आत्मकथा भाग-3 अंश-24

पप्पूजी की बीमारी
मेरी साली राधा (गुड़िया) का विवाह हो चुका था, परन्तु दुर्भाग्य से उसके कोई सन्तान नहीं थी। एक बार उम्मीद हुई तो गर्भपात हो गया। बहुत बाद में उसको एक पुत्री प्राप्त हुई। उसके पति श्री विजय कुमार जिन्दल कपड़े के कमीशन एजेंट हैं और शेयरों का काम भी कर लेते हैं। उनका प्यार का नाम ‘पप्पू’ है। वे बहुत ही व्यवहार कुशल हैं और सज्जन हैं। मेरी तो उनके साथ बहुत पटती है। मैं उनको ‘पप्पूजी’ या ‘विजय बाबू’ कहा करता हूँ। उनमें सभी अच्छाइयाँ हैं, परन्तु दो व्यसन भी हैं- एक तो यह कि वे तम्बाकूवाला पान-मसाला (गुटखा) बहुत खाते हैं और दूसरा यह कि वे ताश बहुत खेलते हैं। ताश मैं भी खेलता हूँ, पर कभी-कभी। इसका व्यसन मुझे नहीं है और तम्बाकूवाला पान-मसाला तो मैं बिल्कुल नहीं खाता। कभी-कभी मीठी सुपाड़ी अवश्य खा लेता हूँ। गुटखा ज्यादा खाने से पप्पू जी के पेट में ऐंठन होने लगी थी। कब्ज बहुत पुराना पड़ जाने के कारण ऐसा होता है। ज्यादा मसाला खाने और चाय पीने से यह बीमारी पैदा होती है।
कब्ज जब हद से ज्यादा हो जाता है तो तमाम तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं। वास्तव में कब्ज ही सभी बीमारियों की माँ है। इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में कब्ज दूर करने पर ही सबसे ज्यादा और सबसे पहले जोर दिया जाता है। परन्तु सभी लोग इस बात को नहीं जानते, इसलिए कब्ज को बीमारी मानने के बजाय दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए भाग-दौड़ करते हैं। पप्पूजी का इलाज पहले ऐलोपैथी से चला, उससे फायदा न होने पर होम्योपैथी से भी कराया गया। उससे भी फायदा न होने पर वैद्यजी की शरण में गये और लम्बे समय तक उनकी दवा खाते रहे। परन्तु उससे भी फायदा नहीं हुआ।
वैद्य जी ने उनको ‘संग्रहणी’ नामक रोग बताया था, जो वास्तव में कब्ज का ही दूसरा नाम है। जब कब्ज बहुत पुराना पड़ जाता है और आँतों में रुका हुआ मल सड़ने लगता है, तब यह रोग होता है और पेट में ऐंठन होती है। पेट में ऐंठन के कारण दिमाग पर भी असर पड़ता है, जिससे मरीज कुछ का कुछ बोलने लगता है और घर वाले उसे भूत-प्रेत का चक्कर समझते हैं। एक बार तो पप्पूजी की मानसिक हालत ऐसी हो गयी कि वे जीवन से निराश हो गये और अपनी पत्नी गुड़िया से कहने लगे कि तू सारा सामान लेकर मुझे छोड़कर चली जा, क्योंकि मैं बचूँगा नहीं और बाद में तुझे कोई कुछ नहीं ले जाने देगा, परन्तु गुड़िया वहीं डटी रही।
जब मुझे पप्पूजी की इस हालत का पता चला, तो पहले तो हमने अपने साप्ताहिक हवन में उनकी बीमारी ठीक होने के लिए प्रभु से प्रार्थना की और विशेष आहुतियाँ डालीं। मैं पीछे लिख चुका हूँ कि हम प्रायः ऐसी प्रार्थना नहीं करते और बहुत मजबूर होने पर ही केवल दूसरों के लिए प्रभु से याचना करते हैं। ऐसी प्रार्थना पहली बार हमने सूरजभान भाईसाहब के सफल ऑपरेशन के लिए की थी और दूसरी बार पप्पूजी के लिए की। मुझे प्रसन्नता है कि प्रभु ने दोनों बार हमारी प्रार्थना सुन ली। इसके बाद हम आगरा आये। वहाँ पप्पूजी को देखने गये, तो उन्होंने बताया कि मुझे भूख बिल्कुल नहीं लगती और सुबह उठते ही इतनी कमजोरी होती है कि सिर चकराता है और एक कदम भी चला नहीं जाता। कुछ खा लेने के बाद ही वह कमजोरी खत्म होती है।
