आत्मकथा भाग-3 अंश-42

गीतांजलि
सामने वाली लाइन में हमारे घर के ठीक सामने कोने वाले घर में एक चौहान परिवार किराये पर रहता था। वे बागपत के रहने वाले हैं। उनके पुत्र श्री अरविन्द चौहान नेटवर्क इंजीनियर हैं और किसी कम्पनी में अच्छे पैकेज पर कार्य करते हैं। अरविन्द जी की पत्नी श्रीमती गीतांजलि भी बहुत योग्य और हँसमुख हैं। कुछ ही महीनों में उनकी हमारी श्रीमतीजी से इतनी घनिष्टता हो गयी थी, जितनी उनकी किसी और परिवार या पड़ोसी से नहीं थी। बाद में जब उन्होंने अपना घर सेक्टर 16 में खरीदा, तो उसके गृहप्रवेश में उन्होंने पूरे मोहल्ले से केवल हमें बुलाया था। उनके नये घर में भी हम बहुत बार गये थे। गीतांजलि का स्वभाव बहुत ही अच्छा है। वह हमारी काफी सहायता भी करती थी। कई बार वह मुझे हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन तक भी लेने या छोड़ने गयी थी। एक बार जब मेरे मँझले साढ़ू श्री सुनील कुमार अग्रवाल सपरिवार चंडीगढ़ घूमने आये थे, तो गीतांजलि ने हमारी कार से उनको पूरा शहर दिखा दिया था। कारण यह है कि हमारी श्रीमतीजी कार चलाने में डरती हैं, जबकि गीतांजलि इसमें सिद्धहस्त हैं।
उनके दो पुत्र हैं, जो दोनों अपने माता-पिता की तरह ही योग्य और सुन्दर हैं। उनका छोटा पुत्र लावण्य, जिसको लव कहते हैं, बहुत ही चंचल है। एक बार हमारे घर पर खेलते हुए उनका बड़ा पुत्र पुरुषार्थ, जिसे पुरु कहते हैं, पलंग से नीचे गिर गया। वह शर्माकर जमीन पर ही बैठा हुआ था। तभी उसका छोटा भाई लव तुतलाते हुए बोला- ”अबे याऽऽल! अब उथ जा। नीचे ही बैथा रहेगा?“ उस समय वहाँ कई औरतें आई हुई थीं, उनको यह सुनकर बहुत मजा आया।
बीच में अरविन्द जी ने जाॅब बदल दिया और गुड़गाँव में एक अन्य कम्पनी में कार्य शुरू किया। परन्तु एक-डेढ़ साल बाद ही उनको फिर चंडीगढ़ में ही अच्छा जाॅब मिल गया। अब वे चंडीगढ़ में ही हैं। हमारा उनसे सम्पर्क लगातार बना हुआ है। जब हम पंचकूला छोड़कर आ रहे थे, तो उन्होंने एक अच्छे होटल में हमें पार्टी भी दी थी। गीतांजलि आजकल किसी विद्यालय में अध्यापिका हैं। इससे उनका समय अच्छा कट जाता है। वे सभी मेरी तो बहुत ही इज्जत करते हैं। पंचकूला छोड़ने पर हमें सबसे अधिक दुःख गीतांजलि से दूर जाने का हुआ था।
(पादटीप- श्रीमती गीतांजलि ने अब पंचकूला में ही सेक्टर 10 में अच्छा मकान खरीद लिया है और वहीं रहती हैं, परन्तु संयोग से अभी तक हमें दोबारा उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला है।)
मित्तल भाईसाहब
उसी मोहल्ले में एक अन्य परिवार से हमारी अति घनिष्टता हो गयी थी। वे हैं श्री मोहिन्दर मित्तल, जो ट्रांसपोर्ट का कार्य करते हैं। उनकी पत्नी श्रीमती निशा बहुत स्नेही हैं। वे मुझे तो सगे देवर से भी अधिक प्यार और सम्मान देती हैं। उनके एक पुत्री कु. अंकू है, जो दीपांक के विद्यालय में ही हायर सेकंडरी में पढ़ रही थी। बाद में उसने एक अन्य कालेज से बी.टेक. किया। उसका सलेक्शन इन्फोसिस में हो गया था, परन्तु पोस्टिंग भुवनेश्वर में मिली, इसलिए वह नहीं गयी। अब वह एम.बी.ए. कर रही है। मित्तल भाईसाहब के एक पुत्र भी है चि. चक्षु, जो चंडीगढ़ में ही इंजीनियरिंग कर रहा है। वह भी बहुत योग्य है।
