आत्मकथा भाग-3 अंश-27

नये स.म.प्र. श्री दौलतानी
श्री एस.एन.पी. सिंह की जगह श्री अजित लाल दौलतानी हमारे सहायक महाप्रबंधक बनकर आये। उनसे मेरा पूर्व परिचय था। पहले वे नदेसर (वाराणसी) शाखा के प्रबंधक थे, जब मैं वाराणसी मंडलीय कार्यालय में था। बाद में वे कानपुर आ गये थे। जब प्रोमोशन के बाद मेरी पदस्थापना कानपुर में हुई थी, उस समय भी वे कानपुर मंडलीय कार्यालय में ही वरिष्ठ प्रबंधक थे। लेकिन कुछ माह बाद ही उनका प्रोमोशन हो गया और वे मुख्य प्रबंधक बनकर किसी विभाग में प्रधान कार्यालय चले गये थे। लगभग 6 वर्ष दूर रहने के बाद वे फिर प्रोमोशन लेकर सहायक महाप्रबंधक बनकर कानपुर में ही पदस्थ हुए थे। हालांकि हम दोनों में कभी कोई घनिष्टता नहीं थी, लेकिन सामान्यतया वे मुझसे और मेरी क्षमताओं से परिचित थे। इसलिए शीघ्र ही हममें अच्छा सामंजस्य हो गया। यह बता दूँ कि वे मूलतः आगरा के रहने वाले हैं और ताजगंज में उनका पैतृक मकान है तथा आगरा में ही ससुराल भी है।
वैसे उनके कार्य करने की शैली अपने आप में अनोखी थी। वे अपने को दूसरों से विशिष्ट दिखाने की कोशिश करते थे। उदाहरण के लिए, सभाओं या समारोहों में दूसरे मंडलीय प्रमुख जहाँ खड़े होकर बोलते थे, वहीं वे हमेशा बैठकर ही बोलते थे। यह बात नहीं कि उनको खड़े रहने में कोई समस्या थी। वास्तव में उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। लेकिन स्वयं को विशिष्ट दिखाने के लिए ही वे बैठकर बोला करते थे। उनका स्वभाव भी कुछ कठोरता लिये हुए था, इसलिए अधिकांश अधिकारी उनसे डरते थे। परन्तु उन्होंने मुझे ज्यादातर सहयोग ही किया और कभी परेशान बिल्कुल नहीं किया। मुझे वे छुट्टियाँ भी आसानी से दे देते थे।
लेकिन उनकी एक आदत मुझे बहुत अप्रिय लगती थी। वे सुबह कार्यालय आते ही यह आशा करते थे कि उस दिन इंटरनेट पर आने वाले समाचारपत्रों इकाॅनाॅमिक टाइम्स और फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुख्य-मुख्य समाचार उनको छापकर दे दिये जायें। हालांकि ये दोनों अखबार दोपहर 2-3 बजे तक कार्यालय में आ जाते थे, परन्तु वे इतनी देर यानी 3-4 घंटे भी इंतजार नहीं करना चाहते थे। इसलिए यह कार्य कु. तेजविंदर कौर कर देती थीं। मेरे विचार से यह कार्य एकदम फालतू था और इसमें एक-डेढ़ घंटे का समय तथा 20-25 पेज कागज बरबाद होता था। कभी-कभी जब कु. तेजविंदर कौर छुट्टी पर होती थीं, तो श्री दौलतानी मुझसे यह आशा करते थे कि मैं यह कार्य करके दे दूँगा, परन्तु मैंने एक दिन भी यह कार्य नहीं किया।
बैंक का आई.पी.ओ.
