आत्मकथा भाग-3 अंश-28
मिशन हाईस्पीड
मैं बता चुका हूँ कि उस समय अर्थात् 2002 तक हमारे बैंक के कानपुर मंडल की लगभग सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण हो चुका था और सुचारु रूप से सारा कार्य कम्प्यूटरों द्वारा किया जा रहा था। लेकिन जब भी मैं किसी शाखा में जाता था, तो मुझे लगभग हर जगह यह शिकायत सुनने को मिलती थी कि कम्प्यूटर से रिपोर्ट छापने में बहुत समय लग जाता है और उनके रोज दो घंटे इसमें बरबाद हो जाते हैं। वास्तव में उनकी शिकायत सही थी। हमने उनको केवल डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर दिये थे, जो बहुत धीरे-धीरे छपायी करते थे और कभी कागज या रिबन फँस जाने पर उनका और भी अधिक समय बर्बाद होता था। इसलिए वे चाहते थे कि उन्हें अच्छे तेज गति वाले प्रिंटर दे दिये जायें। सौभाग्य से उन दिनों हाईस्पीड डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर उपलब्ध थे, जिनकी कीमत केवल 30-35 हजार थी। वैसे और भी अधिक गति वाले लाइन मैट्रिक्स प्रिंटर भी आने लगे थे, परन्तु उनकी कीमत 2 लाख के आस-पास थी। इसलिए हमने यह तय किया कि सभी शाखाओं को एक-एक हाईस्पीड डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर दे दिया जाये। ऐसा ही एक प्रिंटर हम स्वयं अपने कम्प्यूटर केन्द्र में उपयोग में लाते थे, जिससे मिनटों में सैकड़ों पेज की रिपोर्ट निकल आती थी।
श्री दौलतानी सिद्धान्ततः हमारे विचार से सहमत थे, परन्तु हाईस्पीड प्रिंटरों की अनुमति वे अपने स्तर से नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्होंने हमसे कहा कि हम प्रधान कार्यालय से इसकी अनुमति प्राप्त करें। फिर हमने प्रधान कार्यालय से पत्र-व्यवहार चालू किया। पहले तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। लेकिन जब हमने बार-बार माँग की, तो उन्होंने ये आँकड़े माँगे कि प्रत्येक शाखा में रोजाना औसतन कितने वाउचर होते हैं। जिन शाखाओं में 700 से अधिक वाउचर होते थे, उनको हाईस्पीड प्रिंटर देने पर वे सिद्धान्ततः सहमत थे, परन्तु अनुमति फिर भी नहीं मिली। लेकिन मैं भी अड़ा हुआ था। जब पत्र-व्यवहार की मात्रा बढ़ने लगी, तो मैंने हाईस्पीड प्रिंटरों के बारे में पत्र-व्यवहार की एक अलग फाइल ही बना डाली और उस फाइल का नाम रखा- ‘मिशन हाईस्पीड’।
धीरे-धीरे यह फाइल मोटी होती गयी। प्रधान कार्यालय द्वारा शाखाओं के वाउचरों के आँकड़े एक बार फिर माँगे गये और मैंने फिर भेज दिये। अन्ततः लगभग सवा साल तक लगातार पत्र-व्यवहार करने के बाद वहाँ से हमें 20 बड़ी-बड़ी शाखाओं के लिए हाईस्पीड प्रिंटर खरीदने की अनुमति मिल गयी। मैंने तत्काल कोटेशन इकट्ठे किये और 20 हाईस्पीड प्रिंटरों का आदेश दे दिया। निर्धारित समय पर प्रिंटर आये और शाखाओं में लगाये गये, तो शाखाओं के लोगों ने मुझे बहुत दुआयें दी। अब उनका रोज एक-डेढ़ घंटे का कीमती समय बचने लगा था, जिसे वे अपने परिवार के साथ बिता सकते थे।
प्रिंटर की मरम्मत
20 नये हाईस्पीड प्रिंटरों में से एक हमने अपने कम्प्यूटर सेंटर के उपयोग के लिए रखा और अपना वाला प्रिंटर किसी शाखा को भेज दिया। संयोग से हमने जो प्रिंटर अपने पास रखा था, उसमें कुछ मामूली सी तकनीकी गड़बड़ी थी। वह छापता तो अच्छा था, परन्तु उसमें लगाये जाने वाले रिबन को जल्दी फाड़ देता था, जबकि दूसरे प्रिंटरों में रिबन लम्बे समय तक चलते थे। जब मैंने इसके कारण का पता लगाया, तो तकनीकी गड़बड़ी मेरी समझ में आ गयी, हालांकि मैं हार्डवेयर इंजीनियर नहीं हूँ।
तब मैंने उसे सप्लाई करने वाली कम्पनी (शायद ‘लिपि’) के इंजीनियर को बुलाया और उसे गड़बड़ी ठीक करने को कहा। पहले तो वह इंजीनियर मान ही नहीं रहा था कि प्रिंटर में कोई तकनीकी खराबी है। उसके लिए इतना ही बहुत था कि प्रिंटर सही छपायी कर रहा है। रिबन का जल्दी फट जाना उसके लिए कोई समस्या नहीं थी। लेकिन मेरे एक घंटे समझाने के बाद उसने यह तो मान लिया कि प्रिंटर में वास्तव में कोई गड़बड़ी है, लेकिन वह गड़बड़ी कहाँ पर है यह वह नहीं समझ पाया। असल में वह एक नया इंजीनियर था और उसे प्रिंटरों का रखरखाव करने का अधिक अनुभव नहीं था।
