हमने अपने होटल के पास ही दक्षिण भारतीय भोजन किया। यहाँ यह बता देना उचित होगा कि पूरे मलेशिया में दक्षिण भारतीय (मुख्यतः तमिल) बड़ी संख्या में रहते हैं। वे प्रायः टैक्सी चलाते हैं तथा अन्य कार्य भी करते हैं। वे भारतीयों की बहुत सहायता भी करते हैं, हालांकि हिन्दी नहीं समझते, केवल अंग्रेजी में बात कर लेते हैं। उनके कारण पूरे मलेशिया में कहीं भी दक्षिण भारतीय भोजन सरलता से मिल जाता है, जबकि उत्तर भारतीय भोजन मिलना कठिन होता है।
अगले दिन हमें जेंटिंग जाना था, जो एक ऊँचे पहाड़ पर बना हुआ टूरिस्ट स्पाॅट है। हमें यह पहले ही बता दिया गया था कि जेंटिंग में खाने-पीने की कोई चीज नहीं मिलेगी, इसलिए अपना इंतजाम करके जाना है। हमारे साथी अधिकारी ऐसे पैकेट लाये थे, जिनमें केवल गर्म पानी मिला लेने से अच्छी खाने योग्य वस्तु बन जाती है, जैसे नूडल, पुलाव आदि। हमने उससे ही काम चलाया। गर्म पानी होटल की हर मंजिल पर उपलब्ध रहता है।
जेंटिंग के रास्ते में पहले हमने एक दक्षिण भारतीय मंदिर देखा, जिसे मुरुगन स्वामी कहा जाता है। यह शिवजी और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का मन्दिर है, जो देवताओं के सेनापति माने जाते हैं। मंदिर एक खोखले पहाड़ की गुफा में बना है और वहाँ तक जाने के लिए लगभग 100 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। गुफा की छत में एक बड़ा छेद भी है, जिससे सूर्य की रोशनी और धूप भी खूब आती है। अच्छी रमणीक स्थान है। देखकर हमें बड़ा आनन्द आया। मंदिर के पास ही हमने दोपहर का भोजन किया। वहाँ से जेंटिंग के लिए चले।
यों तो जेंटिंग के लिए सड़क का रास्ता भी है, जिससे डेढ़ या दो घंटे लगते हैं। लेकिन हमें एक स्थान से रोपवे की ट्राॅली में बैठाया गया। ट्राॅली पर बैठकर सारा पहाड़ दिखायी देता है। रास्ता बहुत लम्बा है। इसलिए ट्राॅली में भी कम से कम आधा घंटा लग जाता है।
जेंटिंग में दुनिया का सबसे बड़ा होटल है, जिसमें कहा जाता है कि 5 हजार कमरे हैं। कमरे बुक कराने के लिए वहाँ एक-दो नहीं पूरे 32 काउंटर हैं, जो दिन-रात काम करते रहते हैं। फिर भी काफी देर इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि भीड़ बहुत रहती है। वहाँ टोकन से नम्बर लेना पड़ता है। जो भी काउंटर खाली होता है, अपना नम्बर आने पर हम उसी पर जाकर अपना काम करा सकते हैं। यह सारी व्यवस्था कम्प्यूटरीकृत है। हमारे साथ जो ड्राइवर था, उसने सारी व्यवस्था कर दी। कमरे अच्छे थे। हम 10 व्यक्ति थे, इसलिए हमें 5 कमरे दिये गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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