आत्मकथा भाग-3 अंश-29
स्वरूप नगर शाखा में आग
हमारा कानपुर मंडलीय कार्यालय जिस बिल्डिंग में प्रथम तल पर चलता था, उसी में नीचे भूमि तल पर हमारे बैंक की स्वरूप नगर शाखा चलती थी। वह शाखा पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत थी और उसके पुराने ग्राहकों की एक बड़ी संख्या थी। यों तो कम्प्यूटरीकृत शाखाओं में बैकअप लेने की पूरी व्यवस्था होती है और स्वरूप नगर शाखा में भी बैकअप लिया जाता था, परन्तु वह बैकअप कभी टैस्ट नहीं किया गया था कि सही आ रहा है या नहीं। इसकी जिम्मेदारी वैसे तो साॅफ्टवेयर कम्पनी की होती है, परन्तु टीसीएस वाले इस मामले में बहुत ही लापरवाह थे और बिना कानपुर आये लखनऊ में बैठकर ही सारा कार्य करना चाहते थे। स्पष्ट है कि बैकअप पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता था और कोई दुर्घटना होने की स्थिति में हम संकट में फँस सकते थे। मंडल में आई.टी. (कम्प्यूटर) विभाग का प्रमुख होने के नाते इसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर भी आती थी, पर हम कुछ कर नहीं सकते थे और सब कुछ राम-भरोसे चल रहा था। अन्य शाखाओं में भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी।
2001 में एक दिन वही हो गया, जिसकी आशंका थी। किसी की लापरवाही से या शायद शाॅर्ट सर्किट से स्वरूप नगर शाखा के पीछे वाले रिकाॅर्ड रूम में आग लग गयी। पहले आग बुझाने की साधारण कोशिशें की गयीं। परन्तु वहाँ कागजों का ढेर होने के कारण आग बढ़ती गयी। धुँआ ऊपर पहुँचा, तो हमें पता चला। आग की जानकारी होते ही हमें सबसे पहले सर्वर बचाने की चिन्ता हुई, क्योंकि रिकाॅर्ड
रूम के बगल वाले कमरे में ही सर्वर रखा हुआ था।
हम फौरन दौड़कर नीचे आये। सर्वर रूम के आसपास धुँआ भरा हुआ था। मुँह और नाक पर रूमाल बाँधकर मैं, श्री के.सी. श्रीवास्तव और एक अन्य अधिकारी सर्वर रूम में घुस गये। मैंने जल्दी से उसके सारे केबल निकाल दिये। यहाँ मेरी फुर्ती बहुत काम आयी। फिर हम तीनों मिलकर सर्वर को उठा लाये। इस काम में मुश्किल से 2 मिनट का समय लगा होगा। बाहर आते-आते हमारी साँस घुटती जा रही थी। अगर एक आध मिनट और लग जाता, तो हम वहीं बेहोश भी हो सकते थे। सर्वर बाहर लाकर हमारी जान में जान आयी। हार्डवेयर इंजीनियर श्री सर्वेश कुमार वर्मा ने उसकी जाँच की, तो पता चला कि केवल बाहरी टेप ड्राइव और फ्लाॅपी ड्राइव खराब हुए हैं तथा हार्ड डिस्क ड्राइव और उसके भीतर का सारा डाटा सुरक्षित है। यह पता चलने पर हमने संतोष की साँस ली, क्योंकि शाखा में बैकअप की स्थिति वास्तव में गड़बड़ थी।
शाखा की आग बढ़ती गयी, तो फायर ब्रिगेड ने आकर कई घंटे में आग पर काबू पाया। रिकाॅर्ड रूम के पास में ही लाॅकर रूम था। आग की खबर फैलते ही हमारे इलाहाबाद बैंक के ग्राहक आकर चिन्ता करने लगे कि उनके लाॅकरों में रखा कीमती सामान तो नष्ट नहीं हो गया। कई महिलायें तो बैंक के सामने आकर रोने लगीं। सौभाग्य से किसी ग्राहक की कोई हानि नहीं हुई, लेकिन बैंक के बहुत से रिकाॅर्ड जल गये। फिर भी सर्वर बच जाने के कारण शाखा के कार्य की हानि नहीं हुई। अगले दिन ही सर्वर हमारे कम्प्यूटर विभाग के कमरे में रखकर लेन-देन का काम चालू करा दिया गया।
खजुराहो यात्रा
खजुराहो का विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कानपुर से केवल 3-4 घंटे के रास्ते पर है। हम बहुत दिनों से वहाँ जाने के इच्छुक थे, परन्तु कभी मौका नहीं मिला था। अक्टूबर 2002 के प्रारम्भ में अचानक हमारा विचार वहाँ जाने का बन गया। मौसम भी अच्छा था, न ठंड, न गर्मी। हमारे मकान मालकिन के पुत्र श्री अनिल कुमार सिंह और पुत्रवधू डा. रेणु सिंह भी वहाँ चलने को तैयार हो गये। उस समय वे घरेलू समस्याओं के कारण मानसिक दृष्टि से परेशान से थे। मैंने कहा कि घूमने जाने से दिमाग को बहुत शान्ति मिलेगी। अतः वे चलने को मान गये। विचार बना कि सब उनकी कार से चलेंगे और पेट्रोल का खर्च आधा-आधा बाँट लेंगे।
