आत्मकथा भाग-3 अंश-37

टाइपिस्ट की सेवाएँ लेना
उस समय मुझे हाईस्कूल और इंटरमीडियेट के लिए पुस्तकें लिखने का आदेश मिला हुआ था। मैंने टाइपिंग की सुविधा के लिए एक टाइपिस्ट को पार्टटाइम काम के लिए रखा। वे थे श्री गणेश नारायण तिवारी। वे बहुत अच्छे टाइपिस्ट थे और हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में बिना गलती के तेजी से टाइप कर लेते थे। वे हमारे एक स्वयंसेवक श्री ब्रज किशोर पाठक जी का कार्य भी पार्ट टाइम करते थे, जो एक अच्छे आर्कीटैक्ट हैं। उन्होंने ही श्री तिवारी से मेरा परिचय कराया था। श्री तिवारी जी शाम को 6 बजे आते थे और 2 घंटे कार्य करने के बाद जाते थे। मैं ऑफिस से सायंकाल लगभग 5.45 पर लौटता था। केवल 15 मिनट विश्राम करके मुझे भी उनके साथ बैठना होता था। मैं बोलता जाता था और वे टाइप करते जाते थे। इससे कार्य तो काफी हो जाता था, लेकिन थकान भी बहुत हो जाती थी। कभी मेरे पास समय नहीं होता था, तो मैं अपनी आत्मकथा का पहला भाग जो उस समय कागजों पर ही था, उनको टाइप करने को दे दिया करता था।
श्री तिवारी जी ने दो महीने मेरा कार्य किया, फिर यह कहकर मना कर दिया कि उनके पास समय नहीं है। मैंने एक घंटा प्रतिदिन आने के लिए कहा, तो वे इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। अन्ततः मैंने तय किया कि अब सारा काम स्वयं ही किया करूँगा, भले ही समय अधिक लग जाये।
नये साहब
हमारे मंडलीय कार्यालय में दौलतानी जी के जाने के बाद सहायक महाप्रबंधक के रूप में पधारे श्री राकेश कुमार मेहरा। वे भी मेरे पूर्व परिचित और एक प्रकार से मित्र थे। जब मैं वाराणसी मंडलीय कार्यालय में प्रबंधक (ईडीपी) था, तब वे वहाँ वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में पदस्थ थे। वे चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और उनके द्वारा एक घंटा एकाउंटेंसी समझाये जाने से मैं इतनी अच्छी तरह समझ गया था कि बैंक की परीक्षा में इस पेपर में मैं एक बार में ही अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गया था, हालांकि यह विषय जटिल होता है और अधिकांश लोग 2-3 बार में इसे पास कर पाते हैं।
श्री मेहरा इसके अलावा रामचरितमानस के बहुत प्रेमी हैं। उनको यह ज्ञात हो गया था कि कम्प्यूटर और राजनीति के साथ ही धार्मिक मामलों में मेरा ज्ञान औसत से काफी अधिक है। इसलिए कभी-कभी हम आध्यात्मिक चर्चा किया करते थे। वे खाली समय में अंग्रेजी के अच्छे उपन्यास पढ़ा करते थे और कभी-कभी मुझे भी पढ़ने को दिया करते थे।
जब वे सहायक महा प्रबंधक के रूप में कानपुर आये, तो मुझे स्वाभाविक ही बहुत प्रसन्नता हुई। मेरे साथ उनके सम्बंध कुल मिलाकर ठीक ही थे, क्योंकि मित्र होने के बाद भी उनके और मेरे स्तर में बहुत अन्तर था। एक बार उन्होंने मुझे अपना सूचनादाता बनाने की कोशिश की। वे चाहते थे कि मैं ऑफिस में सब लोगों पर नजर रखूँ और कोई गलत काम करता हुआ या काम न करता हुआ दिखाई दे, तो उनको खबर कर दूँ। मुझे यह अच्छा नहीं लगा और मैंने एक बार भी ऐसी कोई सूचना उनको नहीं दी।
यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन उनमें एक बड़ी कमी थी- वह थी पैसे की असामान्य भूख। वे बैंक का बहुत-सा पैसा अपनी सुख-सुविधाओं हेतु खर्च किया करते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने आते ही अपने कमरे में दीवार पर टी.वी. लगवा लिया था, हालांकि उसकी आवश्यकता उनसे पहले और बाद में भी किसी भी साहब को नहीं हुई। वे बैंक से बड़ा लोन लेने वालों से भी अच्छी भेंट पाने की आशा किया करते थे।
लगभग 2 साल बाद जब उनका स्थानांतरण हुआ, तो विदाई में उन्होंने सोने की जंजीर ली। पहले मैंने समझा था कि भेंट की डिब्बी में कोई घड़ी वगैरह होगी, लेकिन जब खोलकर देखने का मौका मिला, तो उसमें सोने की जंजीर थी लगभग 2 तोले की। उनकी विदाई भी परम्परा के अनुसार किसी होटल में होने के बजाय मुख्य शाखा के लाॅन में साधारण तरीके से हुई, ताकि खर्च कम हो और जो पैसे बचें उनसे अच्छी गिफ्ट मिल जाये। रामचरितमानस के एक विद्वान् में पैसे की ऐसी भूख होना मेरे लिए घोर आश्चर्यजनक बात थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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