आत्मकथा भाग-3 अंश-38

मोना की पढ़ाई
हमारी पुत्री आस्था ने कौशलपुरी के सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर से कक्षा 5 पास कर लिया था। उससे आगे ही पढ़ाई वहाँ अच्छी नहीं होती थी, इसलिए हमने बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन में ही उसका कक्षा 6 में प्रवेश कराना तय किया, जहाँ उसका भाई दीपांक पहले से पढ़ रहा था। उसका प्रवेश भी प्रवेश परीक्षा के आधार पर आसानी से हो गया। वहाँ पढ़ाई अच्छी होती थी, लेकिन वह केवल एक साल ही उसमें पढ़ सकी, क्योंकि इससे पहले ही मेरा स्थानांतरण कानपुर से पंचकूला हो गया था।
पुनः मकान बदलना
बुढ़िया के मकान को छोड़ने का मन बना लेने पर मैंने मकान देखना प्रारम्भ किया। एक स्वयंसेवक ने हमें एक मकान बताया, जो नेहरू नगर में कमला नेहरू पार्क के बिल्कुल सामने मुख्य सड़क पर था। उसमें आगे के भाग में सड़क की ओर नीचे दुकानें थीं और ऊपर हमारा फ्लैट था। पीछे के भाग में मकान मालिक श्री उमा नाथ अवस्थी रहते थे। उनको सब सम्मान से ‘पापाजी’ कहते थे। पापाजी रिटायर्ड शिक्षक थे और पहले रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) पढ़ाया करते थे। उनका और उनकी पत्नी ‘मम्मीजी’ का स्वभाव इतना अच्छा था कि शब्दों में नहीं बताया जा सकता। नवम्बर 2004 में जिस दिन हम उनके यहाँ सामान लेकर आये थे, उस दिन हमारा दोपहर का भोजन उन्होंने अपने आप ही बना दिया था और हमें आग्रहपूर्वक खिलाया था।
उनके एक विवाहित पुत्र भी हैं, जो कानपुर में ही सर्वोदय नगर में अलग घर में रहते हैं। वे अपनी पत्नी श्रीमती रीता के साथ कभी-कभी वहाँ आया करते थे और हमारी भेंट हो जाती थी। पापाजी के कई पुत्रियाँ भी हैं, जो सभी विवाहित हैं और दूर-दूर के शहरों में रहती हैं। उस घर में हम आनन्द से रह रहे थे। कोई कष्ट नहीं था। पापाजी और मम्मीजी हमें इतना प्यार और सम्मान देते थे कि शब्दों में नहीं बताया जा सकता। वहाँ से मेरा ऑफिस थोड़ा दूर पड़ता था, इसलिए ज्यादातर रिक्शे पर जाता था। परन्तु वहाँ हम केवल 6 माह ही रह सके, क्योंकि मार्च में ही मेरा स्थानांतरण पंचकूला को हो गया।
पंचकूला स्थानांतरण
अपने स्थानांतरण का आदेश आने से पहले मैंने पंचकूला का नाम भी नहीं सुना था और इस बात का कुछ पता नहीं था कि यह शहर कैसा और कहाँ पर है। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि यह शहर यों तो हरियाणा में है, लेकिन चंडीगढ़ से सटा हुआ है। व्यावहारिक दृष्टि से पंचकूला चंडीगढ़ का ही एक मौहल्ला माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे शुक्लागंज (जिला उन्नाव) को कानपुर का एक मोहल्ला मानते है। वहाँ हमारे बैंक ने एक प्रशिक्षण संस्थान खोला था, जो उस समय तक ठीक से प्रारम्भ नहीं हुआ था। केवल एक सहायक महाप्रबंधक और दो-तीन अधिकारी वहाँ लगाये गये थे, जिनका कार्य था संस्थान को प्रारम्भ करना। वहाँ के सहायक महाप्रबंधक थे श्री गया प्रसाद गौड़, जिन्होंने मेरे साथ ही लखनऊ में इलाहाबाद बैंक में सेवा प्रारम्भ की थी। कालांतर में वे सहायक महाप्रबंधक हो गये थे और मैं केवल वरिष्ठ प्रबंधक के पद तक पहुँच पाया था।
जिस समय मेरा स्थानांतरण आदेश आया, उस समय कानुपर मंडलीय कार्यालय में मेरे कम्प्यूटर केन्द्र में मेरे साथ केवल श्रीमती रेणु सक्सेना और श्री के.सी. श्रीवास्तव पदस्थ थे। के.सी. जी का होना न होना बराबर था और सारा कार्य मैं और रेणु जी बाँटकर किया करते थे। कई कार्य मैं अकेले ही कर लेता था। इसलिए यह आवश्यक था कि जाने से पहले वे सारे कार्य रेणु जी को समझा जाता, अन्यथा मेरे जाने के बाद उनको बहुत परेशानी होती। मेरा स्थानांतरण का आदेश शुक्रवार 4 मार्च 2005 को आया था और अगले ही दिन 5 मार्च को मुझे कार्यमुक्त करने की सूचना के साथ ही यह आदेश दिया गया था कि मैं एक सप्ताह की ज्वाइन करने की छुट्टी लेने के बाद 14 मार्च (सोमवार) को पंचकूला में कार्यभार ग्रहण कर लूँ।
मैं चाहता था कि बीच में मुझे जो एक सप्ताह का अवकाश दिया जा रहा था, वह उस समय न मिलकर बाद में कभी मिले, ताकि मैं उस सप्ताह कानुपर में ही अपना कार्य अन्य अधिकारियों को समझा सकूँ। अधिकांश मामलों में स्थानांतरित होने वाले अधिकारियों को यह सुविधा दी जाती है कि स्थानांतरण पर मिलने वाला एक सप्ताह का अवकाश वे बाद में ले सकते हैं। लेकिन हमारे तत्कालीन सहायक महाप्रबंधक श्री आर.के. ढींगरा ने इस मामले में मुझे आवश्यक सहयोग नहीं किया, हालांकि मैंने इसके लिए बाकायदा आवेदन दे दिया था। अगले दिन 5 मार्च को एक अन्य अधिकारी श्री एन.के. शर्मा (मुख्य प्रबंधक) की भी विदाई होनी थी, अतः उन्होंने उनके साथ ही मेरी भी विदाई कर दी।
विदाई के बाद भी मैं पूरे सप्ताह मंडलीय कार्यालय जाता रहा और सारे कार्य एक-एक करके श्रीमती रेणुजी को समझा दिये। इसका तात्पर्य है कि मेरी एक सप्ताह की छुट्टियाँ बेकार हो गयीं। उस समय तक हमारे बच्चों की परीक्षाएँ नहीं हुई थीं और दीपांक तो हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा दे रहा था, इसलिए मैंने 2 माह तक आगे भी उसी फ्लैट में परिवार को रखने की अनुमति ले ली और स्वयं अकेला ही पंचकूला चला गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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