मैंने उनको समझाया कि इसका कारण केवल कब्ज है और इस बीमारी में कोई दवा कुछ नहीं कर सकती। अगर मेरी बतायी हुई क्रिया करोगे, तो ठीक हो जाओगे। काफी समझाने पर वे क्रिया करने का राजी हो गये। मैंने उनको सुबह कटिस्नान लेने को कहा और खूब पानी पीने को भी कहा। कटिस्नान की सरल विधि भी मैंने उनको समझा दी और अगले ही दिन से उन्होंने उसे प्रारम्भ कर दिया। वे कई दिन से नहाये नहीं थे, इसलिए एक दिन मैंने उनके शरीर को गर्म पानी में कपड़ा भिगो-भिगोकर खूब रगड़ा। इससे उनके शरीर से इतना साबुनदार मैल निकला कि पानी ऐसा हो गया जैसे किसी ने साबुन घोल दिया हो। इस स्नान के बाद उनको काफी आराम मिला और अच्छी नींद भी आयी।
सौभाग्य से लगातार कटिस्नान लेने और थोड़ा टहलने से उनके शरीर में ताकत आने लगी। पहले उठते ही जो कमजोरी आती थी, वह गायब हो गयी और भूख लगने लगी। मैंने उनसे कहा था कि यह क्रिया लगातार दो माह करनी है। उन्होंने लगभग डेढ़ माह यह क्रिया की और इतने में ही वे बिल्कुल स्वस्थ हो गये। हालांकि साथ में वे वैद्य जी की दवा भी खा रहे थे। अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। परन्तु दुर्भाग्य से गुटखा खाना उन्होंने फिर शुरू कर दिया है और मेरे समझाने का उन पर कोई असर नहीं हुआ है।
इन्द्रम जी का कार्य
सन् 2000 में हमारे मंडलीय कार्यालय में पंजाब से एक अधिकारी प्रोमोशन पाकर आये। वे थे श्री इन्द्रम नंदराजोग। उन्हें मार्केटिंग विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक का दायित्व दिया गया था। एक दिन मेरा उनसे सामान्य-सा परिचय कराया गया। इसके कुछ दिन बाद ही उनको प्रवीण जी ने मेरे पास भेजा। वे कानपुर और आसपास के डाक्टरों को एक पत्र भेजना चाहते थे कि वे हमारे बैंक की विभिन्न ऋण सुविधाओं का लाभ अपने व्यवसाय में उठा सकते हैं। उन्होंने इंडियन मेडीकल एसोसिएशन के कानपुर कार्यालय से डाक्टरों के नाम-पते प्राप्त किये थे, जो एक सूची के रूप में थे और एमएस-वर्ड के फाॅर्मेट में थे। वे चाहते थे कि मैं उस सूची को किसी ऐसे फाॅर्मेट में बदल दूँ कि उनको मेल-मर्ज सुविधा से सरलता से पत्र भेजा जा सके।
काम थोड़ा लम्बा था, परन्तु मैं क्योंकि सभी विभागों की सहायता किया करता था, इसलिए उनका कार्य करने को तैयार हो गया। वैसे भी उस समय मेरे पास अधिक कार्य नहीं था। इन्द्रम जी ने सोचा था कि यह कार्य एक-दो घंटे में हो जाएगा। परन्तु मैंने बताया कि एक-दो दिन लग जायेंगे। तब उन्होंने कहा कि रहने दीजिए, मैं किसी तरह पत्र भेज लूँगा। लेकिन मैंने कहा- ‘नहीं, अब यह मेरा कार्य है।’ इससे वे बहुत प्रभावित हुए। दूसरे लोग जहाँ कार्य को अधिक से अधिक टालते हैं, वहीं मैं स्वयं इस कार्य को ले रहा था। वे कहने लगे- ‘तो, मैं सही जगह आया हूँ?’ मैंने कहा- ‘हाँ, आप बिल्कुल सही जगह आये हैं।’
मैंने दो दिन कड़ी मेहनत करके उनकी आवश्यकता के अनुसार सूची बना दी और उन्होंने पत्र भेज भी दिये। ऐसा ही कार्य दो-तीन बार आगे भी किया। अब यह तो पता नहीं कि उस पत्रों के कारण कितने डाक्टरों ने बैंक से ऋण लिया, परन्तु इन्द्रम जी के ऊपर मेरा जो प्रभाव पड़ा, वह सदा कायम रहा। वे मेरी बहुत इज्जत करने लगे थे और आज भी करते हैं। अब वे अवकाश ग्रहण करके चंडीगढ़ के निकट जीरकपुर में रहते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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