आत्मकथा भाग-3 अंश-31

मकान मालिक का देहान्त
हमारे मकान मालिक श्री एन.के. सिंह मुँह के कैंसर से पीड़ित थे। वे तम्बाकू-गुटखा बहुत खाते थे। इससे उनको कैंसर हो गया था। उनका इलाज बहुत दिनों तक कानपुर के लाला लाजपतराय अस्पताल में चला था, जिसे बोलचाल में ‘हैलट’ कहते हैं। वे लगभग ठीक हो गये थे। जनवरी 2003 में मुझे एक बार बैंक के कार्य से आगरा जाना पड़ा। वहीं मुझे उनका अचानक देहान्त होने का समाचार मिला। उनकी उम्र अधिक नहीं थी, केवल 6-7 साल पहले ही रिटायर हुए थे। जैसा कि मैं ऊपर लिख चुका हूँ उनके पुत्र भी शराब के व्यसनी थे और एक बार उनमें बहुत झगड़ा भी हुआ था।
मकान मालिक अंकल जी का देहान्त होने पर स्वाभाविक ही मुझे उनकी पत्नी यानी मकान मालकिन आंटी जी की सुरक्षा की चिन्ता हुई। मैं शीघ्र ही आगरा से लौटा और सबसे पहले आन्टी जी से मिला। मैंने उनको आश्वासन दिया कि ‘आप किसी तरह की चिन्ता मत करना। मैं आपके साथ हूँ।’ प्रभु कृपा से मेरे सामने उनको अपने पुत्र की ओर से कोई समस्या पैदा नहीं हुई।
मकान मालिक के देहान्त के लगभग 6 माह बाद हमारे फ्लैट के किराये की लीज समाप्त हो रही थी। यह पहले से तय था कि हम 20 प्रतिशत किराया बढ़ाकर लीज को फिर तीन साल के लिए आगे बढ़ा सकते हैं। हमने ऐसा ही किया। वैसे भी मुझे कानपुर में रहते हुए 7 वर्ष से अधिक हो गये थे और मैं जानता था कि अब कभी भी मेरा स्थानांतरण हो सकता है। वैसे उस मकान में हमें कोई समस्या नहीं थी, इसलिए मकान बदलने का प्रश्न ही नहीं था।
बाबूलाल जी मिश्र का देहावसान
मैं पीछे इनके बारे में विस्तार से लिख चुका हूँ। वे काफी वृद्ध स्वयंसेवक थे और संघचालक भी रह चुके थे। फरवरी 2003 में अचानक उनका देहावसान हो गया। उस समय उनकी उम्र 92 या 93 वर्ष थी। मेरे ऊपर उनका बहुत स्नेह था। उस समय तक मुझे कानपुर में रहते हुए 7 वर्ष हो गये थे, परन्तु एक बार भी मुझे वहाँ के श्मशान घाट (भैरों घाट) नहीं जाना पड़ा था। बाबूलाल जी की अन्त्येष्टि के समय ही पहली बार मैं वहाँ गया। उसके बाद मुझे दुर्भाग्य से एक-एक महीने के अन्तर से लगातार चार बार श्मशान घाट जाना पड़ा।
कुमार साहब की बीमारी और देहावसान
जब श्री दौलतानी हमारे मंडलीय कार्यालय के सहायक महाप्रबंधक थे, तो हमारे मुख्य प्रबंधक थे श्री महाराज रोहित कुमार। वे बिहार के रहने वाले थे और किसी अच्छे जमींदार खानदान के थे। देखने में भी बहुत आकर्षक लगते थे। प्रारम्भ में वे कानपुर मुख्य शाखा के मुख्य प्रबंधक थे। तभी उनको कैंसर की बीमारी हो गयी। चाय के अलावा उनको कोई व्यसन भी नहीं था। इस बीमारी का पता समय पर चल गया, तो उनका इलाज हो गया और आॅपरेशन के बाद वे लगभग ठीक हो गये, हालांकि उनका मुँह बहुत टेढ़ा हो गया था।
इतना ही होता तो गनीमत थी, लेकिन कुछ समय बाद उनके सिर में कहीं ट्यूमर जैसी बीमारी हो गयी। वह ट्यूमर ऐसा था कि अगर तत्काल न निकलवाया जाता, तो लगातार बढ़ता ही जाता था और उसके कारण उनकी जान को भी खतरा होता जाता था, इसलिए आॅपरेशन कराना जरूरी था। वैसे आॅपरेशन भी अपने आप में खतरनाक था और उसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं थी। अन्ततः लखनऊ के पी.जी.आई. अस्पताल में उनका आॅपरेशन हुआ। आॅपरेशन के समय ही वे गहरी बेहोशी (काॅमा) में चले गये। वे कई महीने तक काॅमा में ही रहे और दुर्भाग्य से काॅमा में ही उनका देहावसान हो गया।
