आत्मकथा भाग-3 अंश-52

मलेशिया-सिंगापुर-श्रीलंका भ्रमण
मैं तो एक बार विदेश यात्रा (जापान की) कर आया था, लेकिन श्रीमतीजी और बच्चों को इसका मौका तब तक नहीं मिला था। हालांकि वे कई बार भारत में ही हवाई यात्रा कर चुके थे। मेरी आर्थिक हैसियत ऐसी नहीं थी कि उन्हें अपने बल पर विदेश भ्रमण करा सकता। तभी हमें पता चला कि हम बैंक की एलटीसी योजना के अन्तर्गत भी विदेश यात्रा कर सकते हैं। हमारे संस्थान में ही पदस्थ चुघ साहब कुछ समय पूर्व ही सिंगापुर-मलेशिया घूमकर आये थे और उन्होंने ही हमें यह जानकारी दी थी। वास्तव में कुछ कम्पनियाँ भारत के किसी स्थान जैसे चंडीगढ़ से त्रिवेन्द्रम या दिल्ली से अंडमान के बीच के हवाई जहाज के किराये में ही सिंगापुर-मलेशिया भी घुमा देते हैं। इसके लिए पूरा पैकेज होता है, जिसमें हवाई यात्रा के साथ ही होटल में ठहरना, नाश्ता और रात का खाना, हवाई अड्डे और होटल तक लाना-ले जाना तथा सीमित भ्रमण भी शामिल है। दोपहर का खाना और घूमने का शेष खर्च स्वयं करना पड़ता है।
यह पता चलते ही हमने मई-जून 2006 में सिंगापुर-मलेशिया की यात्रा का कार्यक्रम बना लिया। सबसे पहले तो हमने सबके पासपोर्ट बनवाये, जो दो महीने में ही आसानी से बन गये। पंचकूला में इसकी व्यवस्था उत्तर प्रदेश के शहरों की तुलना में बहुत अच्छी है और वहाँ भीड़भाड़ भी कम है। फिर हमने बैंक से इस यात्रा पर जाने की अनुमति ली। यह भी आसानी से मिल गयी, क्योंकि पहले कई अधिकारी इसी प्रकार जा चुके थे। हमने अपनी टिकट भी एक एजेंट के माध्यम से बनवा लीं। हमने रात का खाना उसमें शामिल नहीं कराया, क्योंकि उसमें केवल माँसाहारी भोजन मिलता है। इसके बदले हमें कुछ पैसे मिल गये, जिनसे हम अपनी मर्जी से भोजन कर सकते थे। हमें पैकेज श्रीलंका एयरलाइन्स का मिला था, जो हालांकि बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं था।
निर्धारित दिन हम चंडीगढ़ से दिल्ली ट्रेन में गये, क्योंकि चंडीगढ़ से दिल्ली उड़ान का समय हमारे लिए सुविधाजनक नहीं था। वहाँ से हम टैक्सी में दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचे। फिर श्रीलंका एयरलाइन्स की उड़ान से कोलम्बो पहुँचे। वहाँ से प्रातःकाल की उड़ान से हम आराम से क्वालालाम्पुर पहुँच गये। वहाँ एयरपोर्ट के भीतर ही मेट्रो जैसी रेल चलती है, जिसे ऐरो एक्सप्रैस कहते हैं। उसमें बैठकर हम हवाईअड्डे के बाहरी भाग में आये। यह बहुत सुन्दर व्यवस्था है। हमें मलेशिया का वीजा वहीं पहुँचकर लेना था, जो फ्री मिलता है, लेकिन पूरी जानकारी न होने के कारण हम गलत काउंटर पर चले गये और उसने लगभग 5 हजार रुपये लेकर हमें वीजा दिया। बाद में गलती पता चलने पर हमने अपने रुपये वापस लेने की कोशिश की, लेकिन वह कोशिश बेकार गयी।
