आत्मकथा भाग-3 अंश-36
पैर में चोट
मम्मी की तेरहवीं के बाद मैं कानपुर लौटकर आया ही था कि कुछ दिन बाद शाखा में कबड्डी खेलते हुए विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी ने (जिनका नाम यहाँ लिखना मैं उचित नहीं समझता) मेरे पैरों को इतनी बुरी तरह जकड़ा कि दायें पैर की नसें दब गयीं और बहुत चोट आयी। हालांकि फ्रेक्चर नहीं था, लेकिन मुझसे खड़ा भी नहीं हुआ जाता था, चलना और सीढ़ियाँ चढ़ना तो असम्भव ही था। किसी तरह शाखा से घर पहुँचा। श्रीमती जी चाहती थीं कि मैं डाक्टर के पास जाऊँ, परन्तु मैंने दृढ़ता से इनकार कर दिया। मैं जानता था कि वे मेरे पैर पर प्लास्टर चढ़ाकर एक महीने के लिए मुझे बिस्तर पर पटक देंगे और मैं हमेशा के लिए लँगड़ा हो जाऊँगा।
वहीं घर से थोड़ी दूर नेहरू नगर के कमला पार्क में एक पहलवान बैठता था, जो मालिश वगैरह करके मोच ठीक करता था। मैं एक मित्र स्वयंसेवक के कंधे पर चढ़कर उसके पास गया। उसने जाँच करके बताया कि फ्रैक्चर नहीं है और दब जाने के कारण नसों में सूजन आ गयी हैं, जो धीरे-धीरे टहलने और कुछ दिन आराम करने से ठीक हो जाएगी।
यह जानकर कि केवल नसों में सूजन है मुझे बहुत सन्तोष मिला। मैं जानता था कि इसका इलाज गर्म-ठंडी सिकाई है। इसलिए मैंने उसी दिन से अपने पैर की गर्म-ठंडी सिकाई चालू कर दी। श्रीमतीजी को इस क्रिया में कोई विश्वास नहीं था, इसलिए सारी व्यवस्था मुझे स्वयं करनी पड़ती थी। वे कभी-कभी कृपापूर्वक केवल पानी गर्म कर देती थीं। हर बार गर्म-ठंडी सिकाई करने से मुझे बहुत आराम मिलता था। मैं एक पैर पर उछलते हुए चलता था और बाथरूम-शौच वगैरह भी स्वयं कर आता था।
इसके साथ ही मैं रोज 3-4 मिनट के लिए वज्रासन पर भी बैठता था, क्योंकि मैं जानता हूँ कि पैरों की विकृतियों को दूर करने में वज्रासन रामबाण है। मेरे एक मित्र श्री प्रवीण कुमार का पैर वज्रासन से ही सामान्य हुआ था। प्रारम्भ में वज्रासन करने में मुझे बहुत कष्ट होता था, लेकिन चोट लगने के तीसरे ही दिन मैं एक मिनट इसमें बैठ गया। फिर तो रोज ही बैठने लगा। इससे मुझे लाभ भी बहुत हुआ। हालांकि श्रीमतीजी का आग्रह निरन्तर जारी था कि डाक्टर के पास जाओ, परन्तु मैं एक मिनट के लिए भी किसी डाक्टर के पास नहीं गया।
जिस दिन मुझे चोट लगी थी, उस दिन छुट्टी थी और आगे भी दो दिन की छुट्टी थी। फिर मैंने 2 दिन की छृट्टी और ले ली। इन पाँच दिनों में ही मुझे इतना लाभ हो गया कि मैं अपने आप सीढ़ियाँ चढ़ और उतर लेता था तथा थोड़ा-थोड़ा चल लेता था। पाँच दिन बाद मैं रिक्शे से ऑफिस जाने लगा, हालांकि श्रीमती जी चाहती थीं कि मैं एक हफ्ते और आराम करूँ। लेकिन बेकार बैठना मेरी आदत नहीं है, इसलिए कार्यालय जाने लगा। मैंने वज्रासन और गर्म-ठंडी सिकाई 15 दिन तक जारी रखी। इससे पैर लगभग पूरा ठीक हो गया और मैं बिना लँगड़ाये चलने लगा। लेकिन कार्यालय पूरे एक माह तक रिक्शे से ही गया। फिर पहले की तरह पैदल ही जाने लगा।
मेरे कार्यालय में एक बाबू थे श्री अनिल गिलोत्रा, वे फिजियोथेरापिस्ट भी हैं। उन्होंने मुझसे बहुत कहा कि पैर में पट्टी बाँधा करो, नहीं तो पैर हमेशा के लिए खराब हो जाएगा। लेकिन मैंने क्षमायाचना के साथ उनकी सलाह अस्वीकार कर दी, क्योंकि मुझे अपनी प्राकृतिक चिकित्सा पर पूर्ण विश्वास था। ईश्वर की दया से मेरा पैर मात्र 1 माह में पूरी तरह ठीक हो गया।
डा. अनिल का विवाह
डाक्टर अनिल के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ। वे हमारे बड़े साढ़ू श्री हरिओम जी अग्रवाल के भतीजे हैं और कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय से एम.बी.बी.एस. की है। उसके बाद वे गोरखपुर वि.वि. से चर्म रोग में एम.एस. करने चले गये थे। उनके रिश्ते की बात एक लड़की डा. रचना से चल रही थी, जो कानपुर की ही हैं। डा. रचना उस समय झाँसी में एम.एस. में ही पढ़ रही थीं। डा. अनिल के घरवालों ने हमसे कहा कि हम डा. अनिल के साथ जाकर लड़की को देख आयें और पसन्द कर आयें।
डा. रचना के पिताजी श्री कानकाणी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ प्रबंधक थे। वे कानपुर की बर्रा कालोनी में रहते थे, जो हमारे घर अशोक नगर से काफी दूर है। हमारे पास उस समय कोई साधन नहीं था, अतः उन्होंने कार भेज दी। उसमें हम उनके घर गये और डा. रचना को देखा। हमें वे बहुत पसन्द आयीं, लेकिन डा. अनिल को सन्देह था कि घरवाले शायद उन्हें पसन्द न करें। अतः उसने अपने छोटे भाई उमेश को बुला भेजा। अगली बार हम उमेश के साथ उनको काकादेव के एक रेस्तरां में देखने गये। वहाँ उमेश को भी अपनी होने वाली भाभी पसन्द आ गयीं और विवाह तय हो गया।
कुछ दिन बाद उनकी सगाई का कार्यक्रम हुआ और मार्च 2004 में उनका विवाह भी मथुरा में सम्पन्न हो गया। हम दोनों कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। हमारी खातिरदारी भी खूब हुई, शायद इसलिए कि लड़की हमने ही पसन्द की थी और डा. अनिल हमें बहुत मानते थे और अभी भी मानते हैं। इस समय डा. अनिल और डा. रचना मथुरा में हैं। उन्होंने अपना बड़ा नर्सिंग होम बना लिया है और एक पुत्र और एक पुत्री के भी माता-पिता बन गये हैं। कानपुर छोड़ने के बाद हमारी उनसे भेंट नहीं हो पायी है, लेकिन फोन पर उनसे श्रीमती जी की कई बार बातें हुई हैं।
(पादटीप- दो साल पहले डा. अनिल सपरिवार हमारे पुत्र दीपांक के सगाई समारोह में शामिल हुए थे। लेकिन किसी कारणवश उसके विवाह में नहीं आ पाये थे।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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