इसलिए मैंने उसकी कम्पनी को लिखा कि नये लल्लू के बजाय किसी अनुभवी इंजीनियर को भेजिए। तब उनका दूसरा बड़ा इंजीनियर आया। मेरे बताने पर वह समस्या को समझ गया और कहने लगा- ‘मुझे पता चल गया है कि इसमें क्या खराबी है, लेकिन मैं उसको ठीक करना नहीं जानता। किसी दूसरे को भेज दूँगा।’ फिर कई दिन बाद एक तीसरा इंजीनियर लखनऊ से आया। वह इंजीनियर वास्तव में बहुत अनुभवी था। उसने तकनीकी गड़बड़ी ठीक कर दी और फिर वह प्रिंटर अच्छी तरह चलने लगा और रिबन फटने की शिकायत समाप्त हो गयी।
सैफई यात्रा
मैं लिख चुका हूँ कि कानपुर शहर के बाहर की शाखाओं को कम्प्यूटरीकृत करने के लिए मैं प्रायः स्वयं जाया करता था। उन दिनों उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। इटावा जिले में उनके गाँव सैफई में एक एयरपोर्ट और स्टेडियम के निर्माण का कार्य चल रहा था। हमारे बैंक ने उनकी सुविधा के लिए वहाँ अपना एक विस्तार पटल खोलने का निर्णय किया था और उसका समस्त कार्य प्रारम्भ से ही कम्प्यूटर पर करने का निश्चय भी किया था। इसलिए विस्तार पटल प्रारम्भ होने के एक-दो दिन पहले ही मैं सैफई गया। संयोग से उस दिन हमारे सहायक महा प्रबंधक श्री दौलतानी जी भी किसी कार्य से इटावा जा रहे थे। अतः हम उनके ही साथ बैंक की कार में इटावा गये। रास्ते में हमने एक अच्छे रेस्तराँ में जलपान भी किया।
इटावा शाखा में दौलतानी जी को उतारकर हम उसी कार से इटावा के एक अधिकारी, जिसकी पोस्टिंग सैफई में हुई थी, को साथ लेकर सैफई तक गये। हम अपने साथ एक पीसी भी ले गये थे, जिसमें बैंक का साॅफ्टवेयर पड़ा हुआ था। विस्तारपटल पहले से तैयार था। हमने पीसी को वहाँ स्थापित कर दिया और चलाकर भी देख लिया कि कार्य सही कर रहा है। अगले ही दिन से वहाँ लेन-देन का कार्य शुरू करना था। वैसे सैफई एक साधारण गाँव से अधिक कुछ नहीं था। अब तो शायद उसका विकास बहुत हो गया है और हमारा विस्तार पटल भी एक पूर्ण शाखा में बदल दिया गया है।
बच्चों की पढ़ाई
ईश्वर की कृपा से हमारे दोनों बच्चे पढ़ने में बहुत तेज रहे हैं। दीपांक कक्षा 2 से लेकर कक्षा 5 तक लगभग हर साल ही अपनी कक्षा में प्रथम या द्वितीय रहा। इसलिए उसे हर साल एक या दो मैडल मिला करते थे। केवल एक बार जब वह कक्षा 4 में था और प्रथम तीन बच्चों में नहीं आ पाया, तो उसे विद्यालय का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी मानकर एक मैडल दिया गया था। इसी प्रकार आस्था (मोना) भी प्रारम्भ से ही अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम रही। कक्षा शिशु से लेकर कक्षा 5 तक वह हर साल ही प्रथम आयी और केवल एक बार द्वितीय रही थी। उसको भी हर साल मैडल, कप आदि मिला करते थे। किसी-किसी वर्ष तो उसे दो-दो मैडल मिले। वे पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियों जैसे सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, दौड़ आदि में भी जीता करते थे।
जब वर्ष के अन्त में परिणामों की घोषणा होती थी और बच्चों को मैडल दिये जाते थे, तो उस कार्यक्रम में हम भी शामिल होते थे और हमें बहुत गर्व की अनुभूति होती थी। बच्चों द्वारा लाये गये ऐसे मैडलों की एक अच्छी-खासी संख्या हमारे पास एकत्र हो गयी है, जो एक शो केस में रखी हुई है। इनमें कुछ कप आदि मेरे भी हैं, लेकिन ज्यादातर बच्चों के हैं और हर साल ही इनकी संख्या में वृद्धि होती रहती है। कई मैडल तो इतने बड़े हैं कि शो केस में नहीं आ पाते, इसलिए उन्हें अलग रखना पड़ता है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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