बाहर आने पर हमें पता चला कि हमारे साथ दो परिवार और भी आये हैं जो उसी कम्पनी के पैकेज को लेकर आये हैं। उनमें से एक श्री भारद्वाज पंजाब नेशनल बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक थे, जो लुधियाना से आये थे और दूसरे श्री मेहरोत्रा बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य प्रबंधक थे, जो हिसार से आये थे। वास्तव में ऐसे पैकेज पर घूमने वाले 90 प्रतिशत लोग बैंकों के ही होते हैं, क्योंकि उन्हें छुट्टी और अनुमति आसानी से मिल जाती है। श्री मेहरोत्रा के साथ उनके दो बच्चे थे- एक लड़का और एक लड़की। श्री भारद्वाज के साथ कोई बच्चा नहीं था। कुल मिलाकर हम 10 व्यक्ति थे।
हम एक साथ ही एक ही बड़ी टैक्सी में बैठकर एक होटल तक आये, जहाँ कमरा मिला। वास्तव में हमें किसी दूसरे होटल में जाना था, लेकिन ड्राइवर को स्पष्ट आदेश नहीं दिये गये थे, इसलिए वह किसी और होटल में ले गया। कमरे वहाँ भी मिल गये, जो अच्छे थे। वहाँ हमें कमरों की चाभी किसी क्रेडिट कार्ड की तरह दी गयी थी। उसमें सारी बातें भर दी जाती हैं। कमरा खोलने के लिए उसे दरवाजे में ही लगे हुए एक स्कैनर से स्कैन करना पड़ता है। अगर कार्ड सही होता है, तो कमरा खुल जाता है। रहने की अवधि पूरी हो जाने पर कार्ड अपने आप बेकार हो जाता है। ऐसे कार्डों में थोड़ा सा अतिरिक्त खर्च होता है, लेकिन व्यवस्था बहुत ही सुविधाजनक है। मलेशिया और सिंगापुर से सारे होटलों में ऐसी ही चाभी दी जाती है। भारत में तो ऐसा शायद अभी भी केवल 5 स्टार होटलों में होता है।
क्वालालाम्पुर एक अच्छा शहर है। लेकिन वहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलना कठिन होता है। पहले दिन हमें अपना भोजन तलाशने में बहुत कठिनाई आयी। दोपहर को हमने वहीं एक होटल में खाना खा लिया, जो बिल्कुल स्वादिष्ट नहीं था। मलेशिया में कपड़े बहुत सस्ते मिलते हैं। वहाँ की मुद्रा रिंगित है। उस समय एक रिंगित 14 रुपयों के बराबर होता था। वहाँ 6 रिंगित में ही बच्चों के अच्छे कपड़े मिल जाते हैं। अधिक रिंगित में अधिक अच्छे कपड़े मिलते हैं। सारे कपड़े चीन में बने होते हैं।
शाम को हम चाइना टाउन गये। वहाँ जाने के लिए मोनो रेल चलती है। इसमें केवल एक या दो डिब्बे होते हैं। इसकी पटरी खम्भों पर टिकी होती है, अर्थात् यह हवा में चलती है। हमें इसमें बहुत मजा आया। जाते हुए और आते हुए भी मेट्रो में बैठे हुए ही क्वालालाम्पुर के बाजार देखे, जो बहुत सुन्दर हैं।
चाइना टाउन में, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, चीनियों की दुकानें हैं। वहाँ सभी वस्तुएँ मिलती हैं। वास्तव में सारी दुनिया के बाजार चीनी माल से पटे पड़े हैं। पर ये दुकानें खुद चीनियों की हैं, इसलिए अधिक भीड़ रहती है। इन दुकानों में चीनी लड़कियाँ ग्राहकों को लूटने की पूरी कोशिश करती हैं। दाम दूने-तिगुने बताती हैं और मोल-भाव करने के लिए तैयार रहती हैं। यदि आप मोल-भाव करना जानते हैं, तो उचित दामों पर वस्तुएँ खरीद सकते हैं, वरना ठगे जाने की पूरी संभावना है। चाइना टाउन से हमने ज्यादा खरीदारी नहीं की, लेकिन घूमे खूब। वहीं पास में ही एक दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट है। वहाँ अच्छा खाना उचित दामों पर मिलता है। हालांकि हम थोड़ा लेट हो गये थे, लेकिन काम चलाऊ भोजन मिल गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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