आत्मकथा भाग-3 अंश-51

होली समारोह
मैं बता चुका हूँ कि श्री वी.के. चावला उस समय चंडीगढ़ मंडल के उप महाप्रबंधक थे। 2006 में उन्होंने सभी अधिकारियों और उनके परिवार के साथ होली मिलन का आयोजन किया। यह आयोजन पंचकूला से सटे हुए जीरकपुर में शिमला हाईवे के किनारे बने एक बड़े होटल में किया गया था। मैं प्रायः ऐसे आयोजनों में भाग नहीं लेता, लेकिन कुछ अधिकारियों के आग्रह पर श्रीमतीजी के साथ इसमें शामिल हुआ। वहाँ खाने के साथ पीने की भी व्यवस्था थी, जो मेरे किसी काम की नहीं थी। बीच में डांस भी हुआ। श्रीमतीजी ने अच्छा डांस किया। चावला जी से उनका परिचय नहीं था, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि वे मेरी धर्मपत्नी हैं, तो बहुत आश्चर्य करने लगे। बाद में उन्होंने सभी पति-पत्नी के जोड़ों को बुला-बुलाकर डांस कराया। हम दोनों ने भी थोड़ी देर नृत्य किया। चावला जी स्वयं भी नाचे थे और वे अच्छा नाच लेते हैं।
एक अधिकारी की समस्या
हमारे संस्थान के एक कम्प्यूटर अधिकारी थे और फैकल्टी के रूप में वहाँ आये थे। उनका नाम लिखना मैं उचित नहीं समझता। वे बहुत सीधे और कम बोलने वाले हैं। उनकी एक प्यारी सी बेटी भी है, जो कभी-कभी हमारे संस्थान में आती थी।
एक दिन रविवार के दिन शाम को लगभग 5 बजे वे बदहवास से हमारे घर पर आये। उनको इस हालत में देखकर हम घबरा गये कि पता नहीं क्या हो गया। पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि उनकी श्रीमती जी ने उनको मारा है और वे घर छोड़कर आ गये हैं। इसके अलावा उन्होंने और कुछ नहीं बताया। हम अपनी कार से उनको लेकर उनके घर गये। उनकी श्रीमती जी हमें जानती थीं। वे समझीं कि हम उनसे मिलने आये हैं। जब हमने बताया कि ये इस हालत में हमारे पास आये हैं और हम आपसे समस्या की जानकारी करने आये हैं, तब उन्होंने रोते हुए बताया कि जाने क्यों उनको यह शक है कि बेटी उनकी नहीं है। एक बार वे क्रोध में बेटी का गला ही दबाये दे रहे थे, जिसके कारण उन्होंने उनको थप्पड़ मारे थे और बेटी को बचा लिया था।
तब हमारी श्रीमती जी ने दोनों को बहुत समझाया और कहा कि अपनी बेटी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए आपको ऐसा झगड़ा नहीं करना चाहिए। फिर हमने उनको राय दी कि आप दोनों सप्ताह में कम से कम एक बार साथ-साथ घूमने जाया करो और रोज मन्दिर भी जाया करो, जो पास में ही था। उनको काफी समझाकर हम लौटे। उसी दिन वे सब मन्दिर गये और वहाँ काफी देर तक बैठे। तब उनके दिमाग को शान्ति मिली।
सौभाग्य से इसके बाद फिर उनके घर से ऐसी कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई। बीच-बीच में मैं उनसे पूछ लेता था कि कोई समस्या तो नहीं है। वे भी काफी प्रसन्न और संतुष्ट नजर आते थे, इससे मुझे भी प्रसन्नता होती थी। उनकी पुत्री को तरह-तरह की टिकटें एकत्र करने का शौक था। मुझे जो भी टिकट, जैसे बस, ट्रेन, राॅक गार्डन, पिंजौर आदि की प्राप्त हो जाती थीं, मैं उनको दे देता था। कुछ समय बाद टिकटों से उनकी बेटी का मन भर गया, इसलिए मैंने भी देना बन्द कर दिया। वे अधिकारी बाद में मेरे साथ नित्य योग भी करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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