इस परिवार से हमारे सम्बंध बहुत ही घनिष्ट थे। जब कभी वे बाहर जाते थे, तो पूरा घर हमारे भरोसे छोड़ जाते थे। मैं रात में वहीं सो जाता था। उनके साथ कई बार हम शहर के आसपास घूमने गये थे, जैसे मंसादेवी मंदिर, शिव मन्दिर, गौशाला आदि।
पंकज सैनी
श्री पंकज सैनी, जिन्होंने हमें मकान किराये पर उठाया था, सामने वाली लाइन में ही दो घर छोड़कर रहते हैं। वे प्रिंटर वगैरह ठीक करने का कार्य करते हैं और ठीक-ठाक कमा लेते हैं। प्रारम्भ में उनका ऑफिस चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में था, जो किराये का था। बाद में दुकान के मालिक ने कुछ मुआवजा देकर वह ऑफिस खाली करा लिया। उस मुआवजे से पंकज जी ने पंचकूला के मंसा देवी काॅम्प्लैक्स में एक दुकान किराये पर ले ली और वहाँ ऑफिस खोल लिया। कुछ समय बाद वह भी अच्छी प्रकार चलने लगा।
पंकज जी के एक पुत्री और एक पुत्र है। पुत्री अमृता काफी सुन्दर है, हालांकि चश्मा लगाती है। पढ़ने में वह उतनी योग्य नहीं है, फिर भी ठीक है। मैं पढ़ाई में उसकी सहायता करता रहता था। अब वह बी.काॅम. कर रही है। पंकज जी का पुत्र अमोल भी पढ़ने में ऐसा ही है, लेकिन वैसे बहुत होशियार है। वह कम्प्यूटर हार्डवेयर का अच्छा जानकार है और इसी को अपना कैरियर बनाने वाला है। इससे वह अपने पिता की दुकान भी सँभाल लेगा।
पंकज जी के पिताजी पंजाब विश्वविद्यालय में एकाउंटेंट पद से रिटायर्ड हैं। उनको पंकज जी ”डैडी“ कहते हैं, इसलिए हम सब भी उनको ‘डैडी’ ही कहा करते थे। पंकज जी से हमारे सम्बंध काफी घनिष्ट थे। वे अमोल के कैरियर के बारे में मुझसे सलाह लेते थे। एक बार अमोल गलत रास्ते पर चलने लगा था, तो मेरे समझाने पर सही रास्ते पर आ गया था।
(पादटीप- हमारे पंचकूला छोड़ने के कुछ माह बाद ही डैडी जी का देहान्त हो गया था। पंकज जी के बच्चों का विवाह हो चुका है और अमोल व्यापार सँभाल रहा है।)
इन परिवारों के अलावा कई अन्य परिवारों से भी हमारी घनिष्टता थी, जैसे सामने वाले बाबूजी का परिवार, उनके ऊपर किराये पर रहने वाली नीरा छाबड़िया भाभीजी का परिवार, दो-तीन घर छोड़कर पूनम गोयल भाभीजी का परिवार और पंकज जी के पास वाले घर में बरनाला वाले श्री काकरिया भाईसाहब का परिवार। ये सभी हमसे बहुत स्नेह करते थे।
इनके अलावा भी कई परिवारों से हमारे अच्छे सम्बंध थे। यहाँ उन सबका उल्लेख करना सम्भव नहीं है। वास्तव में वहाँ एक किटी पार्टी चलती थी। हमारी श्रीमती जी को आग्रहपूर्वक उसका सदस्य बनाया गया था और हर माह पार्टियाँ हुआ करती थीं। इसी कारण लगभग एक दर्जन परिवारों से हमारी श्रीमतीजी की घनिष्टता हो गयी थी।
यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि पंचकूला में लगभग सभी लोग अच्छा कमाने-खाने वाले हैं। अधिकांश लोग अपने ही मकानों में रहते हैं, जिनकी कीमत करोड़ों में है। कई परिवारों के पास तो इतना पैसा है कि वे नहीं जानते कि उसका क्या करें। इसलिए प्राॅपर्टी पर प्राॅपटी खरीदते रहते हैं। इनमें से अधिकांश व्यापारी हैं और अपनी आय कम बताते हैं, इसलिए बहुत कम टैक्स देते हैं। टैक्स से बचाया हुआ पैसा उनके पास एकत्र होता जाता है। दूसरी ओर नौकरी करने वाले लोगों की एक-एक पाई पर टैक्स लग जाता है। इससे वे अधिक बचत नहीं कर पाते।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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