आत्मकथा भाग-3 अंश-50

चंडीगढ़-पंचकूला की ठंड
चंडीगढ़ पहाड़ों के पास है और दिल्ली से काफी उत्तर में हिमालय पर्वत के निकट है। इसलिए इस बात का मुझे भान था कि वहाँ काफी ठंड पड़ती होगी। मैं दिल्ली में तीन साल रहकर वहाँ की ठंड भुगत चुका था, इसलिए सोचा था कि चंडीगढ़ में थोड़ी ज्यादा ठंड होगी, लेकिन यह मेरे अनुमान से भी अधिक निकली। चंडीगढ़ और पंचकूला आपस में सटे होने के कारण और रास्ते में कोई प्राकृतिक बाधा न होने के कारण दोनों शहरों का मौसम हमेशा लगभग एक सा रहता है। इसलिए पंचकूला में भी काफी ठंड पड़ती थी। रात में बाहर का तापमान कई बार शून्य को छू जाता है और 5-6 डिग्री तक गिर जाना तो सामान्य बात है। दिन में भी बाहर का तापमान अधिकतर 12-13 डिग्री बना रहता है। ऐसी ठंड में बाहर निकलना बहुत कठिन होता है।
यहाँ हमारी कार बहुत काम आयी। मेरा कार्यालय हमारे निवास से केवल 1 किमी दूर था। इसलिए पहले हमारा ड्राइवर रवीन्द्र और बाद में श्रीमती जी रोज कार में मुझे ऑफिस छोड़ आती थीं और ले भी आती थीं। इससे रास्ते में ठंड का अनुभव नहीं होता था। हमारा संस्थान वैसे तो सब ओर से बन्द था, लेकिन काफी ठंडा रहता था। वहाँ बिजली से चलने वाले ब्लोअर काम आते थे। उनसे हालांकि कमरा अधिक गर्म नहीं हो पाता था, लेकिन इतना गर्म अवश्य हो जाता था कि हम ठंड में ठिठुरे बिना आराम से काम कर सकें।
घर पर भी हम हीटर चलाते थे। परन्तु हरियाणा में बिजली बहुत महँगी है, इसलिए हमने कोयले की अँगीठी लगाना शुरू किया। कम ठंड में शाम को एक बार और अधिक ठंड में सुबह-शाम दोनों बार मैं पीछे वाले खुले स्थान में अँगीठी लगा लेता था। जब सारे कोयले लाल हो जाते थे और धुँआ निकलना बन्द हो जाता था, तो मैं अँगीठी को भीतर उठा लाता था। उससे एक बार में तीन-चार घंटे तक आसानी से गर्मी मिल जाती थी और पूरा घर गर्म हो जाता था।
यहाँ यह बता हूँ कि चंडीगढ़-पंचकूला में अधिकांश मकान ऐसे बनाये जाते हैं जो सभी ओर से बन्द हों। उनके दरवाजे बन्द कर देने पर हवा बाहर से अन्दर बिल्कुल नहीं आ सकती। बाथरूम और शौचालय तक भीतर ही बनाये जाते हैं। इसलिए घर में रहते हुए बाहर निकलने की आवश्यकता प्रायः नहीं पड़ती। दरवाजे बन्द कर लेने पर बाहर का तापमान भले ही 12-13 हो, लेकिन भीतर का तापमान 18-19 बना रहता था, अर्थात् थोड़ी सी ठंड, जो गर्म कपड़ों में सहन की जा सकती थी। कानपुर में हमारे घरों में यह बात नहीं थी। वहाँ किचन, बाथरूम और शौचालय सभी का रास्ता खुले में होकर था। इससे जाड़ों में घर हमेशा ठंडा और गर्मियों में सदा गर्म बना रहता था।
चुघ साहब और नितिन राजुरकर
अभी तक हम अपने संस्थान का हिसाब-किताब स्वयं रखा करते थे। परन्तु हम सभी कम्प्यूटर अधिकारी थे, इसलिए हिसाब-किताब का काम करने में कठिनाई अनुभव करते थे। लेखाबन्दी के समय यह कठिनाई और अधिक बढ़ जाती थी। इसलिए हमारे निरन्तर आग्रह पर हमें एक अधिकारी मिले श्री के.सी. चुघ, वरिष्ठ प्रबंधक, जो मंडलीय कार्यालय चंडीगढ़ से हमारे संस्थान में आये थे। वे मूलतः सोनीपत के रहने वाले थे और दो-ढाई साल में रिटायर भी होने वाले थे। संस्थान के एकाउंट का कार्य मैं और चुघ साहब दोनों मिलकर देखते थे। वास्तव में मैं उनसे यह कार्य सीख रहा था।