उन्हीं दिनों अर्थात् सन् 2001-02 में हमारे बैंक ने अपने शेयर पहली बार जारी किये। इसे आईपीओ अर्थात् इनीशियल पब्लिक ऑफर (हिन्दी में प्रथम सार्वजनिक निर्गम) कहा जाता है। इसमें बैंक के शेयर की कीमत केवल 10 रु. रखी गयी थी और इसी कीमत पर बेचे जा रहे थे। इसके लिए बैंक के कर्मचारियों का कोटा भी तय था और उन्हें शेयर खरीदने के लिए ऋण भी मिल रहा था। लगभग सभी अधिकारियों ने इस ऋण सुविधा का लाभ उठाया और शेयरों के लिए एप्लाई किया। मैंने भी एक हजार शेयर खरीदे थे।
अपने बैंक के ग्राहकों में आई.पी.ओ. का प्रचार करने के लिए बैंक ने एक योजना बनायी। उसने विभिन्न शाखाओं में फिक्स डिपोजिट अर्थात् सावधि जमा खाता खोलने वाले ग्राहकों या ऐसे ग्राहकों जिनके जमा खाते में कम से कम 50 हजार रुपये हों, के नाम-पतों की सूची तैयार की। उस समय तक सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण हो चुका था, इसलिए ऐसी सूची बनाने में कोई कठिनाई नहीं थी। लेकिन गड़बड़ यह थी कि एक-एक ग्राहक और उनके परिवार के कई-कई खाते थे और उनमें पता भी एक जैसा नहीं था। इसलिए हमारी कोशिश यह थी कि एक परिवार को केवल एक पत्र भेजा जाये, जिससे कि अधिक से अधिक परिवारों में पत्र पहुँच जाये।
इससे भी बड़ी गड़बड़ यह थी कि अनेक शाखाओं के प्रबंधकों ने अपने अल्प ज्ञान के कारण वह सूची डाटाबेस फाॅर्मेट में निकालने के बजाय प्रिंट फाॅर्मेट में निकालकर भेज दी थी। जो सूचियाँ डाटाबेस के फाॅर्मेट में आयी थीं, उनमें से पते छापना आसान था, लेकिन जो प्रिंट फाॅर्मेट में आयी थीं, उनमें से पते निकालना जरा टेढ़ा काम था। इसके लिए मुझे एक विशेष प्रोग्राम लिखना पड़ा, जिससे छपाई के एक पूरे पेज में से केवल पते को उठाकर डाटाबेस फाॅर्मेट की फाइल बन जाती थी। यह प्रोग्राम मैंने फाॅक्सप्रो में लिखा और सफलतापूर्वक काम सम्पन्न हो गया। हालांकि लगभग 40 बड़ी-बड़ी शाखाओं का काम करने में कई दिन लग गये। मेरे इस विराट कार्य को देखकर दौलतानी जी बहुत संतुष्ट हुए थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारी इस मेहनत का पूरा फल मिला और हमारे बैंक का आई.पी.ओ. खुलने के पहले ही दिन लगभग पूरा हो गया और अन्तिम दिन तक तो कई गुने एप्लीकेशन आ गये थे।
आई.पी.ओ. के दिनों में मुझे मुख्य शाखा में जाना पड़ा था, क्योंकि वहाँ प्रोग्रामिंग करने वाला कोई नहीं था। शालू सेठ उस समय अपनी गर्भावस्था के कारण छुट्टी पर चली गयी थी। हालांकि मुझे वहाँ भेजना उचित नहीं था, क्योंकि इस कार्य के लिए मुझसे जूनियर अधिकारी उपलब्ध थे, लेकिन हमारे तत्कालीन मुख्य प्रबंधक श्री एम.आर. कुमार ने मुझे ही भेज दिया। खैर, उनके आदेश का पालन करना मेरी बाध्यता थी, इसलिए मैं चला गया और अपने दायित्व को पूरी तरह निभाया। यहाँ तक कि कई बार मुझे डाटा प्रविष्टि भी करनी पड़ी। आई.पी.ओ. का कार्य समाप्त होने के बाद मैं फिर अपने मंडलीय कार्यालय में आ गया।
आई.पी.ओ. के फार्म वैसे तो हमारे बैंक की सभी शाखाओं में लिये जाते थे, लेकिन उनको प्रोसेस केवल दो जगह किया जाता था- मुख्य शाखा में और स्वरूप नगर शाखा में। मुख्य शाखा में कम्प्यूटर का कार्य जहाँ मैंने सँभाला था, वहीं स्वरूप नगर शाखा में कु. तेजविन्दर कौर ने यह काम सँभाल लिया था। दोनों जगह यह कार्य सफलतापूर्वक और समय पर सम्पन्न हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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