आत्मकथा भाग-3 अंश-48
शिमला भ्रमण
श्री विनोद कुमार चावला उस समय चंडीगढ़ मंडलीय कार्यालय के उप महाप्रबंधक थे। वे हमारे साथ कई वर्ष तक वाराणसी मंडलीय कार्यालय में और कुछ समय तक कानपुर मंडलीय कार्यालय में रह चुके थे। अतः वे मुझे अच्छी तरह जानते थे। एक बार जब वे हमारे संस्थान में आये हुए थे, तो उन्होंने गौड़ साहब से कहा कि शिमला शाखा का कम्प्यूटर इंस्पेक्शन करने के लिए उनके पास कोई कम्प्यूटर अधिकारी खाली नहीं है, अतः वे किसी कम्प्यूटर अधिकारी को वहाँ भेज दें। गौड़ साहब ने मेरा नाम बताया, तो वे खुश हो गये। मैं ऐसे निरीक्षण नियमित रूप से कानपुर मंडल की सभी शाखाओं में किया करता था। इसलिए इस कार्य के लिए शिमला जाने को फौरन तैयार हो गया। हमारे बैंक के लिए शिमला के एक होटल में दो कमरे सुरक्षित रहते थे। चावला जी ने उनमें से एक कमरा मेरे नाम दो दिन के लिए आरक्षित कर दिया।
मैंने शिमला भ्रमण का लाभ सपरिवार उठाने का निश्चय किया, क्योंकि होटल का कोई खर्च नहीं था। निर्धारित दिन हम सभी बस से पहले कालका पहुँचे, फिर वहाँ से दोपहर बाद शिमला। बैंक का कार्य मैंने पहले ही दिन निबटा दिया, जो मुश्किल से 2 घंटे का था। उस समय शिमला शाखा में मेरे मित्र श्री कमलदीप महाजन मुख्य प्रबंधक थे। वे भी लगभग 2 वर्ष तक हमारे साथ वाराणसी मंडलीय कार्यालय में रहे थे। बाद में मेरे सामने ही उनका स्थानांतरण किसी शाखा में हो गया था। वे विचारों से मेरी तरह ही घोर राष्ट्रवादी हैं।
उनकी विदाई में मैंने कहा था कि उनका नाम दो शब्दों से बना है- ‘कमल’ और ‘दीप’। इनमें कमल भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न है और दीपक उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ का चुनाव चिह्न था। इस प्रकार उनका नाम राष्ट्रवाद का जीवन्त प्रतीक है। मेरी इस बात पर सबने खूब ठहाके लगाये थे। अयोध्या का बाबरी ढाँचा गिरने पर जितनी प्रसन्नता मुझे हुई थी, उतनी ही महाजन जी को भी हुई थी। लेकिन तब तक वे वाराणसी मंडलीय कार्यालय से चले गये थे। उसके बाद लगभग 2 वर्ष बाद अचानक जब वे मुझसे मिले, तो पहली बात उन्होंने यही कही कि बाबरी ढाँचा तोड़ दिया।
शिमला में उनको देखकर मुझे प्रसन्नता हुई और उन्हें भी। शाम को रिज पर टहलते हुए पुनः भाभीजी के साथ उनके दर्शन हुए। इसके लगभग एक साल बाद वे पंचकूला शाखा में आ गये थे और मुझे कई बार मिले थे। वे पंचकूला के सेक्टर 20 में रहते थे।
शिमला में एक दिन हमने घूमने के लिए तय किया था। उस दिन हमने एक टैक्सी किराये पर ली और शिमला और आसपास के मुख्य-मुख्य स्थान देख आये, जैसे कुफरी, जाखू, नलदेहरा। कुफरी का बड़ा नाम सुना था, परन्तु देखकर बहुत निराशा हुई। वहाँ कुछ नहीं था, केवल घोड़ों की लीद जरूर चारों तरफ पड़ी हुई थी। घोड़े वाले ने हमें मूर्ख बनाकर एक हजार रुपये झटक लिये थे। वह कह रहा था कि वह स्थान यहाँ से 9 किमी दूर है, जबकि वास्तव में वह केवल डेढ़ किमी है। रास्ता भी साधारण था, हालांकि कीचड़ बहुत थी।
