आत्मकथा भाग-3 अंश-32

गौतम ब्रदर्स का कार्य
कानपुर में एक प्रकाशक हैं गौतम ब्रदर्स। उन्होंने एक बार ‘अमर उजाला’ में विज्ञापन दिया कि उन्हें विभिन्न विषयों पर बच्चों के लिए पुस्तकें लिखने वाले लेखकों की आवश्यकता है। इस विज्ञापन को पढ़कर मैंने फोन द्वारा सम्पर्क किया, तो उन्होंने मुझे अपने कार्यालय में मिलने को बुलाया। उनका कार्यालय कोतवाली के पास बड़े चौराहे से मूलगंज जाने वाली मुख्य सड़क मेस्टन रोड पर है।
एक दिन कार्यालय समय के बाद मैं उनसे मिलने गया। मैं अपनी कुछ पुस्तकें भी उनको दिखाने ले गया था। उन्होंने मुझसे हिन्दी और अंग्रेजी में बच्चों के लिए 5 भागों में कम्प्यूटर पर पुस्तकें लिखने के लिए कहा, जो मैंने स्वीकार कर लिया। पारिश्रमिक भी पेज के अनुसार तय हो गया। उन्होंने मुझे कई अन्य प्रकाशकों की पुस्तकें नमूने के तौर पर दीं और कहा कि उन्हें ऐसी ही पुस्तकें चाहिए। मैंने उनसे कहा कि मैं इनसे भी अच्छी पुस्तकें लिख दूँगा। उन्होंने मुझसे पहला भाग लिखकर दिखाने के लिए कहा।
घर आकर मैंने कार्य प्रारम्भ कर दिया और शीघ्र ही पहला भाग तैयार कर लिया। उसकी एक प्रति छापकर मैं गौतम जी को दिखाने ले गया। उन्होंने दो दिन बाद आने के लिए कहा कि देखकर बतायेंगे। दो दिन बाद मैं गया, तो मैंने देखा कि उन्होंने पुस्तक में काफी संशोधन कर दिये हैं और कई जगह तो वाक्य के वाक्य काट दिये हैं। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, लेकिन मैंने सोचा कि कोई बात नहीं, पुस्तक तो इनको ही बेचनी है। उन्होंने मुझे कुछ सुझाव भी दिये।
अगली बार मैं उनके बताये संशोधन कर ले गया और उनके सुझाव के अनुसार पुस्तक की रूपरेखा भी सुधार दी। तब तक मैंने 3 भाग पूरे कर लिये थे। मैं उन तीनों को छापकर ले गया। उन्होंने फिर दो दिन बाद आने को कहा। जब मैं गया, तो देखा कि उनमें उन्होंने फिर बहुत काट-छाँट की है और फिर भी संतुष्ट नहीं हैं। मुझे बहुत क्रोध आया। तब तक किसी प्रकाशक ने मेरी किसी पुस्तक में एकाध शब्दों की वर्तनी सुधारने के अलावा कोई संशोधन करने की हिम्मत नहीं की थी और ये सज्जन मेरी पुस्तकों के वाक्य के वाक्य और पैराग्राफ के पैराग्राफ काट दे रहे थे और फिर भी संतुष्ट नहीं थे।
मैं समझ गया कि इनका इरादा पुस्तक छापने का नहीं है और केवल मेरा समय नष्ट कर रहे हैं। इसलिए वहाँ तो मैं कह आया कि फिर से आपकी इच्छा के अनुसार पुस्तकों को सुधार दूँगा। लेकिन घर आते ही मैंने श्रीमती जी से उनको फोन करा दिया कि हम अभी यह काम नहीं कर पायेंगे, क्योंकि कुछ दूसरी पुस्तकों का काम मिल गया है। वे समझ गये और फोन पर कहा कि नमूने की पुस्तकों को लौटा दीजिए। मैंने कहला दिया कि आदमी भेज दो, ले जाएगा। दूसरे दिन उनका आदमी घर आया, तो मैंने नमूने की सारी पुस्तकें उसको पकड़ा दीं।
जिन पुस्तकों को गौतम ब्रदर्स ने छापने लायक नहीं समझा था, बाद में वे ही पुस्तकें श्रीमती जी के नाम से आगरा के एक प्रकाशन मै. विनोद पुस्तक मन्दिर ने छाप दीं और काफी सफल रहीं। बाद में उन्हीं पुस्तकों को कुछ सुधारों के साथ मेरे नाम से मेरठ के मै. विद्या प्रकाशन ने भी छापा और उनके कई संस्करण निकले।
