आत्मकथा भाग-3 अंश-43
ऑफिस का हाल
अब जरा अपने कार्यालय की बात कर ली जाये। जैसा कि मैं बता चुका हूँ, वहाँ तब तक कोई काम नहीं होता था। गिने-चुने अधिकारी थे, जो बेकार बैठे रहते थे। लेकिन लगभग 4 महीने बेकार रहने के बाद हमें काम दिया गया। वास्तव में हमारे बैंक ने एक कम्पनी एच.के. इंडस्ट्रीज का साॅफ्टवेयर खरीदा था और उसका उपयोग स्वयं करना चाहते थे। इस साॅफ्टवेयर में हजारों कमियाँ अथवा छिद्र थे, जिन्हें तकनीकी भाषा में बग (Bug) कहा जाता है। हमारा कार्य था इस साॅफ्टवेयर को सीखकर उसमें से बगों को निकालना और उसको ठीक करके बैंक की हजारों शाखाओं में चलाना।
इस साॅफ्टवेयर की ट्रेनिंग देने के लिए उस कम्पनी के दो अधिकारी हमारे यहाँ आये। उन्होंने लगभग 2 माह में सारा साॅफ्टवेयर हमारे अधिकारियों को समझा दिया। फिर हमने उस साॅफ्टवेयर में बगों का पता लगाया। प्रारम्भ में ही हजारों बग खोजे गये और उनको ठीक करने का कार्य प्रारम्भ किया गया। प्रारम्भिक बगों को ठीक करके हमने उस साॅफ्टवेयर को एक-दो शाखाओं में चलाकर देखा। चलाने पर फिर बहुत से बगों का पता चला। फिर उनको ठीक किया गया। यह प्रक्रिया लगातार चलती रही। बग ठीक हुए हैं या नहीं, यह जाँच करने का काम कभी-कभी मैं भी करता था।
जैसे-जैसे हम साॅफ्टवेयर को ठीक कर रहे थे, वैसे-वैसे उसका उपयोग शाखाओं में होता जा रहा था। सबसे पहले तो हमने उसका उपयोग ऐसी शाखाओं में किया, जो अभी तक कम्प्यूटरीकृत नहीं थीं। ऐसी शाखाओं के कर्मचारियों और अधिकारियों को उस साॅफ्टवेयर पर कार्य करना सीखने के लिए बुलाया जाता था। लगभग एक सप्ताह में वे इतना सीख जाते थे कि शाखा में जाकर कार्य कर सकते थे। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम लगातार तब तक चलते रहे, जब तक उस साॅफ्टवेयर का उपयोग होता रहा।
हम प्रशिक्षण के साथ एक प्रकार का काॅल सेंटर भी चलाते थे। शाखाओं पर कार्य करने वाले अधिकारी और कर्मचारी कई बार कहीं-कहीं कठिनाई का अनुभव करते थे और अटक जाते थे। तब हम हम फोन पर उनको सलाह देते थे और अधिकांश मामलों में समस्या फोन पर ही हल कर देते थे। जब मामला अधिक गम्भीर होता था, तो हम उनसे उनकी शाखा का डाटा मँगाते थे और उसमें से गलती खोजकर समस्या हल करते थे।
नये अधिकारी
स्पष्ट है कि इतना सारा कार्य करने के लिए 5-6 अधिकारी बहुत कम थे। इसलिए धीरे-धीरे अधिकारियों की संख्या बढ़ाई गई। सबसे पहले प्रधान कार्यालय से दो अधिकारी आये- श्री नितिन राजुरकर और श्री विक्रम सिंह। दोनों ही बहुत ही योग्य थे। इनके आने के बाद साॅफ्टवेयर को सुधारने का कार्य तेजी से होने लगा।
इनके कुछ समय बाद आई एक बहुत प्यारी बच्ची, जिसका नाम है रुचिका। हँसमुख चेहरा, हल्का साँवला रंग, भरा-भरा बदन, लेकिन मोटी बिल्कुल नहीं। वह बहुत योग्य भी है। बैंक में उसकी नयी नौकरी थी। आते ही उसने सारा काम सीख लिया और साॅफ्टवेयर सुधारने के कार्य में सहायता करने लगी। उसका इससे भी बड़ा कार्य था शाखाओं से आने वाले फोन उठाना और उनकी समस्याएँ हल करना। प्रारम्भ में यह कार्य वह और प्रीति सैनी ही किया करती थीं। एक मोटा रजिस्टर इस काम के लिए रखा गया था कि शाखाओं से आने वाली समस्याओं और उनके समाधानों को नोट किया जाये, ताकि आगे के सन्दर्भ के लिए रिकाॅर्ड रहे। वह रजिस्टर ज्यादातर रुचिका की लिखावट से भर गया था।
उस समय ऐसी प्रवृत्ति बन गयी थी कि शाखाओं से आने वाले फोन केवल ये दो महिलायें ही उठाती थीं और बाकी अधिकारी इस काम में रुचि नहीं लेते थे। यह देखकर मैंने फोन उठाने के कार्य की ड्यूटी लगा दी। सबको सप्ताह में बराबर समय तक फोन के पास रहना पड़ता था। एक समय में दो अधिकारियों की ड्यूटी होती थी और एक तीसरा अधिकारी स्टेंडबाई रहता था, ताकि यदि पहले दो में से कोई छुट्टी पर हो, तो वह कार्य सँभाल ले। प्रारम्भ में कुछ अधिकारियों ने ऐसी ड्यूटी लगाने पर बहुत आपत्ति की, लेकिन मेरी दृढ़ता के सामने सब चुप हो गये।
ड्यूटी लगाने से महिलाओं को सबसे अधिक प्रसन्नता हुई, क्योंकि अब उन्हें रोज लगातार फोन नहीं उठाने पड़ते थे। ड्यूटी चार्ट को मैं समय-समय पर बदलता रहता था। विशेषतः कोई नया अधिकारी आने पर उसकी भी ड्यूटी लगाई जाती थी। प्रारम्भ में ड्यूटी केवल एक शिफ्ट में लगती थी, लेकिन शाखाओं के काॅल रात 8 बजे तक आते रहते थे। इसलिए कुछ समय बाद ही दो शिफ्टों में ड्यूटी लगायी जाने लगी। पहली शिफ्ट प्रातः 10 बजे से 3 बजे तक और दूसरी शिफ्ट सायं 3 बजे से 8 बजे तक। सायं की शिफ्ट वालों को दोपहर 1 बजे आने की अनुमति दी गयी थी।
ड्यूटी चार्ट बनाते समय मैं इस बात का ध्यान रखता था कि सबको बराबर कार्य मिले और किसी को असुविधा न हो। विशेषतः महिलाओं को दूसरी शिफ्ट में नहीं रोका जाता था, क्योंकि मैं किसी भी हालत में महिलाओं को सायं 6 बजे के बाद रोकने के पक्ष में नहीं हूँ। इस प्रकार मैं जो ड्यूटी चार्ट बनाता था, उससे लगभग सभी अधिकारी संतुष्ट रहते थे। आवश्यक होने पर वे पूर्व सूचना देकर अपनी ड्यूटी आपस में बदल भी सकते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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