कुल मिलाकर शिमला हममें से किसी को पसन्द नहीं आया। पता नहीं लोग वहाँ क्या देखने जाते हैं। उसकी तुलना में हमारे नैनीताल और मसूरी बहुत अच्छे और साफ-सुथरे हैं।
कसौली
पिंजौर से थोड़ी दूर कालका से आगे सोलन जिले में कसौली नामक प्रसिद्ध पहाड़ी स्थान है। मेरी बहुत इच्छा थी वहाँ जाने की। बड़ी मुश्किल से एक बार वहाँ जाने का अवसर मिला। साथ में मेरी बहिन गीता और उसका पूरा परिवार भी था, जो एल.टी.सी. पर घूमने आये थे। हम दो गाड़ियों में वहाँ गये थे। सबसे पहले हम मंकी पाॅइंट गये। यह वहाँ का सबसे ऊँचा स्थान है। वहाँ हनुमान जी का मन्दिर भी है और बन्दर बहुत हैं। उस स्थान से कालका, पंचकूला और चंडीगढ़ तीनों शहर साफ दिखाई देते हैं। वहाँ की चढ़ाई थोड़ी कठिन है, परन्तु मेरे लिए कठिन नहीं थी। हम वहाँ के बाजार में ज्यादा नहीं घूम पाये, क्योंकि समय कम था। एक जगह सड़क के किनारे साफ स्थान देखकर और वहीं बहुत मीठे पानी का हैंडपम्प देखकर हमने खाना खाया था, जो हम घर से बनाकर लाये थे। फिर हम पिंजौर देखते हुए वापस आ गये।
पिंजौर गार्डन से कसौली का मंकी पाॅइंट साफ दिखाई देता है। मेरी इच्छा एक बार पिंजौर से कसौली तक पैदल यात्रा करने की थी, परन्तु साथी के अभाव में इसका मौका कभी नहीं आया।
रावण दहन
पंचकूला में हमारे मोहल्ले में एक अच्छी बात यह थी कि वर्ष में कई त्यौहार सामूहिक रूप से मनाये जाते थे। होली तो हर वर्ष ही सामूहिक होती थी और उस दिन खेल-कूद, तम्बोला, अन्त्याक्षरी आदि के साथ सामूहिक भोजन होता था, जिसके लिए हलवाई लगाया जाता था। प्रायः ऐसा ही दशहरा, दीपावली, नये साल आदि पर होता था। जिस वर्ष हम पहली बार पंचकूला आये, उस वर्ष दशहरे पर सामूहिक कार्यक्रम रखा गया था। बगल वाले डा. चड्ढा के पुत्र कुणाल और श्री पंकज सैनी के पुत्र अमोल ने मिलकर एक छोटा सा रावण बनाया था। इससे पहले मैंने कभी रावण बनते नहीं देखा था। उसको बनते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। उसकी सजावट में मैंने भी थोड़ा सा योगदान दिया था।
अगले वर्ष फिर दशहरा आया, तो मैंने और कुणाल ने मिलकर और भी बड़ा रावण बनाया। इसकी सजावट में हमारे एक रिश्तेदार के पुत्र लोकेश गर्ग (उर्फ लकी) का भी सहयोग मिला, जो बद्दी के पास नालागढ़ में विप्रो में एकाउंटेंट था। वह रविवारों तथा त्यौहारों पर हमारे यहाँ आ जाता था। यह रावण जब बनकर तैयार हो गया, तो सबको बहुत पसन्द आया। इसमें हमने काफी पटाखे रखे थे, जो देर तक फूटते रहे। सबने इसका खूब आनन्द लिया।
(पादटीप- चि. लोकेश गर्ग अब चार्टर्ड एकाउंटेंट है और अपने शहर आगरा में ही रहता है।)
इसके बाद पंचकूला में मुझे रावण बनाने का मौका नहीं मिला, क्योंकि सारे बच्चे अपनी-अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये और इस काम में उनकी रुचि खत्म हो गयी। बाद में मैंने आगरा में अपने साले के पुत्र सहज के साथ मिलकर दो बार रावण बनाया था। उसकी कहानी आगे लिखूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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