जब चुघ साहब हमारे संस्थान में पदस्थ हुए, तो मंडलीय कार्यालय के मेरे परिचित एक अधिकारी ने मुझसे कहा कि इनसे बचकर रहना। मैं उस समय समझ नहीं पाया कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। लेकिन शीघ्र ही इसका रहस्य मुझे ज्ञात हो गया। बात यह थी कि चुघ साहब गलतियाँ पकड़ने में सिद्धहस्त थे और कई अधिकारी, जो जानबूझकर बैंक को धोखा देने के इरादे से बिलों में या लेन-देन में गड़बड़ करते थे, उनकी करतूत को चुघ साहब पकड़ लेते थे और उनको सजा दिलवाते थे। चंडीगढ़ मंडल के ऐसे 5 अधिकारियों को वे निलम्बित (सस्पेंड) करा चुके थे। इसी बात के सन्दर्भ में मेरे मित्र ने मुझे सावधान किया था। परन्तु मुझे डरने की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि मैं तो ऐसी गड़बड़ कभी करता ही नहीं।
परन्तु हमारे संस्थान के एक अधिकारी श्री नितिन राजुरकर ने ऐसी गलती कर दी। हुआ यह कि वे किसी ट्रेनिंग पर बाहर गये थे। वापस आकर उन्होंने होटल के बिल में ओवरराइटिंग करके रकम बढ़ा ली। जब बिल पास होने के लिए मेरे और चुघ साहब के पास आया, तो मुझे ओवरराइटिंग के कारण शक हुआ। मैंने गौड़ साहब को इसकी जानकारी दी। उनको भी शक हो गया, क्योंकि ओवरराइटिंग बहुत मूर्खता से की गयी थी, जिस पर किसी का भी ध्यान जा सकता था। उन्होंने होटल को फोन करके उस बिल की दूसरी प्रति (कार्बन प्रति) की फोटोकापी मँगा ली। जब बिल की दूसरी प्रति आयी, तो राजुरकर साहब की जालसाजी स्पष्ट हो गयी।
इसके साथ ही चुघ साहब ने राजुरकर के पुराने बिलों की भी छानबीन चालू कर दी, जिनका भुगतान मैं चुघ साहब के आने से पहले कर चुका था। पता चला कि एक बार उन्होंने हवाई जहाज के किराये में जो दोनों तरफ का 20 हजार होता है, एक-एक तरफ का 20 हजार वसूल कर लिया है। यह जानकारी होते ही हमने उनके वेतन से 20 हजार की कटौती कर ली। वह बिल मैंने पास किया था, इसलिए मेरी भी गलती थी, परन्तु नितिन राजुरकर ने इस पर चुप्पी साधे रखी और अधिक रकम वसूल कर ली, इसलिए उस गलती के लिए भी उनको दोषी माना गया।
बेईमानी स्पष्ट होते ही नितिन राजुरकर को सारे कामों से अलग कर दिया गया, उनको कम्प्यूटर छूने से भी रोक दिया गया और एक खाली कमरे में अलग बैठा दिया गया। इस मामले की पूरी रिपोर्ट चुघ साहब ने तैयार करके मंडलीय कार्यालय चंडीगढ़ को भिजवा दी। शीघ्र ही राजुरकर के निलम्बन का आदेश आ गया। बाद में राजुरकर को शायद चेतावनी देकर माफ कर दिया गया, परन्तु वे बैंक की नौकरी से निकल गये और किसी प्राइवेट कम्पनी में चले गये। वास्तव में नितिन राजुरकर बहुत योग्य हैं, हमारे संस्थान में जो साॅफ्टवेयर तैयार किया जा रहा था, उसमें उनका बहुत योगदान था, परन्तु पैसे की भूख ने उनकी बहुत बेइज्जती करायी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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