आत्मकथा भाग-3 अंश-41
मोना का प्रवेश
मैंने मोना का प्रवेश एक सरकारी विद्यालय में कराने की सोची थी, जो सेक्टर 15 में था। परन्तु श्रीमती जी को वह विद्यालय पसन्द नहीं आया। इसलिए कुछ मित्रों की सलाह पर सेक्टर 15 में ही न्यू इंडिया हायर सेंकडरी गर्ल्स स्कूल में उसका प्रवेश कराने का निश्चय किया। वहाँ की प्रधानाचार्या ने प्रवेश से पहले उसका छोटा सा लिखित टैस्ट लिया और उसमें अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने पर सहर्ष प्रवेश देने को तैयार हो गयीं। हमने उनसे कहा कि हम जून के प्रथम सप्ताह में ही आ पायेंगे, क्योंकि उसकी परीक्षा अप्रेल में समाप्त होंगी और परिणाम मई में आयेगा। वे मान गयीं और हमने फीस जमा कर दी। दीपांक के प्रवेश की औपचारिकता भी तभी पूरी हो गयी और कोचिंग में भी उसको प्रवेश मिल गया। कोचिंग की फीस बहुत अधिक थी, परन्तु आवश्यक होने के कारण मैंने जमा कर दी।
दोनों बच्चों के प्रवेश की समस्या हल हो जाने पर हमें बहुत सन्तोष हुआ। अब चिन्ता केवल मकान देखने की थी। हमने एक-दो मकान देखे भी, पर हमें पसन्द नहीं आये। इसलिए यह विचार बना कि अभी दीपांक मेरे साथ ही रहेगा और मोना तथा श्रीमती जी कानपुर लौट जायेंगी। गौड़ साहब ने मुझसे कहा कि दीपांक को साथ लेकर हमारे पास रहो। वे उस समय अकेले ही थे, क्योंकि उनका परिवार लखनऊ में रहता था। इसलिए श्रीमती जी के जाने के बाद ही मैं उनके फ्लैट में चला गया और दीपांक भी अपनी कक्षाओं में जाने लगा। नाश्ता मैं सबका बना लेता था और दोपहर तथा रात के खाने के टिफिन लगा रखे थे। इसलिए कोई कष्ट नहीं था।
मकान देखना
यों तो हम गौड़ साहब के घर में आनन्द से रह रहे थे, लेकिन मकान की समस्या हल करनी ही थी। हम लगातार मकान देख रहे थे। मैं ऐसा मकान चाहता था, जो संस्थान के निकट हो और किराया भी उचित हो। सौभाग्य से हमें सेक्टर 12-ए, पंचकूला में एक मकान मिल गया। उसका किराया बताया गया 5000, जो उस समय के हिसाब से काफी अधिक था, मैं 4500 से अधिक देना नहीं चाहता था। कुछ बातचीत के बाद वे 4700 में मकान देने को तैयार हो गये। बैंक इनमें से केवल 3600 रुपये देता, शेष मुझे भरना था। परन्तु मकान अच्छा था और पूरी तरह स्वतंत्र था, इसलिए मुझे और दीपांक को पसन्द आ गया।
सबसे बड़ी बात यह थी कि यह मकान मेरे संस्थान से ठीक एक किलोमीटर दूर था, इसलिए मेरे लिए पैदल आने-जाने की भी सुविधा थी। मकान के मालिक एन.आर.आई. थे और कनाडा के नागरिक थे और साल में 6 माह वहीं रहते थे। मकान में एक कमरा उन्होंने अपने लिए अलग कर रखा था। जब भारत आते थे, तो उसी में रहते थे। मकान की सुरक्षा व्यवस्था भी ठीक थी। मकान मालिक की अनुपस्थिति में मकान की देखभाल उनके एक पड़ोसी श्री पंकज सैनी किया करते थे। उन्होंने ही मकान हमको किराये पर उठाया था।
