आत्मकथा भाग-3 अंश-33

कांग्रेसियों की गुंडागिर्दी का इलाज
कानपुर में फूलबाग नाम का एक ऐतिहासिक मैदान है, जो माल रोड के किनारे है। वहाँ संघ की एक शाखा नियमित लगती है। एक दिन जब शाखा में केवल 2-3 लोग थे, तो कुछ युवकों ने आकर उनके साथ मारपीट की और शाखा लगाने का विरोध किया। पता चला कि वे कांग्रेस के कार्यकर्ता किंवा गुंडे थे। जब इस मारपीट की खबर अन्य संघ कार्यकर्ताओं तक पहुँची, तो सबमें रोष फैल गया।
संघ के तत्कालीन सर कार्यवाह मा. मोहन जी भागवत (अब सरसंघचालक) को जब इसका पता चला तो उन्होंने स्वयंसेवकों को ही डाँटा कि शाखा में इतनी कम संख्या क्यों थी? अगर शाखा में 10-12 लोग रहते, तो किसी गुंडे की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि शाखा की ओर आँख उठाकर भी देख ले। फिर उन्होंने यह भी कहा कि आपको दंड चलाने की शिक्षा किसलिए दी गयी है? यदि इसका उपयोग गुंडों के ऊपर भी नहीं कर सकते, तो इसका क्या लाभ? अगले दिन उसी शाखा में भारी संख्या में स्थानीय स्वयंसेवक पहुँच गये और प्रतीक्षा करने लगे कि कोई गुंडा नजर आये, तो उसको सबक सिखाया जाये, लेकिन कोई नहीं आया। इसलिए सब लोग चले गये और बात आयी-गयी हो गयी।
इसके कुछ दिनों बाद भागवत जी का प्रवास कानपुर में हुआ। उनका एक कार्यक्रम प्रातः 6 बजे कानपुर से प्रख्यात विद्यालय बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन के मैदान में रखा गया। उस अवसर पर कांग्रेसियों ने भागवत जी को काले झंडे दिखाने की योजना बनायी, क्योंकि उन्होंने स्वयंसेवकों को ललकारा था और गुंडों को सबक सिखाने की आज्ञा दी थी। कांग्रेसियों की योजना का पता चलते ही स्वयंसेवकों ने भी उनका इलाज करने की योजना बना ली। प्रातः 6 बजे से कुछ पहले जैसे ही भागवत जी उस मैदान के पास पहुँचे, वैसे ही इधर-उधर खड़े कांग्रेसियों ने काले झंडे निकाल लिये और उनके खिलाफ नारेबाजी की। यह देखते ही पहले से तैयार स्वयंसेवकों ने उनको दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। कांग्रेसी वहाँ से जान बचाकर भाग गये। इसके बाद भागवत जी का कार्यक्रम निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।
इस घटना के बाद जब तक मैं कानपुर में रहा, तब तक और शायद अभी तक किसी कांग्रेसी या अन्य गुंडे की हिम्मत नहीं हुई कि स्वयंसेवकों के साथ मारपीट करे या शाखा लगाने का विरोध करे। ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ मंत्र से ही उनका इलाज हुआ। अन्य कोई भाषा वे नहीं समझते।
कैप्टेन राजीव का कार्य
सेना से रिटायर्ड कैप्टेन श्री राजीव सिंह हमारे कानपुर मंडलीय कार्यालय में सुरक्षा अधिकारी के रूप में पदस्थ थे। वहाँ से पहले वे हमीरपुर क्षेत्रीय कार्यालय में थे, तभी उनसे मेरा परिचय हुआ था। वे मेरी बहुत इज्जत करते थे और आज भी करते हैं। उनकी पत्नी श्रीमती वंदना सिंह कानपुर के प्रख्यात रिजेंसी हाॅस्पीटल में डाइटीशियन (खुराक विशेषज्ञ) हैं। वे उस समय एक गुर्दा रोग विशेषज्ञ डाक्टर के साथ कार्य कर रही थीं। गुर्दा रोगियों को अपने खान-पान में बहुत सावधानी रखनी पड़ती है। इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने अपने बाॅस डाक्टर के कहने पर एक पुस्तिका लिखी थी, जो गुर्दा रोगियों के लिए भोजन के बारे में थी। कैप्टेन राजीव चाहते थे कि मैं उसे किसी प्रिंटिंग प्रेस से सस्ते में छपवा दूँ, ताकि वे गुर्दा रोगियों में उसका वितरण कर सकें। पुस्तिका छोटी सी ही थी, इसलिए मैंने स्वयं उसे टाइप कर दिया और कानपुर के एक प्रिंटिंग प्रेस में छपवा दिया। उसकी एक हजार प्रतियाँ केवल रु. 2500 में छप गयीं।