एक बार मैं तथा कु. तेजविन्दर कौर आईटी अधिकारियों के एक सम्मेलन में शामिल होने लखनऊ गये थे। उधर से हम श्री दौलतानी जी के साथ कार में लौटे थे। लौटने से पहले वे कुमार साहब को देखने गये। हम भी उनके साथ ही गये। उनके वार्ड में बहुत तीखा धुआँ जैसा भरा हुआ था, जिससे आँखों में जलन होती थी। कभी-कभी लगता था कि कुमार साहब काॅमा से बाहर आ रहे हैं, लेकिन नहीं आये। थोड़ी हालत सुधरने पर उन्हें घर ले आया गया। परन्तु एक दिन अचानक हालत बिगड़ जाने पर उन्हें कानपुर के रीजेंसी अस्पताल में लाया गया। वहीं अगले दिन ही उनका देहान्त हो गया।
कुमार साहब का देहान्त होने पर जब दौलतानी जी वहाँ पहुँचे, तो उनके पहुँचते ही कुमार साहब की पत्नी ने अपनी चूड़ियाँ उतारकर दौलतानी जी के ऊपर फेंक मारीं और चिल्लाकर कहा- ‘अब तेरे को शान्ति मिल गयी?’ उनकी धारणा थी कि दौलतानी जी ने कुमार साहब के इलाज के लिए समय पर धनराशि मंजूर नहीं की, जिससे इलाज अच्छा नहीं हुआ। इस बात में कितना सत्य था, यह नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस घटना का कई रूपों में बैंक में कुप्रचार हो गया, जिससे दौलतानी जी की छवि पर बहुत विपरीत असर पड़ा।
कुमार साहब की अन्त्येष्टि के लिए मुझे मार्च 2003 में दूसरी बार फिर श्मशान घाट जाना पड़ा था। तीसरी बार मुझे श्मशान घाट एक माह बाद अप्रैल 2003 में तब फिर जाना पड़ा जब हमारे एक प्रमुख स्वयंसेवक संतोष जी ने घरेलू कारणों से फिनायल पीकर आत्महत्या कर ली थी।
सूरज भाईसाहब का देहावसान
चौथी बार मुझे फिर मई 2003 में तब श्मशान घाट जाना पड़ा था, जब हमारे सूरज भाईसाहब का देहावसान हो गया था। वे बहुत दिनों से बीमार चल रहे थे। उनके गुर्दे का प्रत्यारोपण हुए पाँच वर्ष हो गये थे और छठा वर्ष चल रहा था। जो गुर्दे सीधे रिश्तेदारों से नहीं लिये जाते उनका 5 वर्ष से अधिक चलना बहुत कठिन होता है। सब लोग यह जानते थे, फिर भी आशा कर रहे थे कि जब तक चल जायें, तब तक चलने दो। दोबारा गुर्दा प्रत्यारोपण का प्रश्न ही नहीं था।
एक बार सूरज भाईसाहब की हालत बहुत बिगड़ गयी थी। उनको जरीब चैकी के पास एक अस्पताल में भरती कराना पड़ा। उनकी साँस बहुत तेजी से चलने लगी थी, जिससे लगता था कि अब गये, तब गये। परन्तु एक माह वहाँ रहने के बाद वे लगभग काफी स्वस्थ हो गये और अपने घर वापस आ गये। सबने इसे चमत्कार और ईश्वर की कृपा माना। लेकिन इसके लगभग 2-3 माह बाद अचानक उनका देहान्त हो गया।
मैं उस समय आगरा में था। खबर पाते ही बहुत से रिश्तेदार आगरा से और इधर-उधर से कानपुर पहुँच गये। उनमें मैं भी था। वहीं मेरी उपस्थिति में ही आर्यसमाजी पद्धति से उनका दाह संस्कार हुआ। उनके अन्त्येष्टि संस्कार के लिए मुझे चौथी बार श्मशान घाट जाना पड़ा था।
चार माह में लगातार चार बार श्मशान घाट जाने का मेरे मन पर बहुत बुरा असर पड़ा। इन चारों ही व्यक्तियों का मेरे ऊपर बहुत स्नेह था। उन दिनों मैं बहुत खिन्न रहने लगा था। काफी दिनों बाद धीरे-धीरे मैं सामान्य हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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