आत्मकथा भाग-3 अंश-35

नये मकान में
हमारा नया मकान भी अशोक नगर में ही सड़क के बीच वाले मंदिर के पास था। उसके मकान मालिक थे श्री लालता प्रसाद तिवारी। हम दिसम्बर 2003 की 15 तारीख को उसमें गये थे। पिछले मकान से हमें 15 दिन का किराया वापस मिला था, जो हमने नये मकान मालिक को दे दिया।
नया मकान यों तो बहुत अच्छा था। लेकिन उसमें एक गड़बड़ थी। वहाँ मकानमालिकन बुढ़िया बहुत बक-बक करती थी। वह हर किसी के ऊपर दिनभर चिल्लाया करती थी और किरायेदारों को भी नहीं बख्शती थी। हमने गलती यह कर दी कि उस मकान में आने से पहले दूसरे किरायेदारों से बात नहीं की, नहीं तो हमें पता चल जाता कि इसमें बुढ़िया बहुत चिल्लाती है और हम उसमें आते ही नहीं। वह जरा-जरा सी बात पर चिल्लाती थी, जैसे- यह दरवाजा मत खोलो, सीढ़ियों की लाइट मत जलाओ, बालकनी में कूलर मत रखो, कील मत ठोको, पानी ज्यादा खर्च मत करो आदि।
बालकनी में कूलर न रखने देने पर मुझे सबसे अधिक गुस्सा आता था। मैं चाहता था कि उसको एक बार हड़का दिया जाये, तो चुप हो जाएगी, परन्तु श्रीमती जी ने मुझे नहीं बोलने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि वह बुढ़िया तो चुप नहीं हुई, लेकिन श्रीमती जी को टेंशन हो गया। लगातार टेंशन रहने से उनको सिरदर्द की बीमारी हो गयी। एक बार उनका एमआरआई भी कराना पड़ा, जिसमें हमारे हजारों रुपये खर्च हो गये, लेकिन सौभाग्य से रिपोर्ट नाॅर्मल निकली। फिर भी श्रीमती जी का टेंशन बहुत बढ़ गया था। एक दिन जब बुढ़िया अपनी दैनिक आदत के अनुसार बक-बक कर रही थी, तो तनाव सहन न कर पाने के कारण श्रीमतीजी रोने लगीं।
तब मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उस बुढ़िया को बहुत हड़काया। वह जितनी जोर से बोलती थी, मैं उससे भी ज्यादा जोर से बोला। उसके घर वालों ने हाथ-पैर जोड़कर मुझे चुप कराया। उस दिन के बाद बुढ़िया का चिल्लाना समाप्त हो गया, क्योंकि पहली बार सेर को सवा सेर मिला था। अगर मैं शुरू में ही उसे हड़का देता, तो उसकी बक-बक तभी बन्द हो जाती। लेकिन श्रीमती जी ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया, जिससे समस्या बढ़ गयी। इस घटना के बाद हमने तय कर लिया था कि अब इस घर में नहीं रहना है। इसलिए मैंने फिर मकान देखना शुरू किया।
सौभाग्य से हमें पास में ही नेहरू नगर में एक मकान मिल गया, जो हालांकि बहुत अच्छा नहीं था, लेकिन काफी ठीक था और सबसे बड़ी बात यह थी कि मकान मालिक और मालिकन बहुत ही अच्छे थे। हम वहाँ आराम से रहने लगे। पिछले मकान मालिक श्री लालता प्रसाद तिवारी ने हमसे 10 हजार रुपये सिक्योरिटी जमा करायी थी, उसमें से केवल 8 हजार वापस दिये। कई बार माँगने पर भी उन्होंने बकाया 2 हजार नहीं दिये, हालांकि हमने बिजली और पानी का सारा बिल जमा कर दिया था।
मातृशोक
कैंसर बहुत ही खराब रोग है। इसका कोई इलाज भी ऐलोपैथी या किसी भी पैथी के पास नहीं है। हमारे रिश्तेदारों और परिवार में कई लोग इसके ग्रास बन चुके हैं। दुर्भाग्य से हमारी माँ को भी आँतों और लीवर का कैंसर हो गया था। इसका पता हमें तब चला था, जब मम्मी हमारे साथ कानपुर में थी। हम चाहते थे कि वह हमारे साथ रहे और इलाज कराये। मैं जानता था कि आगरा में जायेगी, तो घर वाले उसे किसी नर्सिंग होम में भरती करा देंगे और वहाँ के डाक्टर उसे समय से पहले ही मार डालेंगे। मैंने बहुत आग्रह किया कि यहीं रहो, पर वह न मानी और आगरा चली गयी। जैसी कि मुझे आशंका थी, वहाँ जाकर उसकी तबियत बहुत खराब हो गयी। उससे कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता था, सब पलट देती थी। धीरे-धीरे वह कमजोर होती गयी। एक बार कैंसर का ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन रोग बहुत फैल चुका था, इसलिए इसके दो-तीन महीने बाद ही फरवरी 2004 में उसकी मृत्यु हो गयी।
हम उस समय कानपुर में थे। डाक्टर भाईसाहब ने हमें तत्काल आने के लिए फोन किया। हम समझ गये कि कोई अनहोनी होने वाली है। किसी तरह बिना आरक्षण के एक रात्रि की ट्रेन में बैठकर हम आगरा पहुँच गये। ऑटो रिक्शा से घर के दरवाजे पर पहुँचते ही हमने देखा कि वहाँ भीड़ लगी है। हमें कारण समझने में देर नहीं लगी। उसी रात्रि में मम्मी हमारा साथ छोड़ गयी थी और उसकी पार्थिव देह पड़ी हुई थी। बड़े भाईसाहब के आने का इंतजार किया जा रहा था, जो किसी काम से अलीगढ़ गये थे। उनके आने पर मम्मी का अन्त्येष्टि संस्कार ताजगंज के श्मशान घाट पर किया गया।
हम सब भाइयों को घोर गरीबी में भी मम्मी ने अनेक मुसीबतें सहते हुए पढ़ाया था और किसी लायक बनाया था। उसका बिछोह बहुत पीड़ादायक था, लेकिन हरिइच्छा समझकर हमने इसको सहन कर लिया। आज भी हमें उसकी याद आती है, तो आँखें छलक पड़ती हैं। मुझे सबसे ज्यादा चिन्ता पिताजी की थी। जब दोनों एक साथ थे, तो मुझे चिन्ता नहीं होती थी, क्योंकि वे एक-दूसरे का ध्यान रख लेते थे। मम्मी के जाने के बाद पिताजी बहुत ही अकेले हो गये हैं। हालांकि हम सभी भाई और उनकी पत्नियाँ भी उनका पूरा ध्यान रखती हैं, लेकिन मम्मी का स्थान कोई नहीं ले सकता।
(पादटीप- लगभग 4 वर्ष पूर्व हमारे पिताजी का भी देहावसान हो चुका है। उस समय हम नवी मुम्बई में रहते थे।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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