निगम साहब की पुस्तक का कार्य
हमारी अशोक नगर शाखा के पास ही एक सज्जन रहते थे श्री राम बली निगम, जिनकी उम्र उस समय 83 वर्ष थी। वे पहले कहीं शासकीय सेवा में थे और रिटायर होकर अपनी पुत्री के पास रहते थे। वे कवि भी थे। उन्होंने एक काव्य पुस्तक लिखी थी ‘आदिशक्ति महिमा’, जो दोहों और चौपाइयों के रूप में थी। इस पुस्तक को उन्होंने अशोक नगर में ही पड़ोस के एक प्रेस में छपवाया था। वे उस पुस्तक से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उसमें प्रूफ की ढेर सारी गलतियाँ थीं। लगभग हर चौपाई दोहे में कोई न कोई गलती थी।
इसमें हालांकि उनका काफी पैसा खर्च हो गया था, फिर भी वे चाहते थे कि उस पुस्तक का दूसरा संस्करण ऐसा निकले, जिसमें बिल्कुल गलतियाँ न हों। वे ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे, जो इस कार्य में उनकी सहायता कर सके। तब हमारी शाखा के एक स्वयंसेवक श्री दामोदर प्रसाद तिवारी, जो अवकाशप्राप्त थे और वहाँ के लोकमान्य तिलक पुस्तकालय एवं वाचनालय के अवैतनिक प्रभारी थे, ने उनको मेरे बारे में बताया। पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब मुझसे उनका परिचय हुआ, तो बडे़ प्रसन्न हुए।
मैंने उनकी पुस्तक की साॅफ्टकाॅपी के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि पिछले प्रेस वाले के पास कुछ भी उपलब्ध नहीं है और सारा फिर से टाइप कराना होगा। तब मैंने शिशु मन्दिर के एक आचार्य श्री विनीत श्रीवास्तव से ही उनकी पुस्तक भी टाइप करायी और अपने ही कम्प्यूटर पर सुधारी। इसमें मेरा काफी समय लगा, लेकिन कार्य पूरा हो गया। फिर उस पुस्तक को मैंने उसी प्रेस में सस्ते में छपवा दिया, जहाँ कैप्टेन राजीव की पुस्तक छपवायी थी। उसके मुखपृष्ठ के चित्र के लिए मुझे बाजार की खाक छाननी पड़ी, लेकिन काफी दुकानों पर देखने के बाद अन्ततः आदिशक्ति का चित्र मिल ही गया। इस पुस्तक के छपने पर निगम साहब ने मुझे बहुत आशीर्वाद दिये। मुझे भी बहुत प्रसन्नता है कि इस पवित्र कार्य में मैं कुछ सहयोग कर सका।
रूबी
शिवानी वाले फ्लैट में हमारे सामने एक-एक करके दो-तीन परिवार आये। परन्तु हमारी सबसे अधिक घनिष्टता रूबी से हुई। वे एक सरदार परिवार की पुत्री और दूसरे की पुत्रवधू हैं। देखने में किसी फिल्मी हीरोइन से भी ज्यादा सुन्दर लगती हैं। लेकिन इससे भी अच्छा है उनका स्वभाव। उस फ्लैट में आने के 15-20 दिन के अन्दर ही उनको हमसे इतना लगाव हो गया था, जैसे हमें वर्षों से जानती हों। उनके एक पुत्री खुशी है, जो उस समय केवल 2 या ढाई साल की थी। खुशी हमसे इतना हिल गयी थी कि लगभग दिन भर हमारे ही फ्लैट में रहती थी। वह मोना के साथ बहुत खेलती थी। हमारा भी मन उससे लग जाता था।
रूबी का हाल यह था कि उसका मन अपने फ्लैट में जाने को नहीं करता था, क्योंकि उनके पति सरदार जी दिन भर घर से बाहर रहते थे। वे इतनी भावुक थीं कि हँसते-हँसते बातें करते-करते यह सोचकर ही रोने लग जाती थीं कि कुछ दिन बाद या कुछ महीने बाद हमें जाना पड़ेगा और हमारा साथ छूट जायेगा। दुर्भाग्य से हम उनके साथ अधिक नहीं रह सके, क्योंकि कुछ महीने बाद ही हमें मकान बदलना पड़ा। वे अभी भी अशोक नगर में ही रहती हैं, वहीं उनका मायका भी है। हालांकि उनसे हमारा सम्पर्क टूट गया है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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