आत्मकथा भाग-3 अंश-25
बैंक में उथल-पुथल
सन् 2000 में हमारे बैंक में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वी.आर.एस.) लागू हुई। जिन कर्मचारियों की उम्र 50 वर्ष से अधिक थी, वे इसका लाभ ले सकते थे। इसमें उनको बिना काम किये 5 साल का वेतन मिलने वाला था और साथ में नियमानुसार पेंशन भी। यह बहुत आकर्षक योजना थी। बैंक ने अपना खर्च घटाने के लिए यह निर्णय किया था। यह स्कीम अन्य बैंकों में भी आयी थी। हमारे बैंक के हजारों अधिकारियों और बाबुओं ने इसका लाभ उठाया। मेरे कम्प्यूटर सेंटर की श्रीमती माला भट्ट इसी योजना में रिटायर हो गयीं। श्री के.सी. श्रीवास्तव को भी इसका फायदा लेना चाहिए था, परन्तु वे चूक गये, जबकि उनके बड़े भाई श्री ए.सी. श्रीवास्तव भी वी.आर.एस. लेकर चले गये थे। जब स्कीम का समय निकल गया तो श्री के.सी. जी बहुत पछताये और कहते थे कि अगर अगली बार यह स्कीम आयेगी तो मैं जरूर लूँगा। लेकिन फिर यह स्कीम कभी नहीं आयी, क्योंकि पहली बार में ही बैंक बहुत खाली हो गया था।
सन् 2001 में हमारे बैंक में फिर बहुत उथल-पुथल हुई। उस समय हमारे बैंक का प्रबंध तीन स्तरों पर होता था- प्रधान कार्यालय के नीचे लगभग 9 मंडलीय कार्यालय थे और प्रत्येक मंडलीय कार्यालय के नीचे 3 या 4 क्षेत्रीय कार्यालय थे। उस वर्ष बैंक ने खर्च घटाने के लिए मंडलीय कार्यालय समाप्त करने और समस्त प्रबंधन कार्य क्षेत्रीय कार्यालय स्तर पर करने का निर्णय किया। मंडलीय कार्यालय समाप्त होने पर उनके सारे विभाग भी समाप्त होने थे। इसलिए हमारा कम्प्यूटर सेंटर भी समाप्त होना था। उस समय हमारा कानपुर मंडलीय कार्यालय तो स्वरूप नगर में था, लेकिन क्षेत्रीय कार्यालय वहाँ से कुछ दूर पांडु नगर में जे.के. मंदिर के सामने की गली में था।
मंडलीय कार्यालय समाप्त होने पर उसमें पदस्थ कई अधिकारियों को अलग-अलग जगह स्थानांतरित कर दिया गया और बाकी अधिकारियों को वहीं के क्षेत्रीय कार्यालय में लगा दिया गया। हमारे कम्प्यूटर केन्द्र के अधिकारी श्री अतुल भारती को राँची भेज दिया गया और श्रीमती रेणु सक्सेना मुख्य शाखा में लगा दी गयीं। श्रीमती माला भट्ट पहले ही वी.आर.एस. लेकर चली गयी थीं। इस तरह मेरे साथ केवल श्रीमती शालू सेठ, कु. तेजविंदर कौर तथा श्री के.सी. श्रीवास्तव रह गये।
हमें तत्काल पांडु नगर के क्षेत्रीय कार्यालय में बैठने का आदेश दिया गया था। इसलिए एक दिन हमने अपने सभी पी.सी. वहाँ भेज दिये और अगले दिन स्वयं भी पांडु नगर पहुँच गये। हमारे कम्प्यूटर केन्द्र के पुराने कम्प्यूटर किसी काम के नहीं रह गये थे, इसलिए वे हमने वहीं छोड़ दिये, हालांकि उस केन्द्र की चाबी अभी भी मेरे ही पास थी। कुछ दिन बाद श्रीमती शालू सेठ को भी हमारे बैंक की चकेरी शाखा में भेज दिया गया। इस प्रकार हम केवल तीन कम्प्यूटर अधिकारी क्षेत्रीय कार्यालय में रह गये। वहाँ के कार्य के लिए इतने लोग ही पर्याप्त थे। वैसे तो मैं अकेला ही सवा लाख के बराबर होता हूँ।
पांडु नगर मुझे पैदल ही जाना होता था, क्योंकि वहाँ के लिए सीधा टैम्पो नहीं मिलता था। मैंने जे.के. मन्दिर के परिसर से होकर आने-जाने का रास्ता खोज लिया, जहाँ से मैं केवल 1 या सवा कि.मी. पैदल चलकर अपने कार्यालय पहुँच सकता था। मैं वहाँ लगभग 2 माह बैठा। उसके बाद वह कार्यालय हमारे पुराने मंडलीय कार्यालय, जो स्वरूप नगर शाखा के ऊपर था, की जगह स्थानान्तरित हो गया। वहीं एक कमरा हमें कम्प्यूटर केन्द्र के लिए मिला, जिसमें हम तीनों अधिकारी बैठा करते थे। प्रारम्भ में उसी कमरे में हमारे हिन्दी अधिकारी श्री ओम प्रकाश शुक्ला भी बैठते थे, परन्तु बाद में उन्होंने अपनी मेज दूसरे कमरे में लगवा ली। कुछ दिन में ही हमने अपने केन्द्र को व्यवस्थित कर लिया और कार्य सुचारु रूप से चलने लगा। बाद में सभी क्षेत्रीय कार्यालयों का नाम बदलकर मंडलीय कार्यालय कर दिया गया।
