आत्मकथा भाग-3 अंश-47

शाखा का हाल
अगले दिन ही मैं अपने सेक्टर के उस पार्क में पहुँच गया, जो हमारे घर से केवल दो फर्लांग दूर था। मैंने देखा कि वहाँ शाखा का कोई चिह्न नहीं था, न कोई ध्वज और न कोई नेकरधारी। केवल एक किनारे पर तीन-चार लोग बैठे बातें कर रहे थे। मैंने उनके पास जाकर पूछा कि क्या यहाँ शाखा लग रही है? उन्होंने कहा- हाँ। मैंने कहा- ध्वज कहाँ है? तो उन्होंने एक ईंट की ओर इशारा करके कहा कि यही ध्वज है। मैंने पूछा- सुशील जी कौन हैं? तो उनमें से एक ने बताया कि मैं सुशील कुमार हूँ। मैंने संघ की पद्धति से ध्वज प्रणाम किया और फिर कार्यवाह को भी, जैसी कि परम्परा है। फिर सबसे परिचय हुआ। मेरी सुनने की कठिनाई जानकर वे सब दुःखी हुए, लेकिन मुझसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए।
फिर मैं नियमित शाखा जाने लगा। धीरे-धीरे पंचकूला के लगभग सभी स्वयंसेवकों से मेरा परिचय हो गया। एक शाखा पास के सेक्टर 11 में लगती थी, जो अधिक नियमित थी। वहाँ के कई स्वयंसेवकों से मेरी घनिष्टता हो गयी। हमारी शाखा के कार्यवाह सुशील जी एक ग्रामीण बैंक में अधिकारी थे। मुख्य शिक्षक थे श्री प्रह्लाद जी, जो बद्दी (हि.प्र.) में एक दवा कम्पनी में कार्य करते थे। वे रोज अपनी कम्पनी की बस से आते-जाते थे। इनके अलावा सर्वश्री सुरेन्द्र जी, मुनीश जी, धर्मपाल जी, सुखदेव जी कपूर, सत्य प्रकाश जी (लालाजी), विनोद जी आदि अनेक स्वयंसेवक उस शाखा में आते थे। हमारी शाखा नियमित लगती थी, क्योंकि मैं अवश्य आ जाता था। बाद में ध्वज लगाना भी प्रारम्भ कर दिया। पास में रैली गाँव था, जिसमें सुरेन्द्र जी और विनोद जी रहते थे।
लालाजी श्री सत्य प्रकाश अग्रवाल लगभग 75 वर्ष के थे। साधारण स्वास्थ्य, लेकिन बहुत सक्रिय थे। वे शाखा कार्य तो कम ही करते थे, लेकिन राम-नाम लिखी पुस्तिकाएँ बाँटने और एकत्र करने का कार्य पूरी निष्ठा से करते थे। उनके पुत्र किसी बैंक में मैनेजर थे। बाद में उनका स्थानांतरण हो जाने पर लालाजी भी उनके साथ पटियाला चले गये। वे मुझसे बहुत स्नेह करते थे।
हमारे जिला कार्यवाह थे श्री राम अवतार जी सिंघल। वे पेण्ट-हार्डवेयर आदि की दुकान करते थे। आर्थिक स्थिति बस ठीक थी, लेकिन बहुत ही निष्ठावान स्वयंसेवक थे। हर कार्यक्रम में समय से पहुँचकर व्यवस्था सँभाल लेते थे। वे भी मुझसे अत्यधिक स्नेह करते थे।
हमारी शाखा नियमित लग रही थी। लगभग 2 साल तक लगने के बाद सुशील जी ने पास में ही ढकौली गाँव में अपना मकान बना लिया, इसलिए वे शाखा में अनियमित हो गये। फिर मुनीश जी भी किसी दूसरे सेक्टर में चले गये। प्रह्लाद जी अपने कार्यालय जल्दी जाने लगे। फिर लालाजी भी चले गये। इस कारण शाखा अनियमित हो गयी। काफी दिनों तक केवल एक-दो लोग ही शाखा आते रहे। बाद में मैंने अपने संस्थान में योग सिखाना प्रारम्भ कर दिया, तो मैं भी शाखा नहीं जा पाता था, लेकिन संघ से मेरा सम्पर्क लगातार बना रहा। लगभग सभी प्रमुख कार्यक्रमों में मैं शामिल होता था और शहर से बाहर भी जाता था।
एक बार हमारा एकत्रीकरण पिंजौर के पास घग्घर नदी पर बने हुए पुल के नीचे एक द्वीप जैसे सूखे स्थान में हुआ था। कई बार वनविहार का कार्यक्रम भी हुआ था। इस घग्घर नदी को कुछ लोग गलती से पुरानी विलुप्त सरस्वती नदी समझते थे, परन्तु यह सिद्ध हो चुका है कि यह सरस्वती नहीं थी, बल्कि उसकी एक सहायक नदी थी। इस नदी में बरसात के कुछ ही महीने पानी रहता है। शेष दिनों में लगभग सूखी रहती है।
पिंजौर
पंचकूला से लगभग 14 किमी दूर कालका-शिमला के रास्ते पर एक पिंजौर नामक स्थान है। वहाँ एक बहुत सुन्दर बाग है, जो कहा जाता है कि कभी पटियाला के महाराजा ने बनवाया था। वास्तव में वे महाराजा साहब अंग्रेजों के चमचे थे। वे शिमला आते-जाते समय रास्ते में मौज-मस्ती के लिए पिंजौर में रुकते थे। वहीं उन्होंने अपने लिए वह बाग बनवाया था।
इसकी विशेषता यह है कि इसमें सीढ़ी जैसे सात तल हैं, ठीक वैसे ही जैसे मैसूर के वृन्दावन गार्डन में हैं। इन सभी तलों के बीच में से एक कृत्रिम नहर बहती है, जिसमें प्रायः फव्वारे भी चलते हैं। इस गार्डन में चारों ओर फलों के पेड़ हैं, जैसे अमरूद, नाशपाती, चीकू, आड़ू, आम, आलू बुखारा, सन्तरा, मौसमी आदि। परन्तु किसी को फल तोड़ने की अनुमति नहीं है। उन पर रात-दिन पहरा रहता है। वहाँ एक नर्सरी भी है, जहाँ हर तरह के पौधे मिलते हैं। वैसे तो फल भी बिकते हैं, परन्तु उनकी कीमत प्रायः बाजार से भी अधिक होती है।
पिंजौर गार्डन में प्रकाश की अच्छी व्यवस्था है। रात्रि को प्रकाश में गार्डन बहुत सुन्दर लगता है। हम प्रायः दिन में शाम के समय जाते थे और अंधेरा होने पर या उससे पहले ही लौट आते थे। इसका कारण यह था कि रात में पिंजौर से पंचकूला तक की सड़क बहुत खतरनाक हो जाती है। पहले उस सड़क पर बहुत दुर्घटनायें हुआ करती थीं। अब तो चार लेन का हाईवे बन गया है, इसलिए खतरा कम हो गया है, परन्तु पहले बहुत खतरा था। इसलिए हम अपनी कार से कम जाते थे, अधिकतर बस से जाते थे।
पहली बार मैं पिंजौर तब गया था, जब मैं अकेला ही संस्थान में रहता था। वास्तव में मेरे मित्र संघ प्रचारक श्री राजेन्द्र सक्सेना ने मुझसे कहा था कि उनके एक भांजे श्री अनिल कुमार सक्सेना पिंजौर के पास एच.एम.टी. की फैक्टरी में उच्चाधिकारी हैं और उनका फ्लैट भी वहीं है। वे चाहते थे कि मैं किसी दिन जाकर उनसे मिल लूँ। एक दिन रविवार को मैं बस से गया और एच.एम.टी. के पास उतरा। वहाँ से पूछते हुए अनिल जी के घर पहुँच गया। राजेन्द्र जी ने पहले ही उनको मेरे बारे में बता दिया था। वे बड़े स्नेह से मिले। दोपहर का भोजन भी उन्होंने कराया।
फिर मैंने पिंजौर गार्डन देखने की इच्छा व्यक्त की, तो वे स्वयं अपनी कार से मुझे ले गये और पूरा गार्डन दिखाया। उन्होंने ही बताया कि कुछ समय पहले तक इसमें चिड़ियाघर की तरह कुछ जानवर भी रखे जाते थे, लेकिन मेनका गाँधी ने सबको छुड़वा दिया। पिंजौर गार्डन मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर उन्होंने मुझे वहीं से एक टैक्सी में बैठाकर पंचकूला भेज दिया, क्योंकि अंधेरा हो गया था और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण वहाँ से रात के समय बस मिलना कठिन हो जाता है।
अनिल जी से बाद में भी दो-तीन बार मुलाकात हुई, परन्तु वे कभी हमारे निवास पर नहीं आ सके और न मैं सपरिवार उनके घर जा पाया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21