आत्मकथा भाग-3 अंश-23
मकान मालिक के पुत्र की समस्या
मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि हमारे मकान मालिक श्री एन.के. सिंह के एक मात्र पुत्र थे श्री अनिल कुमार सिंह। वे वकील थे, परन्तु उनकी वकालत कभी चली नहीं। वे प्रायः हर समय तम्बाकू वाला पान-मसाला चबाया करते थे और रात को दोनों बाप-बेटे मिलकर दारू पिया करते थे। दारू पीने के बाद प्रायः चढ़ जाती थी और आपस में अनाप-शनाप बोला करते थे। ऐसे ही एक दिन बाप-बेटे में तकरार हो गयी। नशे में बेटे ने बाप को बहुत गालियाँ दीं। उनकी माँ (आंटी जी) बीच में आयीं, तो उनका भी अपमान किया। तब उन्होंने पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आयी, तो उनके सामने भी अनिल जी अनाप-शनाप बोलने लगे। तब एक पुलिस ऑफीसर ने उनको एक थप्पड़ मार दिया।
थप्पड़ खाकर उस समय तो वे शान्त हो गये, परन्तु पुलिस वालों के जाने के बाद अपनी माँ को बहुत मारा कि पुलिस को बुलाकर मुझे क्यों पिटवाया। हमारी बिल्डिंग के एक अन्य किरायेदार श्री रमेश चन्द्र शर्मा (जो शिवानी वाले फ्लैट में आये थे) ने किसी तरह अन्दर जाकर उनकी माँ को बचाया। हमें डर था कि क्रोध में कहीं वे अपनी माँ की हत्या ही न कर दें।
इस कांड के अगले दिन ही आंटी जी और अंकल जी दोनों वह घर छोड़कर आजाद नगर चले गये। वहाँ उनके पास एक और कोठी थी, जो उस समय खाली पड़ी थी। इस कांड की खबर उनके छात्रों को भी लग गयी और उन्होंने अशोक नगर आकर अनिल जी को धमकाया कि अगर आगे माँ-बाप के साथ कोई बदतमीजी की, तो तुम्हारी बहुत ठुकाई करेंगे। दूसरे रिश्तेदार भी आये और उन्होंने भी ऐसी ही धमकी दी। इससे अनिल जी डर गये और अपनी पत्नी डा. रेणु तथा दो-तीन साल की बच्ची को लेकर बाहर निकल गये। वे जाने कहाँ-कहाँ भटके और जब बहुत परेशान हो गये, तो उन्होंने माफी माँगते हुए एक लम्बा पत्र अपने पिता को लिखा। अंकल जी और आंटी जी उनको माफ करने के मूड में नहीं थे, क्योंकि क्या पता कब उनका दिमाग फिर बिगड़ जाये।
एक दिन हम भी आजाद नगर अंकल जी और आंटी जी से मिलने गये। वहाँ हमें सारी बातें पता चलीं और हमने अनिल जी का पत्र भी पढ़ा, तो हमें उन पर बहुत तरस आया। मैंने अंकल जी और आंटी जी को समझाया कि हमारे कहने से बस एक बार उनको माफ कर दीजिए। मैंने खास तौर से उनकी पोती का जिक्र किया और कहा कि उसकी भलाई के लिए अनिल जी को माफ करना ही ठीक रहेगा, वापस आ जाने पर मैं अनिल जी को भी समझा दूँगा। हमारे द्वारा काफी समझाने के बाद वे उनको माफ करने को तैयार हो गये और कुछ दिन बाद फिर सभी अशोक नगर वाले घर में आ गये। सौभाग्य से इसके बाद उस घर में कलह होना बन्द हो गया, जो कि पहले प्रायः प्रतिदिन हुआ करती थी।
वैसे कलह केवल बाप-बेटे में ही नहीं, बल्कि अनिल जी और उनकी पत्नी डा. रेणु में भी हुआ करती थी। डा. रेणु उनको बहुत गन्दी-गन्दी गालियाँ दिया करती थीं। एक बार तो हम मकान बदलने के बारे में भी सोचने लगे थे, क्योंकि इस कलह का हमारे बच्चों के विकास पर बुरा असर पड़ सकता था। लेकिन जब कलह बन्द हो गयी, तो हमने संतोष की साँस ली। वैसे वे सभी अंकल जी, आंटी जी, अनिल जी और डा. रेणु भी हमारी बहुत इज्जत किया करते थे और हमें उनसे कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं थी।
दीपांक का एडमीशन
हमारा पुत्र दीपांक सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर, कौशलपुरी में कक्षा 5 तक पढ़ा। अप्रैल सन् 2000 में वह 5 की परीक्षा दे रहा था। वहाँ इससे आगे पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी। पास में जो सरस्वती विद्या मंदिर था, वह अच्छा नहीं था। इसलिए हमने कक्षा 6 में उसका प्रवेश किसी अन्य अच्छे विद्यालय में कराने का विचार बनाया। उस समय कानपुर में दो विद्यालय बहुत प्रतिष्ठित थे- एक, दीनदयाल उपाध्याय इंटर कालेज, आजाद नगर और दूसरा, बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन, आर्य नगर। इन दोनों ही विद्यालयों में गिनी-चुनी सीटें होती थीं, जबकि प्रवेश लेने के इच्छुक छात्र-छात्राओं की संख्या हजारों में होती थी। इसलिए कड़ी प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद ही इनमें प्रवेश मिलता था।
प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए हमने किसी आचार्य की सेवाएँ लेने का विचार किया। दीपांक के विद्यालय के ही एक आचार्य श्री महेश चन्द्र पांडेय ने हमसे सम्पर्क किया और कहा कि मैं केवल दो माह में इसकी तैयारी करा दूँगा। हम राजी हो गये। उन्होंने दीपांक को अच्छी तैयारी कराई। इसके अलावा मुझे ज्ञात हुआ कि बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन के प्रधानाचार्य श्री अंगद सिंह हमारे बैंक के एक कर्मचारी नेता श्री पी.एन. सिंह के घनिष्ट मित्र हैं और अगर वे सिफारिश कर दें, तो प्रधानाचार्य उनकी बात नहीं टालेंगे। एक दिन मैंने श्री पी.एन. सिंह से इसका जिक्र किया और कहा कि वैसे तो हम अच्छी तैयारी करा रहे हैं, लेकिन अगर आप भी कह दें तो एडमीशन पक्का हो जाएगा। उन्होंने मुझे इसका आश्वासन दिया और कहा कि एडमीशन अवश्य हो जाएगा।
खैर, परीक्षा वाले दिन ही श्री महेश पांडेय ने हमारी श्रीमती जी को बता दिया कि मिठाई की तैयारी कर लो। जब रिजल्ट आया तो उनकी बात सत्य निकली। श्री पांडेय ने दीपांक के साथ ही एक अन्य छात्र सौरभ निगम की भी तैयारी कराई थी। उन दोनों का ही एडमीशन बी.एन.एस.डी. में हो गया। हमने श्री महेश पांडेय को उनके पारिश्रमिक और मिठाई के साथ ही उनकी पत्नी के लिए एक साड़ी भी भेंट की। वैसे श्री पी.एन. सिंह ने भी अपने वायदे के अनुसार प्रधानाचार्य श्री अंगद सिंह से हमारे पुत्र के बारे में कहा था। सूची में उसका नाम देखकर प्रधानाचार्य जी ने उनको बताया कि लड़का इंटेलीजेंट है और सिफारिश की जरूरत नहीं है। बाद में मिलने पर श्री पी.एन. सिंह ने यह बात मुझे बतायी, तो मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। मैंने उनको हार्दिक धन्यवाद दिया। इससे साथ ही उस प्रभु का भी पुनः धन्यवाद किया, जिसने हमें ऐसा प्रतिभाशाली पुत्र प्रदान किया है।
रक्तदान
दीपांक के बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन में प्रवेश के बाद भी आचार्य श्री महेश पांडेय से हमारा सम्पर्क बना रहा। वे उन्नाव के रहने वाले हैं। कई बार उन्होंने हमसे अपने निवास पर पधारने का अनुरोध किया, परन्तु हमें मौका ही नहीं मिला। एक बार उनका एक किशोर पुत्र पेट की किसी बीमारी से ग्रस्त हो गया। उसका ऑपरेशन होना था और दो यूनिट रक्त की भी आवश्यकता थी। उन्होंने हमारी श्रीमती जी से कहा कि एक यूनिट रक्त तो उसकी भाभी दे देगी, दूसरा यूनिट हमारी श्रीमती जी दे दें, तो समस्या हल हो जाएगी। श्रीमती जी तैयार हो गयीं और निर्धारित दिन मैं उनको साथ लेकर रक्त दिलवाने गया।
जब हम रक्त देने के लिए मेडीकल कालेज में गये, तो वहाँ के डाक्टर श्रीमती जी का रक्त लेने को तो तैयार हो गये, परन्तु उस लड़के की भाभी का रक्त लेने को तैयार नहीं हुए, क्योंकि उनकी दृष्टि में वे बहुत कमजोर थीं और रक्त निकालने पर कमजोरी और भी बढ़ सकती थी। तब मैंने कहा कि मैं अपना रक्त देने को तैयार हूँ। डाक्टर ने मेरी जाँच की और रक्त लेने को तैयार हो गये। इस प्रकार मैंने और श्रीमती वीनू दोनों ने उस लड़के के लिए अपना रक्त दिया।
रक्त देने के बाद जब हम उठे तो मैं तो पूरी तरह सामान्य और प्रसन्न था। लेकिन श्रीमती जी को कमजोरी लग रही थी। मैं उनको सहारा देकर ला रहा था, तो कमजोरी स्पष्ट हो गयी। अब मैं घबराया कि एक बोतल रक्त निकालने के बदले कहीं इनको दो बोतल रक्त चढ़ाना न पड़े। अगर ऐसा होता, तो मैं कैसे इंतजाम करता? परन्तु सौभाग्य से इसकी नौबत नहीं आयी। हमने बाहर जाकर एक-एक गिलास मुसम्मी का जूस पिया और फिर रिक्शे में बैठकर घर आ गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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