मैं अपने घर से रोज पैदल ही आता-जाता था और कभी-कभी दोपहर का खाना खाने भी चला जाता था, क्योंकि वहाँ से अशोक नगर केवल 1 कि.मी. दूर था। वैसे ज्यादातर मैं अपना दोपहर का खाना लेकर आता था और फिर हम तीन-चार लोग अपने कम्प्यूटर सेंटर में ही बैठकर खाते थे। श्रीमती रेणु सक्सेना फिर से हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर आ गयी थीं और श्रीमती शालू सेठ को उनकी जगह कानपुर मुख्य शाखा भेज दिया गया था। हिन्दी अधिकारी श्री ओम प्रकाश शुक्ला भी हमारे साथ ही खाते थे और एक स्टैनोग्राफर श्रीमती निरुपमा शुक्ला भी हमारे साथ ही दोपहर का भोजन करती थीं। लंच साथ-साथ करना काफी आनन्ददायक होता था। जब सब्जियाँ बच जाती थीं, तो उनको एक साथ मिलाकर सब बाँटकर खाते थे। इसको मैं मजाक में ‘सानी’ कहता था। कभी कोई चावल भी लाता था, तो उसे भी इसमें मिला लेते थे।
लंच में कई बार मजेदार घटनायें हो जाती थीं। एक बार शालू सेठ किसी कार्य से मंडलीय कार्यालय आयीं और अपने साथ अपना लंच का डिब्बा भी लायीं। हमारे केन्द्र में लंच के समय जब सब अपना-अपना डिब्बा खोलने लगे, तो मैंने शालू से कहा- ‘तुम तो कढ़ी लायी होगी?’ वह डिब्बा खोलते-खोलते रुक गयी और पूछने लगी- ‘क्यों?’ मैंने कहा- ‘क्योंकि तुम ज्यादातर कढ़ी ही लाती हो।’ उसने कोई जबाब नहीं दिया और चुपचाप डिब्बा खोलती रही। जब उसका डिब्बा खुला, तो उसमें से कढ़ी ही निकली। सब आश्चर्य से देखते रह गये।
गुलशन जी का कार्य
श्री गुलशन कपूर हमारे मंडलीय कार्यालय में अग्रिम विभाग (ऋण विभाग) में प्रबंधक थे। एक बार बातचीत में गुलशन जी को पता चला कि मैंने अपनी आत्मकथा लिखी है, तो उन्होंने मुझसे जिक्र किया कि उनके पिताजी ने भी अपनी आत्मकथा लिखी है। वे उसको पुस्तक के रूप में छपवाना चाहते थे। मैंने उसे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। वह कई टुकड़ों में थी। उन्होंने उसका एक टुकड़ा मुझे पढ़ने को दिया, तो पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने उनसे कहा कि मैं इसको पुस्तक का रूप दे दूँगा। वह हाथ के लिखे करीब 50-60 पृष्ठों में थी। मैंने उसे टाइप करने का कार्य सरस्वती शिशु मन्दिर के एक आचार्य श्री विनीत श्रीवास्तव से कराया और उसका पारिश्रमिक भी गुलशन जी से दिलवाया।
फिर मैंने उसे अपने कम्प्यूटर पर सुधारा। उसमें प्रूफ की काफी गलतियाँ थीं, उनको ठीक किया। अन्त में कम्प्यूटर पर पुस्तक तैयार हो गयी। गुलशन जी उसकी केवल 20-25 प्रतियाँ छपवाना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि एक प्रति मैं कम्प्यूटर से छाप दूँगा। फिर उसकी फोटो काॅपी करा लेना और बाइंड करा लेना। वे इसके लिए प्रसन्नता से तैयार हो गये। तभी अचानक उनका स्थानांतरण चंडीगढ़ हो गया। तो मैंने उसकी साॅफ्टकाॅपी उनको एक फ्लाॅपी पर दे दी। वह पुस्तक ‘स्मृति के पंख’ शीर्षक से चंडीगढ़ में छपी और उसकी एक प्रति मुझे भी मिली।
यहाँ बता देना उचित होगा कि गुलशन जी कपूर के पिताजी श्री राधाकृष्ण कपूर अविभाजित भारत के सीमा प्रान्त (फ्रंटियर) के रहने वाले थे, जो अब पाकिस्तान में है। वहाँ उन्होंने अपनी अच्छी हैसियत बना ली थी। विभाजन के कारण उन्हें वह स्थान छोड़कर भारत आना पड़ा और लुधियाना में उन्होंने फलों की दुकान की, जो काफी कठिनाइयों के बाद सफल रही। सीमा प्रान्त में वे क्रांतिकारी गतिविधियों में भी भाग लेते थे और वहाँ के एक क्रांतिकारी श्री भगतराम के अभिन्न सहयोगी थे। इन्हीं भगतराम जी ने नेताजी श्री सुभाष चन्द्र बोस को एक मुल्ले के वेष में भारत की सीमा पार करायी थी। इस सबकी कहानी बड़े ही मार्मिक शब्दों में उन्होंने लिखी है। इसमें उनके पारिवारिक संघर्षों और घटनाओं की कथा भी है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते आँखें गीली हो जाती हैं। मुझे प्रसन्नता है कि इस आत्मकथा के प्रकाशन के महत्वपूर्ण कार्य में मैं गुलशन जी का सहयोगी हो सका।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें