आत्मकथा भाग-3 अंश-39
पंचकूला में
पंचकूला में मेरे प्रयास करने पर कई संदर्भ मिल गये। एक तो श्री गुलशन कपूर, जो मेरे साथ कानपुर मंडलीय कार्यालय में काफी समय रहे थे, चंडीगढ़ स्थानांतरित हो गये थे और उनका अपना मकान पंचकूला में है। उनसे बात करने पर उन्होंने मुझे पहले अपने ही पास आने की सलाह दी और कहा कि सारी व्यवस्था हो जायेगी।
दूसरे श्री इंद्रम नंदराजोग भी उस समय चंडीगढ़ मंडलीय कार्यालय में आ गये थे। वे भी कानपुर में मेरे साथ मंडलीय कार्यालय में रहे थे और उनका भी फ्लैट पंचकूला में है।
तीसरे श्री एस.एल. लूथरा उस समय चंडीगढ़ मंडल की किसी शाखा में थे और उनका अपना मकान खरड़ नामक कस्बे में है, जो चंडीगढ़ से केवल आधा घंटे के रास्ते पर है।
चौथे श्री गया प्रसाद गौड़ हमारे सहायक महाप्रबंधक थे ही।
इन सबसे अलावा एक संदर्भ मेरे भतीजे डा. मुकेश चन्द ने दिया था, जो एक सरदार परिवार का था। उनकी पुत्री ने मुकेश के किसी चचेरे साले से प्रेम विवाह किया था। मुकेश ने उनसे बात की, तो उन्होंने मुझे पहले अपने पास ही भेजने को कहा और वायदा किया कि मुझे कोई कष्ट नहीं होने दिया जाएगा, परन्तु मैं उनकी इस उदारता का कोई लाभ नहीं उठा सका।
मैं कालका मेल से चंडीगढ़ पहुँचा, जो प्रातः 4 बजे पहुँचती है। मैंने उस समय स्टेशन से बाहर निकलना उचित नहीं समझा और 2 घंटे प्लेटफार्म पर ही बैठा रहा। प्रातः 6 बजे मैं स्टेशन से पंचकूला की तरफ बाहर निकला। यहाँ यह बता दूँ कि चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन के एक ओर चंडीगढ़ शहर है और दूसरी ओर पंचकूला है। स्टेशन और पंचकूला के बीच में लगभग 1 कि.मी. चौड़ा क्षेत्र है जो चंडीगढ़ या पंजाब में पड़ता है। मैं रिक्शा करके पंचकूला की ओर चला। जैसे ही रिक्शा पंचकूला की सीमा में पहुँचा, तो मैं देखकर आश्चर्यचकित रह गया। लगा कि जैसे किसी और ही दुनिया में आ गया हूँ। चौड़ी-चौड़ी खूबसूरत सड़कें, साफ-सुथरे फुटपाथ, किनारों पर तरतीब से बने हुए सुन्दर मकान, निर्धारित स्थानों पर बाजार, सड़कों के किनारे कोई दुकान भी नहीं। आवारा घूमते सूअर और जानवर भी नहीं। पहली नजर में ही मुझे पंचकूला से प्यार हो गया।
केवल 20 मिनट में मैं थोड़ा खोजने के बाद श्री गुलशन कपूर के मकान पर पहुँच गया, जो सेक्टर 4 में है। वे उस समय सोये हुए थे। मुझे देखकर वे प्रसन्न हुए। उनके मकान में ऊपर एक कमरा खाली था, मेरे ठहरने की व्यवस्था उन्होंने वहाँ कर दी।
कार्यालय का हालचाल
ठीक 10 बजे तैयार होकर और जलपान करके गुलशन जी के साथ ही मैं अपने नये कार्यालय में गया। यह था इलाहाबाद बैंक का ‘अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान’ जिसे बोलचाल में आई.आर.टी. कहते हैं। यह सेक्टर 14 में अमरटैक्स चौराहे के निकट स्थित है। उस समय गौड़ साहब वहाँ नहीं थे, क्योंकि वे सपरिवार दक्षिण भारत घूमने गये हुए थे। मेरे साथ एक अन्य अधिकारी ने भी उस संस्थान में पहली बार अपनी उपस्थिति दी थी। वे थीं जयपुर की श्रीमती प्रीति सैनी। उनसे मेरा मामूली परिचय था। एक बार जब मैं कम्प्यूटर अधिकारियों के सम्मेलन में भाग लेने लखनऊ आया था, तब वे भी उसी सम्मेलन में आयी थीं। तभी उनसे परिचय हुआ था। पंचकूला में उनको देखकर मैं नहीं पहचान पाया, लेकिन उन्होंने मुझे तुरन्त पहचान लिया। वे अपने पति श्री सुनील कुमार के साथ आयी थीं। उनसे भी मेरा परिचय कराया गया।
गौड़ साहब के अलावा वहाँ तीन अधिकारी और थे। एक श्री विजय सिंह (प्रबन्धक), दूसरे श्री महेश्वर सिंघा (प्रबंधक) और तीसरे श्री कनिष्क बाजपेयी (अधिकारी)। इनके अलावा कोई नहीं था, चपरासी भी नहीं। तीन प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड अवश्य थे, जो 8-8 घंटे की ड्यूटी करते थे। इस प्रकार 24 घंटे वहाँ सुरक्षा रहती थी। प्रायः सुरक्षा गार्डों से ही चपरासी का कार्य लिया जाता था।
उस दिन वहाँ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा था, जो उस संस्थान में पहली बार हो रहा था। उसमें लगभग 40 लोग शामिल हुए थे। वहीं हमारे तत्कालीन उप महाप्रबंधक (आईटी) श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव भी आये थे। उनसे मेरा अच्छा परिचय था। वास्तव में उन्होंने ही मेरी पोस्टिंग पंचकूला में की थी। मुझे वहाँ आया जानकर वे प्रसन्न हुए।
वहाँ से गुलशन जी का घर हालांकि केवल दो किमी दूर था, लेकिन नया स्थान होने के कारण मेरे लिए आने-जाने की समस्या थी। सीधे टैम्पो वहाँ नहीं जाते और रिक्शे बहुत मँहगे थे। इसलिए मैंने यही उचित समझा कि जब तक अपने निवास की कहीं और व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक मैं संस्थान में ही किसी कमरे में रुक जाऊँ। उस समय हालांकि सारे कमरे भरे हुए थे, लेकिन एक कमरे में एक सीट खाली थी। उसमें दूसरी सीट पर श्री रवि भूषण, मुख्य प्रबंधक (आईटी) रह रहे थे। मैंने उनके साथ ही अपनी व्यवस्था कर ली और अपना सामान ले आया। वहाँ उस सप्ताह प्रशिक्षण कार्यक्रम चलने के कारण एक केटरर लगा हुआ था, इसलिए खाने-पीने की भी कोई समस्या नहीं थी। अगले सप्ताह से मैंने अपने लिए टिफिन लगा लिया, जो दो बार आ जाता था। उसमें अच्छा घर जैसा खाना उचित दामों में मिल जाता था, अतः मैं आराम से था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें