आत्मकथा भाग-3 अंश-34

मकान बदलना
मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि हमारे मकान मालिक श्री एन.के. सिंह का देहान्त हो जाने के बाद 2003 में हमारी लीज को 3 साल के लिए आगे बढ़ाया गया था और किराया भी 20 प्रतिशत बढ़ाया गया था। उस समय हमारे वाले भाग का किराया केवल रु. 3300 था। यह हालांकि बहुत कम नहीं था, लेकिन मार्केट के हिसाब से थोड़ा कम था। तब हमारी मकानमालिकन को जाने किसने कह दिया कि अगर हमसे मकान खाली करा लिया जाये, तो वह फ्लैट आसानी से 5 हजार रुपये किराये में उठ जायेगा। कहावत है कि पैसा अच्छे-अच्छों का दिमाग खराब कर देता है। इससे शीघ्र ही मकानमालिकन और उनके पुत्र का व्यवहार हमारे प्रति बदलने लगा और वे हमसे उलझने के मौके तलाशने लगे।
डा. रेणु और अनिल जी का व्यवहार तो कुल मिलाकर ठीक था, लेकिन आंटीजी तो एकदम ही हमसे खार खाने लगीं। वे हमारी महरी, प्रेस वाली और कपड़े धोने वाली सभी को परेशान करने लगीं, ताकि वे हमारा कार्य न करें। हमने समझ लिया कि अब यहाँ रहना कठिन होता जा रहा है और सम्भव है जल्दी ही हमें मकान छोड़ना पड़े। तभी एक दिन मामूली सी बात पर आंटी जी भड़क गयीं और एकदम लड़ने लगीं। पहले तो मैंने मामला टालने की कोशिश की, लेकिन वे तो स्पष्ट कहने लगीं कि मकान खाली कर दो। तब हमने कह दिया कि ठीक है, दो महीने में खाली कर देंगे।
जिस दिन यह झगड़ा हुआ था, उसी दिन रात के समय अनिल जी का फोन हमारे पास आया कि मकान खाली मत करिये, क्योंकि यह उनको अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन हमने उनसे भी कह दिया कि आंटी जी ने आज जो-जो हमसे कहा है उससे हमारा यहाँ रहना असम्भव हो गया है और हम मकान जरूर खाली करेंगे। वैसे भी हमारी श्रीमती जी को जरा-जरा सी बात पर टेंशन हो जाता है और देर तक बना रहता है। इसलिए हम ऐसा घर चाहते थे जहाँ हम शान्ति से रह सकें।
फिर हमने इधर-उधर मकान देखना शुरू किया। हम अशोक नगर में या उसके आस-पास ही मकान चाहते थे, ताकि मेरे लिए आॅफिस जाना और बच्चों को स्कूल जाना आसान हो। पहले हमें एक सरदार जी का घर पसन्द आया। वे लोग भी अच्छे थे और वाजिब किराये में हमें मकान देने को न केवल तैयार थे, बल्कि आग्रह भी कर रहे थे। लेकिन उसमें एक समस्या थी कि वह फ्लैट तीसरी मंजिल पर था और उसके बिल्कुल सामने ही एक बारातघर जैसा गेस्ट हाउस था, जहाँ विवाह शादी जैसे कार्यक्रम लगभग रोज हुआ करते थे, जिनके लाउडस्पीकरों का शोर परेशान करता था। इसलिए हमने वह फ्लैट लेने का इरादा छोड़ दिया।
फिर हमें एक घर पसन्द आया। वह भी तीसरी मंजिल पर था, लेकिन काफी आरामदायक था और उसमें तीन कमरे थे। साथ में एक बड़ा स्टोर रूम भी था। उसका किराया भी लगभग उतना ही था, जितना हम अपने वर्तमान मकान में दे रहे थे। यह मकान हमें एक दलाल के माध्यम से मिला था, उसने हमें विश्वास दिलाया था कि यहाँ सब लोग एक परिवार की तरह रहते हैं। हमने इस पर विश्वास कर लिया।
जिस दिन हम मकान बदलने वाले थे, उसके कुछ दिन पूर्व फिर आंटीजी ने हमसे झगड़ा किया। हमने कहा कि हमने 2 महीने में खाली करने का वायदा किया है और अभी 2 महीने पूरे नहीं हुए, फिर क्यों हल्ला मचा रही हो। इस पर वे फिर अनाप-शनाप बोलने लगीं, तो श्रीमती जी ने उनको खूब सुनाया। मैं तो ऑफिस में था, घर आने पर मुझे पता चला। मुझे बहुत गुस्सा आया। हमने जो नया मकान तय किया था, उसमें कुछ काम चल रहा था। हमने उसके मालिक से कहा कि काम हमारे आने के बाद भी चलता रहेगा, इसलिए हम 15 दिन पहले ही आना चाहते हैं। वे मान गये।
एक दिन आंटीजी और अनिल जी ने अपने एक परिचित पुलिस इंस्पेक्टर को बुला लिया। वे उससे हम पर दबाब डलवाना चाहते थे। उस दिन रविवार था और मैं घर पर ही था। पुलिस इंस्पेक्टर ने मुझे बुलाया, तो मैं गया। तभी हमारे परिचित प्रचारक श्री राजेन्द्र जी सक्सेना वहाँ पहुँच गये। पुलिस इंस्पेक्टर ने उनसे परिचय पूछा तो संघ प्रचारक सुनकर वह एकदम चौंक गया। उसने पूछा कि क्या आप चन्द्र मोहन जी को जानते हैं। हमने बताया कि वे तो हमारे बहुत घनिष्ट हैं। इस पर वह बहुत प्रसन्न हुआ। वह चन्द्र मोहन जी को बहुत मानता था।
इस तरह पासा पलटते देखकर आंटीजी और अनिलजी दोनों को साँप सूँघ गया। इंस्पेक्टर ने हमसे कहा कि आप कोई चिन्ता मत करिये और आराम से मकान बदल लीजिए।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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