निश्चित दिन पर हम सुबह ही निकल पड़े। हमने अपने पुत्र दीपांक को वहीं छोड़ दिया, क्योंकि वह बड़ा हो गया था। मोना को हमने साथ ही रखा। इसी तरह अनिल जी ने भी अपनी पुत्री कृतिका को साथ ले लिया, जो बहुत छोटी थी। हमीरपुर और महोबा होते हुए दोपहर तक हम खजुराहो पहुँच गये। उस समय घूमने का सीजन नहीं था, क्योंकि विदेशी पर्यटक ज्यादातर जाड़ों में आते हैं। इसलिए वहाँ भीड़-भाड़ नहीं थी। हमें सरलता से एक होटल मिल गया।
खाना खाकर पहले दिन हम प्रमुख मंदिरों को देखने गये। वैसे तो वहाँ गाइड भी मिलते हैं, पर मैंने अपनी सुविधा के लिए खजुराहो के मन्दिरों के बारे में एक पुस्तिका खरीद ली। उसमें बहुत अच्छी जानकारी थी और एक नक्शा भी था। उसकी सहायता से हम वहाँ के लगभग सभी मन्दिरों को देख आये। खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मन्दिर आठवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक उस समय के प्रतिष्ठित राजवंश चन्देल के राजाओं ने बनवाये थे, जो बहुत कलाप्रेमी थे। मन्दिरों की मूल संख्या 108 बतायी जाती है, परन्तु अब केवल 28 मिलते हैं। शेष काल के गाल में समा चुके हैं। इन 28 मन्दिरों में से भी कई खंडहर जैसी स्थिति में हैं, लेकिन कई बहुत अच्छी हालत में भी हैं। केवल एक मन्दिर में पूजा अर्चना होती है। शेष केवल पर्यटन के लिए हैं। इनमें कई जैन मन्दिर भी हैं।
इन मन्दिरों की प्रसिद्धि का कारण यह है कि उनकी बाहरी दीवारों पर कामक्रीड़ा रत युगलों अथवा शृंगार करने में लगी युवतियों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। ऐसी आकृतियाँ हमने कोणार्क के सूर्य मन्दिर की दीवारों पर और रणकपुर (राजस्थान) में जैन मन्दिरों की दीवारों पर भी देखी हैं, लेकिन यहाँ उनकी बहुतायत है। सभी लोग इन मूर्तियों को देखने आते हैं, लेकिन अधिकांश लोग उनका रहस्य नहीं समझते। केवल कामक्रीड़ा की मूर्तियों को देखकर चले जाते हैं। किन्तु मैंने जो पुस्तिका खरीदी थी, उसको पढ़ने के साथ-साथ मैंने उन मुद्राओं को फिर से ध्यानपूर्वक देखा, तो पता चला कि प्रत्येक मुद्रा में कोई न कोई विशेष बात है और कई तो घोर रहस्यात्मक हैं। मुझे लगा कि इनको ठीक से देखने के लिए एक सप्ताह का समय भी कम है, जबकि हम केवल दो दिन के लिए आये थे।
मन्दिरों को देखते हुए हमें पता चला कि शाम को यहाँ इन मन्दिरों पर आधारित दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम होता है। हमने उसके लिए टिकटें खरीद लीं और रात्रि को भोजन करके कार्यक्रम प्रारम्भ होने से पहले ही आ गये। वह कार्यक्रम बहुत अच्छा था। इसके बाद हम सो गये।
यहाँ यह बता दूँ कि खजुराहो वास्तव में केवल एक गाँव है। केवल इन मन्दिरों की वजह से कस्बा जैसा लगता है। एक छोटा सा मार्केट भी है, परन्तु वहाँ सभी कलात्मक चीजें बहुत मँहगी हैं, जैसा कि पर्यटन स्थलों पर होना स्वाभाविक है। वहाँ एक बात मैंने नोट की कि वहाँ पर इटालियन भोजन वाले रेस्टोरेंट और होटल बहुत हैं। इसका कारण मेरी समझ में यह आया कि वहाँ इटली के पर्यटक सबसे अधिक आते हैं। वैसे वहाँ सभी यूरोपीय देशों के पर्यटक आते हैं। वहाँ एक पंचतारा होटल और हवाई अड्डा भी है।
अगले दिन प्रातः जब पत्नी जी और बच्चे सोये हुए थे, तो मैं अकेला ही मन्दिरों को फिर से देखने निकल पड़ा। पुस्तक को बार-बार पढ़कर मैंने कई मन्दिरों की विभिन्न मूर्तियों को समझने का प्रयास किया। मैं यह देखकर बहुत आश्चर्यचकित होता था कि इन मामूली मूर्तियों में इतने रहस्य छिपे हुए हैं। थोड़ी देर बाद बाकी लोग भी आ गये। मैंने श्रीमतीजी और डाॅ रेणु को कुछ मूर्तियों का रहस्य बताया, तो उन्हें भी बहुत आश्चर्य हुआ।
दोपहर को भोजन से थोड़ा पहले हम वहाँ पास में ही रानेह नामक स्थान में एक बाँध और झरना देखने गये। वह झरना बहुत ऊँचाई से गिरता है, लेकिन बहुत दूर से देखना पड़ता है। उसके पास जाना सम्भव नहीं है, क्योंकि वहाँ बहुत गहरी खाई है। वहाँ का बाँध साधारण ही है। वैसे वह सारा स्थान जंगलों से घिरा हुआ है और काफी हरा-भरा भी है। उसे देखकर हमें बड़ा आनन्द आया।
दोपहर को भोजन के थोड़ी देर बाद ही हम होटल का कमरा खाली करके कानपुर की ओर चल दिये और अँधेरा होने तक आराम से घर पहुँच गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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