आत्मकथा भाग-3 अंश-45
कार चलाना सीखना
सबसे पहले मैंने और दीपांक ने अपने ड्राइवर रवीन्द्र सिंह से कार चलाना सीखा। आश्चर्य कि दीपांक मात्र एक सप्ताह में ही कार अच्छी तरह चलाने लग गया। मैंने भी लगभग 2 सप्ताह में काम चलाऊ कार चलाना सीख लिया। श्रीमतीजी कार चलाना पहले से जानती थीं, उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी था, लेकिन अभ्यास छूट गया था। शीघ्र ही उनको भी अभ्यास हो गया। इस प्रकार रवीन्द्र ने हम तीनों को कार चलाना सिखा दिया। मैं ऑफिस जाते समय प्रायः स्वयं कार चलाकर ले जाता था और उसी तरह वापस ले आता था। रवीन्द्र मेरे पास ही आगे वाली सीट पर बैठा रहता था और आवश्यक होने पर बताता था कि क्या करना है।
हमारा विचार पहले उसको केवल 2 महीने रखने का था, परन्तु आराम को देखते हुए हमने उसे 6 माह रखा। फिर हमें लगा कि उसको मिलने वाला वेतन बहुत कम है और हमारी सामर्थ्य इससे अधिक देने की नहीं थी, इसलिए हमने बगल में रहने वाले डा. चड्ढा के ऑफिस में उसको ड्राइवर लगवा दिया, जहाँ उसे 3500 रु. वेतन मिलता था। वहाँ उसने केवल दो माह काम किया। उसका वेतन और काम का समय सभी ठीक था। बाहरी नगरों में गाड़ी ले जाने पर भी उसे कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन डा. चड्ढा उसको मुर्गियाँ देकर इधर-उधर भेजते थे। यही बात उसको पसन्द नहीं थी। इस कारण केवल 2 माह बाद उसने डा. चड्ढा का काम छोड़ दिया। बाद में उसे किसी अन्य कम्पनी में कार या ट्रक चलाने का काम मिल गया।
बीच-बीच में हमारी उससे मुलाकात हो जाती थी। कई बार किसी दूसरे शहर में जाने की आवश्यकता होने पर हम उसे बुला लेते थे और अगर वह खाली होता था, तो मना नहीं करता था। वह बहुत अच्छा ड्राइवर था। एक बार हम उसके साथ अमृतसर भी घूमने गये थे। चंडीगढ़ और आस-पास के सारे स्थान हमने उसके साथ जाकर देख लिये थे। एक बार तो हम उसे लेकर आगरा भी गये थे।
चंडीगढ़ के बारे में
चंडीगढ़ संसार में अपनी तरह का एक ही शहर है। यह पंजाब और हरियाणा दो राज्यों की राजधानी तो है ही, स्वयं केन्द्र शासित क्षेत्र भी है। इस प्रकार यह दुनिया का शायद अकेला शहर है, जहाँ तीन-तीन राजधानियाँ हैं। यह बहुत ही अनुशासित तरीके से बसाया गया है। चौड़ी-चौड़ी साफ-सुथरी सड़कें, गन्दगी नाम को भी नहीं। दुकानें केवल निर्धारित स्थानों पर। सड़कों के किनारे बनी हुई पुराने जमाने की आरामदायक कोठियाँ, बड़ी-बड़ी दुकानें। कुल मिलाकर अच्छे शहरों में भी सबसे अच्छा शहर चंडीगढ़ कहा जा सकता है।
वहाँ देखने लायक मुख्य स्थान राॅक गार्डन है, जो एक कलाकार श्री नेकचन्द की मेहनत का परिणाम है। उन्होंने पहाड़ी जंगलों में सुनसान स्थान पर पत्थरों को तराश कर कलाकृतियों का रूप दिया था। इस कार्य में उन्होंने अपने 30 वर्ष लगा दिये थे। बाद में उसको पिकनिक जैसे स्थान का रूप दिया गया। पत्थरों और कबाड़ से बनायी गयी कलाकृतियाँ देखने लायक हैं। इसमें दो कृत्रिम झरने भी हैं। यह संसार में अपनी तरह का अकेला ही स्थान है। इसको देखने भारी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक आते हैं। सबसे पहले हम इसको देखने गये, तो देखकर आश्चर्यचकित रह गये थे। बाद में अनेक बार जाने का मौका मिला। कोई रिश्तेदार आता था, तो हम उसे राॅक गार्डन जरूर दिखाते थे। इसमें मात्र 10 रुपये की टिकट लगती है, जिससे इसकी सुरक्षा का खर्च भी शायद ही निकल पाता हो।
राॅक गार्डन से लगभग 1 किमी दूर सुखना लेक है। यह एक कृत्रिम झील है। पता चला कि पहले पहाड़ों से आने वाला बरसात का पानी शहर में घुस जाता था और तबाही मचाता था। इसलिए शहर की तरफ से बाँध बनाकर पानी को रोका गया है। इससे एक झील बन गयी है। झील के पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। इसमें पानी की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। इसमें पैडल बोट भी चलती हैं, जो मामूली किराये पर उपलब्ध हैं। आस-पास हरियाली भरे स्थान हैं और बाँध पर लगभग 2 किमी लम्बा टहलने का कच्चा रास्ता बना हुआ है। एक बार मैं और गौड़ साहब इस रास्ते पर टहलते हुए झील के दूसरे छोर पर पहुँच गये थे। फिर वहाँ एक घंटा बैठकर लौटे थे।
सुखना पर टहलना और बोटिंग करना हमें बहुत पसन्द था। जब मैं बोट चलाता था, तो काफी दूर तक ले जाता था, जहाँ तक ले जाने की अनुमति है। सुखना लेक पर नुक्कड़ नाटक, नृत्य, गीत आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते रहते हैं। वहाँ हर मौसम में लगभग रोज ही शाम को भारी भीड़ होती है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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