आत्मकथा भाग-3 अंश-44
शाखाओं की समस्याओं का समाधान
फोन काॅलों के साथ-साथ शाखाओं से समस्याओं के पत्र और डाटा भी आते थे। मेरा कार्य था- ऐसे सभी पत्रों को एक रजिस्टर में चढ़ाकर अधिकारियों को देना, ताकि वे समस्याएँ हल कर सकें। मैं किसी-किसी पत्र के साथ आने वाली सीडी को भी क्रम संख्या डालकर व्यवस्थित रखता था, ताकि किसी भी समय किसी भी शाखा की कोई भी सीडी तत्काल निकाली जा सके। मेरा यह कार्य अधिकारियों को बहुत पसन्द आया, क्योंकि उनका बहुत सा समय बच जाता था। रजिस्टर में प्रत्येक पत्र के साथ यह भी लिखा जाता था कि यह पत्र किस अधिकारी को दिया गया है और उसका समाधान या उत्तर किस तारीख को किया गया है। इससे मुझे पता चलता रहता था कि कितने पत्रों पर कार्यवाही हुई है और कितने अभी बाकी हैं। समय-समय पर मैं इस कार्य की समीक्षा करता था और जो पत्र बहुत दिनों से पड़े होते थे, प्रायः डाटा के इंतजार में, उनकी शाखाओं को पत्र लिखकर आवश्यक सूचना या डाटा मँगवाता था।
मेरी इस कार्यप्रणाली का परिणाम यह रहा कि कभी किसी शाखा को ऐसी शिकायत नहीं हुई कि उनके पत्रों पर कार्यवाही नहीं की जाती या उनकी समस्याएँ हल नहीं की जातीं। शाखाओं के जो लोग प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आते थे, वे हमारे इस कार्य से बहुत संतुष्ट नजर आते थे। हमने शाखाओं को अपने अधिकारियों के मोबाइल नम्बर भी दे रखे थे और वे कभी भी उनसे सलाह ले सकते थे। इस कार्य के लिए हमारा बैंक कम्प्यूटर अधिकारियों को मोबाइल खर्च के लिए एक हजार रुपये प्रति माह दिया करता था, जिससे सभी अधिकारी प्रसन्नतापूर्वक यह कार्य करते थे।
कार्य की मात्रा बढ़ने पर हमारे संस्थान में कुछ अन्य अधिकारी भी स्थानांतरित होकर आये। उनमें से कुछ के नाम लिख रहा हूँ- सर्वश्री अनिल नेमा, अबनीन्द्र कुमार, संजय कुमार, अनुराग सिंह और संजीव कुमार जिन्दल। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये सभी बहुत योग्य, मेहनती और अपने कार्य में कुशल हैं।
कार खरीदना
पंचकूला में हमारा सामान आ जाने के बाद हमारी गृहस्थी आराम से चलने लगी, परन्तु कहीं जाने की समस्या बनी रहती थी। इसका कारण यह था कि हमारे पास आने-जाने का कोई साधन नहीं था। दीपांक के पास एक साइकिल थी, जिससे वह कोचिंग चला जाता था और सिटी बस से अपने विद्यालय में चला जाता था, जो चंडीगढ़ के सेक्टर 27 में था। वाराणसी और कानपुर में रहते हुए हमें कभी साधन की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई, क्योंकि वहाँ रिक्शा, टैम्पो आदि की अच्छी सुविधा है। परन्तु एक तो पंचकूला में रिक्शा और टैम्पो आसानी से मिलते नहीं हैं और मिलते भी हैं, तो बहुत महँगे पड़ते हैं। इसलिए हमने कार खरीदने का निश्चय किया। काफी सोच-विचार के बाद हमने मारुति 800 एसी माॅडल लेना तय किया, क्योंकि इसकी कीमत सही थी और यह काफी लोकप्रिय भी थी। हमने मारुति अल्टो लेने का भी विचार किया था, परन्तु अन्त में मारुति 800 का ही निश्चय किया।
कार के लिए बैंक से 80 प्रतिशत तक लोन मिल जाता है। इसलिए मैंने कार लोन के लिए अपना प्रार्थनापत्र दे दिया। यह प्रार्थनापत्र हमारे सहायक महाप्रबंधक गौड़ साहब चाहते तो स्वयं स्वीकृत कर सकते थे, परन्तु पता नहीं क्यों वे अपने अधिकारों का प्रयोग करने में घबराते थे। इसलिए उन्होंने मेरा प्रार्थनापत्र मंडलीय कार्यालय, चंडीगढ़ भेज दिया। वहाँ से स्वीकृत होकर आने में 15-20 दिन लग गये। इस प्रकार जुलाई 2005 के मध्य में ही हम कार ले सके। कार लेने से हमें बहुत आराम हो गया। हमारी श्रीमती जी ने कानपुर में कार चलाना सीखा था और ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवाया था। वह यहाँ बहुत काम आया। पहले हमने एक ड्राइवर रखा, जो था तो अंसारी मुसलमान, लेकिन अपना नाम ‘राजेश’ बताता था। परन्तु एक सप्ताह के अन्दर ही एक ऐसी बात हो गयी कि हमने उसे हटा दिया। वह बात क्या थी, यह लिखना मैं उचित नहीं समझता।
ड्राइवर रवीन्द्र सिंह
फिर हमने एक रवीन्द्र सिंह नाम के ड्राइवर को रखा, जो मोना सिख था। वह पहले से मेरा परिचित था, क्योंकि जब मैं पंचकूला आया था, तो वह हमारे ही संस्थान में गार्ड का कार्य करता था। एक दिन किसी बात पर नाराज होकर गौड़ साहब ने उसको निकलवा दिया। तब से वह बेरोजगार था। वैसे वह बहुत ही अच्छा था। वह पास के एक गाँव में रहता था और वहाँ से बस में आता था। हम उसे केवल 2 हजार रुपये महीने ही दे पाते थे, परन्तु वह इसी में संतुष्ट रहता था। वह मेरे ऑफिस जाने के समय से पहले ही आ जाता था और मुझे ऑफिस लेकर जाता था। फिर शाम को मुझे ऑफिस से घर छोड़कर अपने गाँव जाता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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