एक बार दशहरे पर जब मैं आगरा गया, तो मैंने मै. विनोद पुस्तक मन्दिर द्वारा छापी गयी अपनी कम्प्यूटर की पुस्तकों का एक सेट (कक्षा 1 से कक्षा 5 तक का) अपने भांजे (छोटी बहिन सुनीता के सुपुत्र) चि. हार्दिक अग्रवाल (मून) को दिया, जो उस समय कक्षा 3 में पढ़ता था। उसके बाद फिर जब मैं दिवाली पर आगरा गया और भाई दूज वाले दिन मून से भेंट हुई, तो मिलते ही वह अपने-आप कहने लगा- ‘मामाजी, पहले मेरी समझ में कम्प्यूटर नहीं आता था, पर आपकी किताब पढ़कर सब समझ में आ गया।’ यह सुनकर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई इसे शब्दों में नहीं बता सकता। पहली बार मुझे अपने लक्ष्य समूह, जिसे अंग्रेजी में ‘टार्गेट ग्रुप’ कहते हैं, के एक पाठक से फीडबैक मिला, वह भी बिना माँगे। मैं यही तो जानना चाहता था कि मेरी पुस्तकें बच्चों की समझ में कितना आती हैं।
(पादटीप- चि. हार्दिक ने आईआईटी, दिल्ली से बी.टेक. किया है और सैमसंग में दक्षिण कोरिया में कार्य करता है। अभी कुछ दिनों पूर्व ही उसका चयन आईआरएस में हो गया है, जो आईएएस के समकक्ष है।)
पहाड़िया जी का कार्य
उन्हीं दिनों एक स्वयंसेवक सज्जन से मेरा परिचय हुआ। विश्व संवाद केन्द्र के प्रभारी मा. राजेन्द्र सक्सेना ने उनसे मेरा परिचय कराया था। वे थे श्री प्यारेलाल पहाड़िया, जो राष्ट्रकवि स्व. श्री मैथिली शरण गुप्त के रिश्ते में समधी लगते थे। वे एक प्रकाशन चलाते थे ‘श्याम प्रकाशन’ के नाम से और लगभग 300 पुस्तकें उन्होंने छापी थीं। जब उन्हें पता चला कि मैं कम्प्यूटर पर पुस्तकें लिखता हूँ, तो वे चाहते थे कि मैं कक्षा 6 से 8 तक की पुस्तकें कम्प्यूटर पर हिन्दी में उनके लिए लिख दूँ। मैंने स्वीकार कर लिया, लेकिन कहा कि मैं बिना पारिश्रमिक लिये नहीं लिखता, इसलिए अधिक नहीं तो उतना पारिश्रमिक जरूर देना होगा, जितना मुझे दूसरे प्रकाशकों से मिलता है। वे इसके लिए तैयार नहीं हुए।
मैंने उनसे पूछा कि आपने जो 300 पुस्तकें छापी हैं, उनके लेखकों को आपने क्या पारिश्रमिक दिया है, तो उन्होंने कहा- ‘कुछ नहीं।’ मुझे बड़ा गुस्सा आया। वास्तव में वे अपने सम्बंधों का फायदा उठाकर लेखकों से पुस्तकें लिखवा लेते थे और छप जाने पर उनको उनकी 10-20 प्रतियाँ दे देते थे और इसके अलावा कुछ नहीं देते थे। वे स्वयं पुस्तकों को बेचकर लाखों रुपये कमाते थे।
यह स्पष्ट रूप से लेखकों का शोषण था। मैं इसे कभी प्रोत्साहित नहीं कर सकता था। इसलिए मैंने उनको स्पष्ट बता दिया कि मैं आपके लिए पुस्तकें नहीं लिख सकता। मैंने राजेन्द्र जी सक्सेना से भी कह दिया कि ये लेखकों का शोषण करते हैं, इसलिए इनके लिए पुस्तकें लिखने के लिए मुझसे मत कहिए। राजेन्द्र जी भी मुझसे सहमत थे, इसलिए वह मामला वहीं समाप्त हो गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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