मोना के साथ श्रीमती जी कानपुर लौट गयी थीं। दीपांक की कोचिंग प्रारम्भ हो गयी थी, इसलिए दीपांक और मैं अपने नये मकान में रहने लगे। हमारे पास आवश्यक कपड़े तो थे, कुछ चादर भी थे। पंखे और ट्यूब लाइट वहाँ लगा हुए थे। श्री पंकज सैनी की कृपा से हमें एक तख्त और एक फोल्डिंग पलंग भी मिल गया। इस प्रकार हम दोनों आराम से वहाँ रहने लगे। खाने के लिए हमने टिफिन लगा रखा था। दीपांक के पास कोई साधन नहीं था, इसलिए प्रारम्भ में वह पैदल ही कोचिंग जाता था, जो वहाँ से लगभग डेढ़ किमी दूर थी। उसका विद्यालय अभी खुला नहीं था, इसलिए उसकी चिन्ता नहीं थी।
परिवार का आगमन
लगभग एक माह बाद मई समाप्त होने से पहले ही मैं कानपुर जाकर अपने परिवार को ले आया। तब तक मोना की भी परीक्षा हो चुकी थी और उसका परिणाम भी आ गया था। ट्रांसपोर्ट से सारा सामान भी सुरक्षित आ गया। आगरा से श्रीमतीजी के भाई श्री आलोक कुमार भी आ गये थे, हालांकि मैं उनको परेशान नहीं करना चाहता था। श्रीमतीजी के आ जाने के बाद हमारा निवास कुछ व्यवस्थित हुआ।
यहाँ अपने कुछ पड़ोसियों का परिचय देना अच्छा रहेगा, जिनसे आगे चलकर हमारे बहुत अच्छे सम्बंध बन गये थे।
हमारी बायीं ओर वाले मकान में डा. एस.के. चड्ढा रहते थे। वे पशु-पक्षियों के डाक्टर थे और मुर्गियों का इलाज विशेष तौर पर करते थे। उनकी अच्छी आर्थिक हैसियत थी। उनकी पुत्री लहर चड्ढा, जिसे हम सब गुड़िया कहते हैं, बहुत सुन्दर और योग्य है। उसने नैनोटैक्नोलाॅजी में एम.एससी. किया है। बाद में उसका विवाह सोनीपत के एक इंजीनियर से हुआ, जिसमें हम सभी सम्मिलित हुए थे। डा. चड्ढा का एक लड़का कुणाल है। वह दीपांक की क्लास में ही था, किसी दूसरे कालेज से इंजीनियरिंग कर रहा था। अब वह इन्फोसिस में है। चड्ढा परिवार से हमारे बहुत अच्छे सम्बंध थे। चड्ढा भाभीजी हमारी श्रीमतीजी पर बहुत विश्वास करती थीं और हर मामले में उनकी सलाह लेती थीं।
डा. चड्ढा के मकान में प्रथम फ्लोर पर एक किरायेदार परिवार रहता था, जिसमें केवल पति-पत्नी थे। पत्नी का नाम रूबी जिन्दल था। वह भी बहुत सुन्दर और हँसमुख थी। उससे भी हमारी काफी घनिष्टता थी। बाद में डा. चड्ढा ने उनसे मकान खाली करा लिया था और वे सेक्टर 21 में रहने चले गये थे। उसके बाद विशेष मौकों पर ही उनसे मुलाकात होती थी।
हमारी दायीं ओर का बगल वाला मकान अधूरा और खाली था। 2 साल बाद उसमें एक अग्रवाल परिवार रहने आ गया। उनकी श्रीमतीजी नरेश लता बहुत अच्छे स्वभाव की थीं। उनसे हमारे बहुत घरेलू सम्बंध हो गये थे। बाद में हमारे पंचकूला छोड़ने से पहले ही वे किसी और घर में चले गये थे। लेकिन अब वे फिर उसी घर में रहते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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