आत्मकथा भाग-3 अंश-49
आगरा में दीपावली
मेरे पंचकूला स्थानांतरण के बाद नवम्बर 2005 में दीपावली का त्यौहार पड़ा। मैं पिछले डेढ़ साल से आगरा नहीं गया था, इस कारण अपने परिवारियों से नहीं मिल पाया था। इसलिए हमारा विचार दीपावली आगरा में मनाने का हुआ। आगरा में हमारे सभी भाई-बहिन और अन्य बहुत से रिश्तेदार रहते हैं। अपना घर और ससुराल तो है ही। इन सबके यहाँ आने-जाने में हमें ऑटोरिक्शा का सहारा लेना पड़ता था और काफी परेशानी भी होती थी। इसलिए हमारा विचार यह बना कि इस बार कार लेकर आगरा जायेंगे। ड्राइवर रवीन्द्र हमारे पास था ही। वह प्रसन्नता से आगरा जाने को तैयार हो गया।
आगरा जाने से पहले हमने कार की धुलाई-सफाई और जाँच भी कराई, ताकि वह रास्ते में गच्चा न दे जाये। हमारे पास सामान बहुत था, इसलिए सामान रखने के लिए एक स्टैंड खरीदा गया और स्टैंड को कार पर ऊपर लगा दिया गया। हमारा ड्राइवर रवीन्द्र इन कामों में बहुत कुशल है। उससे मैंने भी स्टैंड फिट करने का तरीका सीख लिया। गाड़ी का पहिया बदलना भी मैंने उसी से सीखा।
निर्धारित दिन हम प्रातः 6 बजे ही चल पड़े। दिल्ली तक आराम से पहुँच गये केवल 4 घंटे में, लेकिन दिल्ली पार करने में 2 घंटे लग गये। रास्ते में जलपान किया और एक जगह खाना खाया। किसी तरह शाम को 4 बजे तक हम आगरा पहुँचे। तब तक सब बहुत थक गये थे। हमने इतनी थकान की कल्पना नहीं की थी। सोचा था कि आराम से पहुँच जायेंगे, पर वैसा नहीं हुआ। सड़कें खराब होना भी एक कारण था। रास्ते में दीपांक और श्रीमतीजी ने भी कुछ देर हाईवे पर गाड़ी चलायी थी।
आगरा में दीपावली की धूमधाम वैसी ही थी, जैसी हमेशा होती है। अपनी गाड़ी के कारण हम सभी जगह आराम से चले जाते थे। उस समय तक हमारे डॉक्टर भाईसाहब के अलावा रिश्तेदारों में केवल कलाकुुंज वाले ताऊजी तथा बस वाले भाईसाहब के पास ही अपनी कारें थीं। अब तो लगभग सभी रिश्तेदारों ने कारें खरीद ली हैं। अपनी कार से हम फतेहपुर सीकरी भी गये थे और उस यात्रा में हमारे साथ हमारे बड़े साढ़ू श्री हरिओम जी भी थे, जो दीपावली पर सूरत से आगरा आये थे।
फतेहपुर सीकरी मैं पहले भी दो बार जा चुका था। इस बार एक मजेदार बात हुई। सलीम चिश्ती की दरगाह के आसपास घूमते हुए एक गाइड, जो स्थानीय मुसलमान था, ने एक तहखाने की तरफ जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाकर कहा कि इस रास्ते से अकबर बादशाह लड़ने जाया करते थे। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ। मैंने पूछा कि इस तरह चुपके से क्यों जाते थे, मुख्य दरवाजे से जाने में क्या दिक्कत थी? गाइड के पास कोई जबाब नहीं था। मैंने फिर पूछा कि इस रास्ते से वे कैसे जाते थे- पैदल या पालकी में या हाथी-घोड़े पर या साइकिल से? मेरे कथन में छुपे व्यंग्य को वह गाइड समझ गया, लेकिन चुप रहा। दीपांक ने भी मुझे आगे बोलने से रोक दिया। वास्तव में अकबर वहाँ सलीम चिश्ती के परिवार की औरतों से मिलने चोरी-छुपे आया करता था। ऐसा श्री पी.एन. ओक की किताबों में लिखा हुआ है।
फतेहपुर सीकरी के बाहर पीछे की ओर खानवाह का मैदान है, जहाँ बाबर और राणा साँगा में युद्ध हुआ था। इसी युद्ध में जीतने के बाद ही बाबर आगरा पर अधिकार कर सका था। यह बात मुझे मालूम थी, लेकिन गाइड को इस बारे में कुछ मालूम नहीं था। उसे तो यह भी पता नहीं था कि यहाँ खानवाह नाम का कोई लड़ाई का मैदान भी है। वे बस काल्पनिक कहानियाँ सुना-सुनाकर यात्रियों को मूर्ख बनाया करते हैं।
दीपावली के बाद हम आगरा से पंचकूला कार से ही लौटे। लौटने में भी काफी थकान हुई, परन्तु किसी तरह पहुँच गये। वैसे हमारे ड्राइवर रवीन्द्र को आगरा पसन्द नहीं आया। वह इधर से यह सोचकर गया था कि जैसी गाड़ी आगरा ले जा रहा हूँ, वैसी ही वापस ले आऊँगा, लेकिन तमाम सावधानियों के बावजूद गाड़ी में खरोंचें लग ही गयीं। कारण कि आगरा में (और पूरे उत्तर भारत में) सड़क के नियमों का पालन कोई नहीं करता। जिसकी जब जहाँ मर्जी आती है, वहीं घुस पड़ता है। सड़क पर चलते हुए किसी भी गली से कोई भी दोपाया या चौपाया अचानक प्रकट हो सकता है, जिससे बचने में दुर्घटनायें हो सकती हैं। हमारे साथ कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई, यही सन्तोष की बात थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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